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ऑनलाइन गेमिंग की लत और गाजियाबाद केस: संवेदना और संवाद गायब हुए तो कैसा होगा भावी समाज?

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Fri, 06 Feb 2026 04:00 PM IST
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सार

कोरियन कल्चर (या किसी और कल्चर से भी) से प्रभावित होकर असमय जान गंवाने वाली तीनों लड़कियां समाज से लगभग पूरी तरह कट चुकी थीं या उन्हें काट दिया गया था।

Ghaziabad girls suicide case is a scary glimpse of the future society
गाजियाबाद ट्रिपल सुसाइड केस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में आॅन लाइन गेम्स की लत और वर्चुअल एवं एकाकी दुनिया में जी रही तीन नाबालिग बहनों की खुदकुशी की सिहरा देने वाली घटना को विरल मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस गंभीर घटना की भीतरी पर्तें जिस तरह से खुल रही है, वह इस बात की गंभीर चेतावनी है कि हमारा भावी समाज कैसा होगा?

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इस घटनाक्रम में एक एंगल परिवार में आंतरिक तनाव, एकाकीपन और आपसी संवादहीनता का भी आ रहा है, यदि ऐसा है तो भी यह चेतावनी भरा है कि महज पच्चीस साल बाद मानव समाज में आपसी रिश्ते कैसे और किस दिशा में संचालित होंगे।
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जिन तीन लड़कियों ने आधी रात के बाद बिल्डिंग से छलांग लगाकर अपनी जान दे दी, उनकी डायरी से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस ‘बीटा जनरेशन’ की सोच, समझ, प्राथमिकताएं और सपने क्या हैं? यथार्थ जगत से उनका कितना नाता है?

ये दुर्भाग्यपूर्ण मौतें केवल वर्चुअल वर्ल्ड में जीने का परिणाम है अथवा परिवारिक सहजीवन और परस्परता के तार-तार होने का बुरा संकेत है? युवा होती पीढ़ी की नजर में मुश्किल से मिले मनुष्य जीवन के क्या मायने हैं?

कोरियन कल्चर (या किसी और कल्चर से भी) से प्रभावित होकर असमय जान गंवाने वाली तीनों लड़कियां समाज से लगभग पूरी तरह कट चुकी थीं या उन्हें काट दिया गया था। इसमें उनके परिजनों का भी दोष है। लेकिन जहां ऐसा नहीं है, वहां भी बच्चों की मानसिकता में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है।

चिंता की बात यही है कि भावी समाज किस बुनियाद पर टिका होगा? ऐसा समाज जो, संवेदना, संवाद और सहकार रहित हो, उसे मानव समाज में मुश्किल होगा। कहा जा रहा है कि भावी समाज अति डिजीटल समेकित समाज होगा, और भौतिक और आभासी समाज का हाईब्रिड होगा।

आज अधिकांश बच्चे स्मार्ट फोन के चलते ऑन लाइन गेम्स के लती होते जा रहे हैं। भविष्य के बच्चे तो बचपन से ही स्मार्ट फोन से भी आगे एआई के गुलाम बन जाएंगे। जानकारों को आशंका है कि उनकी अपनी कल्पनाशक्ति, सोच, समझ और संवेदना धीरे-धीरे कुंद होने लगेगी।

वो तंत्र, प्रौद्योगिकी और आभासी विश्व के गुलाम नागरिक बन जाएंगे। यूं संचार क्रांति के चलते  भौतिक दूरियां मिटेंगी, लेकिन भावनात्मक नजदीकियां दूरियों में तब्दील हो जाएंगी। यानी लोग पास आकर भी दूर होते जाएंगे। ऐसा भावी समाज ‘अलोन टुगेदर’ यानी ‘अकेले रहकर साथ रहने वालों’ का होगा।

दुर्भाग्य से आज मोबाइल स्मार्ट फोन बड़़ो से भी ज्यादा बच्चों की लत में तब्दील हो रहा है। कई मांएं तो बच्चों को चुप कराने के लिए खुद ही अपना फोन बच्चों को खेलने के लिए दे देती है। आलम यह है कि बच्चा घर या स्कूल  में ककहरा सीखने से पहले ही नेट चलाना सीख जाता है।

मोबाइल या टैबलेट पर बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम उसे उस दुनिया का नागरिक अभी से बना रहा है, जो कम से कम सामाजिकता के जिंदा रहने की दृष्टि से कतई ठीक नहीं है।

वाई-फाई पर चल रहे ट्रैफिक पर नजर रखने वाली डिवाइस हैप्पीनेट्ज कंपनी के सर्वे में पाया गया कि आज बच्चे इंटरनेट पर वो सब देख रहे हैं, जो उन्हें इस कच्ची उम्र में कतई नहीं देखना चाहिए। फिर चाहे वह यू-ट्यूब हो या फिर आॅन लाइन गेमिंग। इससे नई मानसिक समस्याएं पैदा हो रही है।

हाल में हुई एक स्टडी बताती है कि एक बच्चे को जितनी जल्दी स्मार्टफोन दिया जाता है, उतनी ही जल्दी उसको मेंटल प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट पर बच्चे साइबर बुलीइंग, डेटा प्राइवेसी, इन्फॉर्मेशन लीक जैसी कई तरह की गलत एक्टिविटी की चपेट में आ रहे हैं। मां बाप को इसकी या तो जानकारी नहीं है या फिर वो जानकर भी अनजान हैं।

हकीकत यह है कि स्मार्टफोन की लत के चलते कई बच्चे किसी भी काम पर सही ढंग से फोकस नहीं कर पाते। चुनिंदा बच्चे बहुत कुशाग्र हैं तो कई बच्चों की एकाग्रता लगातार घट रही है।  

विशेषज्ञों का मानना है कि 2040 तक यानी मात्र 14 साल बाद ही वर्च्युअल रियलिटी यानी वीआर (आभासी वास्तविकता) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का आपस में इतना घालमेल हो जाएगा कि उन्हें एक दूसरे से अलग करना मुश्किल होगा।

वर्चुअल रियलिटी के साथ तेजी से बढ़ती मिक्स्ड रियलिटी यानी एमआर (मिश्रित वास्तविकता) तथा एक्सटेंडेड रियलिटी यानी ईआर (विस्तारित वास्तविकता) का तेजी से विस्तार भी इसमें शामिल हो जाएगा। जीवन के हर क्षेत्र में एआई की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण, अनिवार्य और निर्णायक हो जाएगी। एआई को ‘सेकंड सेल्फ’ यानी दूसरा स्वयं भी कहा जा रहा है। जबकि मेटावर्स एक गहन आभासी पर्यावरण होगा, लोग जिसके जरिए ही आपस में संवाद करेंगे।

‘खूब गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो’ जैसे जुमले इतिहास की बात होंगे। हकीकत में लोग एक काल्पनिक और अव्यावहारिक दुनिया में ज्यादा  जीएंगे। वर्चुअल समाज की अर्थव्यवस्था और सामाजिकता भी वर्चुअल ही ज्यादा होगा। प्रत्यक्ष संवाद और मिल बैठकर सुख दुख की बातें गुजरे जमाने की बात होगी।

ज्यादातर लोग अपने में मगन होंगे। सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होने का अवसाद बना रहेगा और जो आत्मघात तक बढ़ सकता है। ऐसी दुनिया में जीवित रहने के लिए लोगों में क्रिटिकल इमरसिव लिटरेसी (निर्णायक गहन साक्षरता) की दरकार होगी।

भावी डिजीटल समाज में मानवीय रिश्ते इस बात से तय होंगे कि हम संवाद किस तरह करते हैं। सोशल मीडिया के रूप में आज हम यह देख ही रहे हैं, जो हमे सतत संवाद की अवस्था में उलझाए रखता है, लेकिन जिसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता बहुत संदिग्ध है। 

उदाहरण के लिए किसी मर चुके व्यक्ति को उसके मेटा पर अनडिलीटेड अकाउंट पर बिना देखे-समझे जन्मदिन की बधाई देते चले जाना है। और ऐसा करने वाले पढ़े लिखे लोग ही होते हैं। ऐसा लगता है कि लोग किसी बात की गहराई और प्रामाणिकता की पुष्टि के परिश्रम को धता बता चुके हैं।

दरअसल, 24x7  संपर्क और संवाद आपको जितना सक्रिय रखता है, उतना ही आपकी निजता के लिए घातक भी है और वक्त की बर्बादी भी। इससे अकेलापन बढ़ता है और मनुष्य को अवसाद की ओर ले जाता है। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी।

जीवन के कठोर सत्य को स्वीकार कर चुनौतियों से जूझने और संघर्ष का माद्दा घटता जाएगा। ऐसे में कौन कब सुसाइड कर ले या फिर अकारण किसी की हत्या कर दे, कहा नहीं जा सकता।

ऐसे अपराधों की विवेचना और दंड के लिए भी हमे वर्तमान कानूनों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना होगा। इतना ही नहीं, रोमांटिक रिश्ते डेटिंग एप के जरिए ही होंगे। जज्बाती प्रेमपत्र तो अब वैसे भी अतीत की बात बन चुके हैं।  सोशल मीडिया ही भावनाओं के इजहार का अहम माध्यम बन गया है। हाइपर कनेक्टेड विश्व लोगों की निजी जिंदगी को लगभग खत्म कर देगा। जिससे उद्वेलन बढ़ेगा।

ज्यादातर लोग या तो अपने में मगन होंगे या फिर बेचैन और त्रस्त होंगे। अहम सवाल यह है कि क्या हम भावी पीढ़ी को इस अभिशाप से बचा सकते हैं अथवा ऐसी कोशिशों के बाद भी यह पीढ़ी उन दुष्परिणामों से बच पाएगी, जिसके खतरे हमे अभी से स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। कभी संयुक्त परिवार वाले भारतीय समाज में आपसी रिश्ते भी सगेपन तक सीमित हो गए हैं।

ज्यादातर बच्चे अपने चचेरे ममेरे रिश्तेदारों को नहीं जानते या फिर बहुत औपचारिक संपर्क है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बचपन से ही अभिभावक ध्यान दें तो इस समस्या का कुछ तो निदान हो ही सकता है। गाजियाबाद की तीनो गर्ल्स का स्कूल से नाता टूट चुका था। वो पूरी तरह अकेली और आत्मकेन्द्रित हो गई थीं।

भारतीय जीवन मूल्यों के बजाए वर्चुअल वर्ल्ड की कोरियाई जीवन शैली उन्हें सार्थक लगने लगी थी। भले ही असल में खुद कोरियाई लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हों। बचपन में माता पिता के प्यार से वंचित उन लड़कियों ने स्मार्ट फोन पर आॅन लाइन गेमिंग और वर्चुअल दुनिया को ही जीवन का सच मान लिया था।

उससे दूर जाना उनके लिए मृत्यु का वरण था, जो उन्होंने हकीकत में कर दिखाया। उनके दिमाग पर किसी और कब्जा हो चुका था। यही कारण था कि 80 फीट ऊंचाई से कूदने में भी जान जाने का डर नहीं लगा। मनोचिकित्सकों के अनुसार जब बच्चे ऑनलाइन गेम्स खेलते हैं या सोशल मीडिया पर रील्स देखते हैं तो उनके दिमाग में डोपामाइन हार्मोन का स्राव होता है।

ऐसे में यदि कोई रोकता या टोकता है तो वह आक्रामक हो जाते हैं।  मोबाइल पर चलती रील्स बच्चों, किशोरों के दिमाग पर कब्जा कर लेती हैं। नतीजतन पढ़ाई और काम से दूरी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और आत्मघाती विचार इसके प्रमुख लक्षण बनते हैं।

एकल परिवार होने और मां-बाप के कॅरियर और कमाई में व्यस्त होने से बच्चे ऐसी वर्चअल दुनिया की तरफ मुड़ जाते हैं, जहां से लौटने का रास्ता कम ही बचता है। गाजियाबाद वाली घटना में भी तीनों बहनों ने कमरे की दीवारों पर अलग-अलग कटिंग लगा रखी थीं। उसी कमरे में तीनों अधिकतर समय बिताती थीं। पिता ने उनका मोबाइल फोन छीनकर बेच दिया था। इससे वो बहुत आहत थीं।

इसी साल भोपाल में 14 साल के एक बच्चे ने इसलिए फांसी लगा ली, क्योंकि उसके परिजनों ने उसे मोबाइल पर ‘फ्री फायर’ गेम खेलने से रोका था। इसी तरह केरल में भी एक नाबालिग लड़की जो मोबाइल पर कोरियन पॉप कल्चर से अत्यधिक प्रभावित थी, ने अकेलेपन से परेशान होकर खुदकुशी कर ली थी। यह तो अभी शुरूआत है।

कुछ देशों में बच्चों के मोबाइल रखने और ऑन लाइन गेम खेलने  पर रोक लगाई गई है। लेकिन यह भी समस्या का आंशिक इलाज ही है। प्रौद्योगिकी के आक्रमण और विकास को रोक पाना मनुष्य के बस में है या नहीं, यही अब सबसे बड़ा सवाल है। और इस हमले की छाया में जो पीढ़ी जवान होगी, उसका सामाजिक जीवन क्या होगा, होगा भी या नहीं, यह प्रश्न भी कंपकंपी पैदा करने वाला है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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