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भाजपा-अगप संबंध: गठबंधन की मजबूरी और संतुलन की राजनीति

Ravishankar Ravi रविशंकर रवि
Updated Thu, 05 Feb 2026 04:46 PM IST
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सार

2016 में भाजपा की पहली सरकार अगप के सहारे बनी। इसके बाद भाजपा ने संगठन विस्तार, नेतृत्व निर्माण और शासन के जरिए अपनी ताकत बढ़ाई, लेकिन इसी प्रक्रिया में अगप का राजनीतिक दायरा सिकुड़ता चला गया।

BJP-AGP relationship: Coalition compulsions and the politics of balance
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर में गठबंधन सत्ता तक पहुंचने का सबसे व्यावहारिक रास्ता बन चुका है। वैचारिक समानता हो या न हो, चुनावी यथार्थ दलों को साथ आने के लिए बाध्य करता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय दल-चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस-राज्यों में प्रभावी क्षेत्रीय दलों के साथ हाथ मिलाते हैं।

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यह सहयोग अक्सर राजनीतिक मजबूरी से जन्म लेता है, पर सत्ता मिलते ही बड़े दलों का व्यवहार बदल जाता है। क्षेत्रीय सहयोगी को हाशिये पर डालने की प्रवृत्ति गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है, और यहीं से टूटन की कहानी शुरू होती है। असम इसका जीवंत उदाहरण है।
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यह राज्य आज भी क्षेत्रीयतावाद की गहरी छाया में राजनीति करता है। सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान, भाषायी अस्मिता और स्थानीय हित यहां के मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करते हैं। ऐसे में भाजपा का सत्ता तक पहुंचना असम गण परिषद के सहयोग के बिना संभव नहीं था।

2016 में भाजपा की पहली सरकार अगप के सहारे बनी। इसके बाद भाजपा ने संगठन विस्तार, नेतृत्व निर्माण और शासन के जरिए अपनी ताकत बढ़ाई, लेकिन इसी प्रक्रिया में अगप का राजनीतिक दायरा सिकुड़ता चला गया। अगप की पारंपरिक सीटों पर भाजपा की दावेदारी बढ़ी और सहयोगी की भूमिका धीरे-धीरे दबाव में आती गई।

भाजपा ने ऐसा ही व्यवहार प्रमोद बोरो की अगुवाई वाले यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी-लिबरल (यूपीपीएल) के साथ किया। गठबंधन सरकार में यह दल शामिल किया गया, लेकिन बोडो क्षेत्रीय परिषद के चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़कर खुद की ताकत तो कमजोर की है, यूपीपीएल को भी बोडोलैंड की सत्ता से बाहर होना पड़ा।

अब भाजपा दूसरे बोड़ो दल बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ हाथ मिलाना चाहता है। इस तरह से भाजपा ने एक भरोसेमंद सहयोग को लात मारकर अगल कर दिया।

यह रणनीति अल्पकाल में लाभ दे सकती है, पर दीर्घकाल में जोखिम भी पैदा करती है। भाजपा के पास आज सत्ता का लाभ, मजबूत संगठन और डॉ हिमंत बिस्व शर्मा जैसे कुशल रणनीतिकार हैं। बावजूद इसके असम की राजनीति एकरंगी नहीं है।

ऊपरी असम में कांग्रेस और क्षेत्रीय विकल्पों की मौजूदगी लगातार चुनौती पेश कर रही है। गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस वहां अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है, विशेषकर अहोम मतदाताओं के एक हिस्से पर।

दूसरी ओर क्षेत्रीय पहचान को मुखर करने वाले असम जातीय परिषद दल-भी असंतुष्ट मतदाताओं के लिए आकर्षण बन सकते हैं। लोअर असम के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भाजपा की सीमाएं सर्वविदित हैं। बोडोलैंड में सत्ता-समीकरण अलग ढंग से काम करता है।

वहां बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के नेता हाग्रामा मोहिलारी का रुख प्रायः सत्ता के समीप रहने का रहा है। ऐसे बहुस्तरीय राजनीतिक परिदृश्य में यदि भाजपा-अगप गठबंधन कमजोर पड़ता है, तो कुछ सीटों का नुकसान भी निर्णायक साबित हो सकता है।

यहां प्रश्न केवल सीटों का नहीं, बल्कि भरोसे का है। अगप ने अब तक सहयोगी दल के रूप में स्थिरता दिखाई है। क्षेत्रीयतावाद में विश्वास रखने वाले कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच उसकी साख बनी हुई है।

यदि अगप को लगातार राजनीतिक रूप से दबाया गया, तो भीतरखाने असंतोष और विद्रोह की आशंका बढ़ेगी। इसका सीधा लाभ उन दलों को मिल सकता है, जो क्षेत्रीय अस्मिता को अपने एजेंडे का केंद्र बनाते हैं। इससे भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति को झटका लग सकता है।

भाजपा के लिए समझदारी इसी में है कि वह गठबंधन की आत्मा को समझे। सहयोग केवल चुनावी अंकगणित नहीं, बल्कि सम्मानजनक साझेदारी भी है। सीट-बंटवारे, संगठनात्मक तालमेल और नीति-निर्माण में सहयोगी की भूमिका को मान्यता देना आवश्यक है।

असम जैसे राज्य में जहां पहचान की राजनीति आज भी प्रभावी है, वहां क्षेत्रीय दलों को कमजोर करना अंततः स्वयं के लिए चुनौती बन सकता है। भाजपा-अगप संबंध असम की राजनीति में स्थिरता का कारक रहा है।

इसे शून्य-योग खेल की तरह नहीं, बल्कि परस्पर लाभ की साझेदारी के रूप में आगे बढ़ाना ही दोनों के हित में है। सत्ता की मजबूरी से जन्मा गठबंधन तभी टिकाऊ होगा, जब उसमें संतुलन, संवाद और सम्मान बना रहे। यही सावधानी भाजपा को आगामी चुनावी राह पर अपनानी चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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