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दूसरा पहलू: डिजिटल डोपामिन का अदृश्य नशा

डॉ. दीपक कोहली Published by: लव गौर Updated Wed, 25 Feb 2026 05:35 AM IST
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सार

डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल तो बनाया है, लेकिन दिमाग की रासायनिक संरचना को बिगाड़ा भी है।
 

invisible addiction of digital dopamine
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

इक्कीसवीं सदी को यदि किसी एक प्रतीक में संक्षेपित करना हो, तो वह होगा, मनुष्य की हथेली में सिमटा हुआ स्मार्टफोन। मानव इतिहास में पहली बार सूचना इतनी तीव्र, सुलभ और सर्वव्यापी हुई है, किंतु हर क्रांति अपने साथ अप्रत्याशित परिणाम भी लाती है। डिजिटल क्रांति ने जहां जीवन को सरल बनाया है, वहीं इसने मानव मस्तिष्क की रासायनिक संरचना को भी सूक्ष्म रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस प्रभाव का केंद्र है, डोपामिन।
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डोपामिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, यानी मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संदेश संप्रेषित करने वाला रासायनिक पदार्थ। इसे सामान्य भाषा में ‘आनंद का हार्मोन’ कहा जाता है। डोपामिन मानव विकास की आधारशिला रहा है। हालांकि, समस्या तब आरंभ होती है, जब यह जैविक प्रणाली कृत्रिम रूप से और अत्यधिक उत्तेजित होने लगे। डिजिटल तकनीक, विशेष रूप से सोशल मीडिया, इसी प्रणाली को बार-बार सक्रिय करती है। मनोविज्ञान में ‘वैरिएबल रिवॉर्ड सिस्टम’ का सिद्धांत बताता है कि यदि कोई पुरस्कार अनियमित अंतराल पर मिले, तो व्यक्ति उस व्यवहार को अधिक तीव्रता से दोहराता है।
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सोशल मीडिया ने इसी सिद्धांत को डिजिटल रूप दिया है। कभी पोस्ट पर अत्यधिक प्रतिक्रिया मिलती है, कभी बहुत कम, कभी संदेश तुरंत आता है, कभी देर से। यह अनिश्चितता मस्तिष्क में प्रत्याशा को जन्म देती है, जो डोपामिन का स्रोत बन जाती है। समय के साथ यह व्यवहार बाध्यकारी प्रवृत्ति बन सकता है। डिजिटल डोपामिन का प्रभाव किशोरों में अधिक दिखाई देता है।

दरअसल, किशोरावस्था में मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूर्णतः विकसित नहीं होता, जो आत्म-नियंत्रण और निर्णय क्षमता का केंद्र है। दूसरी ओर, पुरस्कार-प्रणाली अत्यंत सक्रिय होती है। यह असंतुलन डिजिटल उत्तेजनाओं को और प्रभावशाली बना देता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी का सिद्धांत बताता है कि यदि मस्तिष्क को बार-बार छोटी व तीव्र उत्तेजनाएं मिलती हैं, तो व्यक्ति का ध्यान खंडित होने लगता है। यही कारण है कि कई विद्यार्थी व पेशेवर लोग कार्य के दौरान भी मोबाइल जांचने की इच्छा अनुभव करते हैं। देर रात तक स्क्रीन का उपयोग करने से उससे निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन के स्राव को कम करती है, जिससे नींद की गुणवत्ता घटती है।

हालांकि, यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि डिजिटल माध्यम पूर्णतः नकारात्मक नहीं है। इसने शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक जागरूकता और अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके असंतुलित उपयोग में है। डिजिटल डोपामिन वास्तव में आधुनिक युग का वह अदृश्य नशा है, जो हमारी आदतों, संबंधों, क्षमता और आत्मबोध को प्रभावित करता है।
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