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अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती: संयम का संघर्ष ही सच्ची क्रांति

Thu, 23 Jul 2026 12:08 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Thu, 23 Jul 2026 12:08 PM IST
सार

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन हमें सिखाता है कि संघर्ष और अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। उन्होंने अंग्रेजी शासन का डटकर सामना किया, लेकिन अपने संगठन में अनुशासन को सर्वोच्च स्थान दिया। 

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birth anniversary of chandra shekhar azad his role in indias freedom
चंद्रशेखर आजाद जयंती - फोटो : आईएएनएस

विस्तार

हर पीढ़ी अपने नायकों को अपने समय की कसौटी पर परखती है। शहीद चन्द्रशेखर आजाद को यदि केवल इतिहास की किताबों तक सीमित कर दिया जाए तो यह उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। आजाद केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, अपितु वे आत्मसम्मान, अनुशासन, त्याग और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा के प्रतीक थे। यही कारण है कि उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में थे।

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आज का भारत स्वतंत्र है। अपनी बात कहने की आजादी है, संविधान है, न्यायपालिका है, चुनाव हैं और लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं। ऐसे में संघर्ष का स्वरूप भी बदल चुका है। अब परिवर्तन की लड़ाई बंदूक से नहीं, अपितु विचार, संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से लड़ी जाती है। यही वह अंतर है, जिसे आज की युवा पीढ़ी को समझने की आवश्यकता है।
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आज देश में किसी भी मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने के लिए जंतर-मंतर जैसे लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध हैं। यह लोकतंत्र की ताकत है कि नागरिक अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आंदोलन अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए रखें।
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जब विरोध प्रदर्शन संयमित रहते हैं, तब समाज उनकी बात सुनता है, लेकिन जब वे अराजकता, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या आम लोगों के जीवन को बाधित करने का रूप ले लेते हैं तो उनका नैतिक बल कमजोर पड़ जाता है।

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन हमें सिखाता है कि संघर्ष और अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। उन्होंने अंग्रेजी शासन का डटकर सामना किया, लेकिन अपने संगठन में अनुशासन को सर्वोच्च स्थान दिया। उनका जीवन बताता है कि क्रांति केवल आक्रोश से नहीं, बल्कि स्पष्ट उद्देश्य, आत्मसंयम और दृढ़ संकल्प से सफल होती है।

आज सोशल मीडिया के दौर में युवा क्षणिक उत्तेजना का शिकार जल्दी हो जाते हैं। कुछ मिनटों का वायरल वीडियो या भावनात्मक संदेश कई बार विवेक पर भारी पड़ जाता है। ऐसे समय में चन्द्रशेखर आजाद का संदेश पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। वे सिखाते हैं कि भावनाएं आवश्यक हैं, लेकिन उनका मार्गदर्शन विवेक और राष्ट्रहित से होना चाहिए। क्रोध यदि अनुशासन खो दे तो वह परिवर्तन नहीं, केवल टकराव पैदा करता है।

अधिकार से ज्यादा कर्तव्यों पर दें ध्यान

भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हों, लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही प्रतिबद्ध रहें। जो विरोध करें तो तथ्यों और तर्कों के साथ करें, जो आंदोलन करें तो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर करें और जो परिवर्तन की बात करें तो समाज को साथ लेकर चलें। यही लोकतंत्र की शक्ति है और यही उसकी सुंदरता भी।

शहीद चन्द्रशेखर आजाद की सबसे बड़ी विरासत उनका साहस नहीं, बल्कि वह चरित्र है, जिसने उन्हें आखिरी सांस तक अपने संकल्प पर अडिग रखा। आज उनकी जयंती या बलिदान दिवस पर केवल पुष्प अर्पित करना पर्याप्त नहीं होगा। सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब देश का युवा यह समझे कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग अराजकता से नहीं, बल्कि संयम, अनुशासन, कर्तव्यबोध और सकारात्मक कर्म से होकर गुजरता है।

आज के भारत में चन्द्रशेखर आजाद इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची क्रांति व्यवस्था को जलाने में नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने में होती है। लोकतंत्र में आवाज बुलंद करना अधिकार है, लेकिन उस आवाज में संयम बनाए रखना नागरिक का दायित्व भी है। यही आजाद के जीवन का सार है और यही आधुनिक भारत के लिए सबसे बड़ा संदेश।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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