मोबाइल गेम की अंधेरी दुनिया: अपने बच्चों को डिजिटल नहीं, इमोशनल टच दें
Ghaziabad Triple Suicide Case: यह लेख गाजियाबाद की त्रासदी के संदर्भ में मोबाइल गेम्स के मनोवैज्ञानिक जाल और किशोरों के मानसिक संकट को उजागर करता है। समाधान के लिए डिजिटल साक्षरता, सरकारी प्रोएक्टिव कदम और परिवारों के बीच भावनात्मक संवाद को तकनीकी प्रतिबंधों से अधिक जरूरी बताया गया है।
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Dark Reality Of Online Games: वैसे यह चर्चा नई नहीं है, लेकिन गाजियाबाद की एक सोसायटी में तीन बहनों की सामूहिक खुदकुशी के बाद मोबाइल गेम्स की अंधेरी दुनिया एकबार फिर चर्चाओं में है। तकनीक के स्याह कोनों से कुछ ऐसी अदृश्य परछाइयां उभर रही हैं, जो हमारे घर के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले कोनों, बच्चों के कमरों तक पहुंच गई हैं।
ब्लू व्हेल, मोमो चैलेंज जैसे नाम महज कुछ मोबाइल गेम नहीं हैं, बल्कि ये किशोरों की कोमल संवेदनाओं और उनके अनछुए अकेलेपन को निशाना बनाने वाले मनोवैज्ञानिक जाल हैं। किशोरों द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी भावी पीढ़ी एक गहरे मानसिक संकट से जूझ रही है, जिसे हम अक्सर सिर्फ इंटरनेट का प्रभाव कहकर टाल देते हैं।
किशोरावस्था एक ऐसा दौर होता है, जहां व्यक्ति अपनी पहचान की तलाश में होता है। इस उम्र में रोमांच और स्वीकृति की भूख सबसे अधिक होती है। ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक मोबाइल गेम इसी का लाभ उठाते हैं। ये गेम किसी सामान्य वीडियो गेम की तरह नहीं होते। ये सोशल इंजीनियरिंग और बिहेवियरल कंडीशनिंग के सिद्धांतों पर काम करते हैं।
शुरुआत में ये गेम बहुत छोटे और उत्साहजनक टास्क देते हैं, जिन्हें पूरा करने पर बच्चे को बहादुर होने का अहसास कराया जाता है। यह अहसास उसके दिमाग में डोपामाइन का स्राव करता है, जो उसे और अधिक जोखिम लेने के लिए उकसाता है।
धीरे-धीरे, ये टास्क डरावने और आत्मघाती होने लगते हैं। यहां सनक और डर का एक ऐसा कॉकटेल तैयार किया जाता है, जहां बच्चा चाहकर भी पीछे नहीं हट पाता। मनोवैज्ञानिक इसे गैसलाइटिंग कहते हैं, जहां अपराधी बच्चे को यह यकीन दिला देते हैं कि अब पीछे हटने का रास्ता बंद हो चुका है। मौत ही एकमात्र समाधान है।
नींद की कमी (चूंकि कई टास्क रात के अंधेरे में पूरे करने होते हैं) सोचने-समझने की शक्ति को क्षीण कर देती है, जिससे किशोर पूरी तरह से क्यूबरेटर (एडमिन) के नियंत्रण में आ जाता है।
खतरनाक मोबाइल गेम के संकट को रोकने के लिए सरकार की भूमिका केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं हो सकती। अक्सर देखा गया है कि जैसे ही सरकार किसी एक लिंक या ऐप को ब्लॉक करती है, वह किसी दूसरे नाम या रूप में फिर से सक्रिय हो जाता है। सरकार को यहां रिएक्टिव होने के बजाय प्रोएक्टिव होने की आवश्यकता है।
सर्वप्रथम, सरकार को शिक्षा प्रणाली में डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।
स्कूलों में केवल कंप्यूटर चलाना सिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल नागरिकता और इंटरनेट के खतरों की पहचान करना सिखाना समय की मांग है। दूसरा, प्रत्येक जिले में साइबर-साइकोलॉजी विंग की स्थापना होनी चाहिए, जहां प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक और साइबर विशेषज्ञ मिलकर काम करें। सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त एल्गोरिदम ऑडिट लागू करना चाहिए, ताकि वे किशोरों को ऐसे डार्क कंटेंट की ओर न धकेलें।
सरकार को इस समस्या का समाधान केवल तकनीकी प्रतिबंध या सेंसरशिप में नहीं ढूंढना चाहिए। अत्यधिक सख्ती अक्सर बच्चों को डार्क वेब जैसे और अधिक असुरक्षित रास्तों की ओर धकेल देती है।
सरकार को इसे केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं मानना चाहिए। यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महामारी है, जिसे केवल डंडे के जोर पर नहीं रोका जा सकता। पुलिसिया जांच के दौरान पीड़ित परिवारों के साथ संवेदनशीलता बरतना जरूरी है, ताकि अन्य लोग डर के बजाय मदद के लिए सामने आ सकें।
सुसाइड गेम्स की सफलता की सबसे बड़ी वजह हमारे समाज में बढ़ती संवादहीनता है। अक्सर बच्चे इन जालों में तभी फंसते हैं, जब उन्हें घर पर सुनने या समझने वाला कोई नहीं होता। जब माता-पिता काम में व्यस्त होते हैं और बच्चा फोन के साथ अकेला होता है तो वह अनजाने में ऐसे समूहों का हिस्सा बन जाता है, जहां उसे महत्व मिलने का भ्रम होता है।
इसलिए डिजिटल डिटॉक्स से अधिक जरूरी इमोशनल कनेक्ट है। यदि बच्चा अपने माता-पिता के साथ अपनी हर छोटी उलझन साझा करने में सहज है तो कोई भी आभासी खेल उसे मौत के मुहाने तक नहीं ले जा सकता।
ब्लू व्हेल, मोमो जैसे खतरे केवल इंटरनेट की बुराइयां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे समाज के खोखले होते जा रहे भावनात्मक ढांचे का प्रतिबिंब हैं। यह समय केवल तकनीक को दोष देने का नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदा के विरासत भी, विकास भी के मंत्र में विरासत का अर्थ केवल ऐतिहासिक स्मारकों को बचाना नहीं है, बल्कि हमारे उस पारिवारिक ताने-बाने को बचाना भी है, जहां संवाद और संवेदना प्राथमिक थे। सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करना होगा, जहां हमारे किशोरों को आभासी रोमांच की तलाश में अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े।
हमें उन्हें यह सिखाना होगा कि हारना, असफल होना या उदास होना सामान्य है। इसके लिए जान देना कोई वीरता नहीं है। इंटरनेट को एक औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसे अपनी जिंदगी का मालिक बना देना चाहिए।
जब तक हम सामूहिक रूप से किशोर मन की इन जटिलताओं को नहीं समझेंगे, तब तक आभासी दुनिया के ये शिकारी हमारे नौनिहालों का शिकार करते रहेंगे। यह समय जागने का है, इससे पहले कि एक और चिराग डिजिटल अंधेरे की भेंट चढ़ जाए।
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