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न्यू स्टार्ट संधि का अंत: परमाणु हथियार नियंत्रण ढांचे का पतन

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 06 Feb 2026 08:04 AM IST
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सार

न्यू स्टार्ट संधि इसी कड़ी का आधुनिक और परिष्कृत स्वरूप थी। वर्ष 2010 में चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

The end of the New START Treaty the collapse of the nuclear arms control framework
व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप। - फोटो : ANI
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विस्तार

अमेरिका और रूस के बीच 5 फ़रवरी 2026 को अंतिम बची ‘न्यू स्टार्ट’ (न्यू स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी) परमाणु हथियार नियंत्रण संधि की समय-सीमा समाप्त हो गई। इसके साथ ही शीत युद्ध के दौर से चली आ रही वह पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी आधिकारिक रूप से ढह गई है, जिसने पिछले लगभग पचास वर्षों तक दुनिया को अनियंत्रित परमाणु हथियारों की होड़ से किसी हद तक बचाए रखा था।

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यह केवल एक संधि का औपचारिक अंत नहीं है, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन के उस युग का अवसान है जिसमें संवाद को विनाश के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और संधि का उदय परमाणु नियंत्रण की इस यात्रा को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा।
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साठ और सत्तर के दशक में जब दुनिया क्यूबा मिसाइल संकट जैसे दौर से गुजरी, तब महाशक्तियों को अहसास हुआ कि बिना किसी नियंत्रण के परमाणु दौड़ केवल सामूहिक विनाश की ओर ले जाएगी। इसी सोच ने साल्ट (स्ट्रेटेजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स) और बाद में स्टार्ट (स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी) को जन्म दिया।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और संधि का उदय

न्यू स्टार्ट संधि इसी कड़ी का आधुनिक और परिष्कृत स्वरूप थी। वर्ष 2010 में चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों पर ऐसी सीमाएं तय करना था जो न केवल कागजों पर हों, बल्कि जिनका भौतिक रूप से सत्यापन भी किया जा सके।

5 फरवरी 2011 को लागू हुई इस संधि के तहत दोनों पक्षों को अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वारहेड और 700 तैनात डिलीवरी सिस्टम—जैसे इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बी आधारित बैलिस्टिक मिसाइलें और भारी बमवर्षक, तक सीमित रहना था।

विश्वास और पारदर्शिता की रीढ़:

ऑन-साइट निरीक्षण न्यू स्टार्ट केवल संख्याओं का खेल नहीं था; यह 'भरोसा करो लेकिन जांचो' (ट्रस्ट बट वेरीफाई) के सिद्धांत पर आधारित था। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसके कड़े निरीक्षण प्रावधान थे। संधि के सक्रिय रहने के दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों के 328 से अधिक ऑन-साइट निरीक्षण किए।

इसके अलावा, दोनों पक्षों के बीच 25,000 से अधिक डेटा साझाकरण सूचनाएं भेजी गईं। इन सूचनाओं में मिसाइलों के परीक्षण, उनके स्थान परिवर्तन और उनकी तैनाती की स्थिति की विस्तृत जानकारी होती थी।

इस पारदर्शिता का लाभ यह था कि वाशिंगटन और मॉस्को में से किसी को भी अंधेरे में रहकर अनुमान नहीं लगाना पड़ता था कि दूसरा पक्ष क्या कर रहा है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यह आपसी संवाद ही था जिसने कई बार तनाव के क्षणों में गलतफहमियों को युद्ध में बदलने से रोका। लेकिन बीते कुछ वर्षों में, विशेषकर यूक्रेन संघर्ष के बाद, यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई।

रूस ने फरवरी 2023 में संधि में अपनी भागीदारी को निलंबित कर दिया और अमेरिकी निरीक्षकों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए। जवाब में अमेरिका ने भी डेटा साझा करना बंद कर दिया, जिससे संधि केवल एक खोखला ढांचा बनकर रह गई थी, जो अब 2026 में पूरी तरह समाप्त हो गई है।

आधी सदी बाद पहली बार कोई सीमा नहीं

आज हम 1972 के बाद पहली बार एक ऐसी दुनिया में खड़े हैं जहाँ दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, रूस के पास लगभग 5,580 और अमेरिका के पास 5,044 परमाणु वारहेड्स का भंडार है। ये दोनों देश मिलकर दुनिया के 90 प्रतिशत परमाणु हथियारों को नियंत्रित करते हैं।

संधि के अभाव में अब दोनों देश अपने पुराने वारहेड्स को सेवा में वापस ला सकते हैं और नए लॉन्चर बना सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने इस स्थिति को 'वैश्विक सुरक्षा के लिए एक अत्यंत खतरनाक मोड़' कहा है।

विशेषज्ञों को डर है कि अब एक नई 'न्यूक्लियर आर्म्स रेस' (परमाणु हथियारों की दौड़) शुरू होगी, जहाँ गुणवत्ता और मात्रा दोनों में एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश की जाएगी। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि अब दोनों देशों के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो पलक झपकते ही महाद्वीपों की दूरी तय कर सकती हैं।

चीन का उदय और त्रिपक्षीय चुनौती

2026 की यह परिस्थिति 1990 के दशक से बहुत अलग है। उस समय परमाणु समीकरण द्विध्रुवीय था, लेकिन आज यह त्रिकोणीय होता जा रहा है। चीन अपनी परमाणु क्षमता का अभूतपूर्व विस्तार कर रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की रिपोर्टों के अनुसार, चीन 2030 तक अपने परमाणु वारहेड्स की संख्या को 1,000 के पार ले जा सकता है।

अमेरिका का तर्क रहा है कि अब किसी भी नई संधि में चीन को शामिल किया जाना अनिवार्य है। दूसरी ओर, चीन का कहना है कि उसका शस्त्रागार अभी भी अमेरिका और रूस की तुलना में बहुत छोटा है, इसलिए वह तब तक किसी सीमा को स्वीकार नहीं करेगा जब तक महाशक्तियां अपने हथियारों को बहुत नीचे नहीं ले आतीं।

इस गतिरोध ने न्यू स्टार्ट के उत्तराधिकारी के रूप में किसी भी नए समझौते की संभावना को धूमिल कर दिया है। चीन के अलावा उत्तर कोरिया का आक्रामक रुख और ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस वैश्विक गणित को और भी उलझा रहा है।

नई तकनीक और 'हाइपरसोनिक' जोखिम

न्यू स्टार्ट के अंत के साथ ही सैन्य तकनीक का एक नया और घातक आयाम सामने आया है। अब युद्ध केवल मिसाइलों की संख्या तक सीमित नहीं है। 'हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल्स' और 'क्रूज मिसाइलें' जो ध्वनि की गति से पांच से दस गुना तेज़ चलती हैं, वर्तमान मिसाइल डिफेंस सिस्टम (मिसाइल रक्षा प्रणालियों) को बेकार साबित कर सकती हैं। इसके अलावा, परमाणु प्रणालियों में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का समावेश एक और बड़ा खतरा है।

यदि परमाणु कमांड और कंट्रोल सिस्टम में एआई का उपयोग बढ़ता है, तो किसी तकनीकी खराबी या गलत 'एल्गोरिदम' के कारण परमाणु युद्ध शुरू होने का जोखिम बढ़ जाता है। न्यू स्टार्ट संधि में इन उभरती हुई तकनीकों को कवर करने के लिए कोई प्रावधान नहीं थे, और अब बिना किसी संवाद तंत्र के, इन हथियारों का विकास अनियंत्रित हो जाएगा।

भारत और दक्षिण एशिया पर प्रभाव

भारत के लिए न्यू स्टार्ट का अंत एक दोहरी चुनौती पेश करता है। एक ओर जहाँ वैश्विक स्तर पर परमाणु अस्थिरता बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर हमारे पड़ोस में चीन और पाकिस्तान की परमाणु गतिविधियां भारत को अपनी सुरक्षा नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकती हैं।

वैश्विक निरस्त्रीकरण का जो सपना भारत लंबे समय से देखता रहा है, वह अब और भी धुंधला होता दिख रहा है। जब महाशक्तियाँ ही संधियों से पीछे हट रही हों, तो अन्य देशों को संयम बरतने के लिए प्रेरित करना कठिन हो जाता है।

एक अनिश्चित भविष्य की ओर कदम न्यू स्टार्ट का अंत केवल एक कानूनी दस्तावेज का समाप्त होना नहीं है, बल्कि यह उस 'राजनीतिक इच्छाशक्ति' की हार है जो मानती थी कि परमाणु युद्ध कभी जीता नहीं जा सकता और इसलिए इसे कभी लड़ा नहीं जाना चाहिए। शीत युद्ध के बाद के दशकों में हमने जिस 'लॉन्ग पीस' (लंबी शांति) का अनुभव किया, उसकी नींव इन्हीं नियंत्रण संधियों पर टिकी थी।

अनियंत्रित हथियार दौड़ अंततः टकराव

सवाल यह नहीं है कि पुरानी संधियाँ क्यों टूटीं, बल्कि यह है कि क्या आज का नेतृत्व नई वास्तविकताओं, जैसे उभरता हुआ चीन, साइबर युद्ध और हाइपरसोनिक तकनीक, के अनुरूप कोई नया, अधिक समावेशी और प्रभावी ढांचा बना पाएगा।

यदि आने वाले महीनों में कोई आपातकालीन संवाद शुरू नहीं होता है, तो इतिहास हमें चेतावनी देता है कि अनियंत्रित हथियार दौड़ अंततः टकराव की ओर ही ले जाती है। न्यू स्टार्ट का अवसान शायद मानवता के लिए एक अंतिम चेतावनी है। पारदर्शिता, संवाद और आपसी संयम के बिना परमाणु युग अब एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से वापसी का रास्ता बहुत कठिन होगा।

दुनिया को अब केवल संधियों की नहीं, बल्कि एक नए 'वैश्विक सुरक्षा दर्शन' की आवश्यकता है, अन्यथा परमाणु हथियारों की यह नई दौड़ हमें विनाश के उस कगार पर ले जाएगी जहाँ से कोई विजेता नहीं निकलेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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