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दतिया उपचुनाव: नरोत्तम के बहाने भाजपा में साठ पार वालों को कड़ा संदेश
सार
आशुतोष तिवारी को टिकट देने की खबर सुनकर दतिया में नरोत्तम समर्थकों ने 12 घंटे तक बवाल मचाया, हिंसा और आगजनी की, लेकिन पार्टी आला कमान के सख्त तेवरों के आगे उसकी सुदर्शन छवि की भी एक न चली। झक मारकर नरोत्तम को आशुतोष का समर्थन करने का ऐलान करना पड़ा।
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नरोत्तम मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में भाजपा द्वारा अपने दिग्गज नेता, पिछला विस चुनाव हारे तथा इस बार मंत्री पद की शपथ लेने का मंसूबा पाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा को दरकिनार कर एक दूसरे ब्राह्मण और युवा नेता आशुतोष तिवारी को टिकट देकर न केवल नरोत्तम मिश्रा बल्कि पार्टी के उन तमाम साठ पार नेताओं को बड़ा संदेश दे दिया है कि वो अब बोरिया बिस्तर बांधने की तैयारी कर लें।
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भाजपा में पिछले साल पीढ़ी परिवर्तन (दो शीर्ष नेताओं को छोड़कर) का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो अब उपचुनावों में प्रत्याशी चयन में पल्लवित होता दिखाई दे रहा है। हालांकि आशुतोष तिवारी को टिकट देने की खबर सुनकर दतिया में नरोत्तम समर्थकों ने 12 घंटे तक बवाल मचाया, हिंसा और आगजनी की, लेकिन पार्टी आला कमान के सख्त तेवरों के आगे उसकी सुदर्शन छवि की भी एक न चली।
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झक मारकर नरोत्तम को आशुतोष का समर्थन करने का ऐलान करना पड़ा। वैसे अंदरखाने नरोत्तम का टिकट कटवाने के पीछे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका पर सवाल उठ रहा है। क्योंकि ऐसा होने से जहां प्रदेश में एक और सत्ता केन्द्र उभरने की संभावना की भ्रूण हत्या हो गई और अगर भाजपा यह उपचुनाव हारी तो भीतरघात का संशय नरोत्तम पर ही जाएगा। यानी एक तीर से दो शिकार वाली स्थिति है। कुल मिलाकर हरदम चमकता चेहरा लेकर घूमने वाले नरोत्तम की राजनीति का यह दि एंड हो सकता है।
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विडंबना यह है कि नरोत्तम किसी जमाने में खुद को राज्य का सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित करने में लगे थे। कमलनाथ सरकार गिराने में जिन लोगों की सक्रिय भूमिका रही, उनमें नरोत्तम का भी नाम था। इसके पहले वो प्रदेश के गृह मंत्री भी रहे और यश और धन दोनो खूब कमाया।
दूसरी तरफ अपने ही विधानसभा क्षेत्र में उनकी छवि लगातार खराब होती गई। कुछ लोग तो उन्हें ‘दतिया का डॉन’ तक कहने लगे थे। 2018 का विस चुनाव भी वो महज ढाई हजार वोटों से जीत पाए थे। इस बार भी दतिया के कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती का बैंक फ्रॉड केस में चुनाव रद्द होना भी नरोत्तम के भाग्य का छींका नहीं बन सका।
दरअसल नरोत्तम मिश्रा दतिया में आयातित नेता हैं। वो मूलत: ग्वालियर के हैं और शुरू में डबरा विधानसभा सीट से जीतते रहे हैं। परिसीमन में जब डबरा सीट आरक्षित हो गई तो नरोत्तम दतिया इसलिए चले आए, क्योंकि यह अनारक्षित होने के साथ-साथ यहां ब्राह्मण वोटरों की संख्या काफी है। धीरे-धीरे नरोत्तम ने यहां अपनी सल्तनत कायम कर ली।
उसी अनुपात में वो लोगों के बीच अलोकप्रिय भी होते गए। पुत्र प्रेम के कारण जिन लोगों का राजनीतिक कॅरियर प्रभावित हुआ, नरोत्तम भी उन्हीं में से एक हैं। लगातार चुनाव जीतने वाले नेता अक्सर यह मुगालता पाल लेते हैं कि वो अजेय और मर्जी के मालिक हैं।
नतीजा यह हुआ कि 2023 में जब पूरे प्रदेश में भाजपा की लहर चल रही थी, नरोत्तम पौने 8 हजार वोटों से अपनी सीट कांग्रेस के राजेन्द्र भारती के हाथों गवां बैठे। चुनाव नतीजों के पहले तक नरोत्तम मंत्री तो ठीक, मुख्यमंत्री बनने का सुनहरा सपना पाले थे।
उनकी देह भाषा भी उसी अंदाज में हिलोरें लेने लगी थीं। लेकिन लोकतंत्र में होनी जनता के हाथ में होती है। मजबूत इच्छाशक्ति और अपार महत्वाकांक्षा के बाद भी जनता ने ही दगा दे दिया और नरोत्तम को घर बैठना पड़ा।
नरोत्तम मिश्रा को यह मुगालता भी रहा कि ‘हाईकमान’ से अच्छी ट्यूनिंग के चलते उनका ठीक से पुनर्वास होगा। लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। न सत्ता में न संगठन में। मारक मुस्कान के बावजूद करनी का बोझ वो सिर से कभी न उतार सके।
नरोत्तम का टिकट क्यों कटा?
नरोत्तम का टिकट क्यों कटा, इसको लेकर कई तरह की थ्योरियां में हैं। पहला तो यह कि पार्टी की राज्य इकाई ने नरोत्तम के इसरार पर उपचुनाव के लिए एक ही नाम आला कमान को भेजा था, लेकिन आला कमान ने अपने स्तर पर अलग से फीड बैक लिया और पाया कि नरोत्तम पे दांव लगाना जोखिम भरा है। अर्थात उनके प्रति आम जनता में नाराजी अभी भी कम नहीं हुई है।
हालांकि इस सीट पर हार-जीत से मोहन यादव सरकार की सेहत पर फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सीट हारने से यह गलत संदेश जरूर जाता कि ये सरकार उपचुनाव जीत नहीं पाती, क्योंकि पिछले साल वह विजयपुर उपचुनाव हार चुकी है। तब पार्टी का एक सिटिंग मंत्री उपचुनाव हार गया था। भाजपा और खुद मोहन यादव भी यह जोखिम उठाने के लिए शायद ही तैयार होते।
संभव है कि मुख्यमंत्री ने राज्य इकाई के जरिए नरोत्तम का नाम भिजवा दिया हो, लेकिन बाद में चैनल टू के जरिए कटवा भी दिया हो। लेकिन यह भी अनुमान है। लेकिन इसे बल इस बात से मिलता है कि टिकट कटने पर दतिया में नरोत्तम समर्थकों द्वारा काटे बवाल के बाद मुख्यमंत्री और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने नरोत्तम को मुख्यमंत्री निवास तलब किया और तगड़ी ‘समझाइश’ दी। उसके बाद नरोत्तम के तेवर ठंडे पड़ गए। सार्वजनिक रूप से कहा कि जो पार्टी कहेगी, वह शिरोधार्य है।
सत्तर पार नेताओं के लिए संदेश
मप्र में इस वक्त जिन नेताओं के हाथ में कमान है, उनमें कतिपय अपवाद को छोड़ दें तो ज्यादातर साठ के आसपास या उससे कम उम्र के ही हैं। सत्तर की टच लाइन को छूने या पार करने वालों के लिए साफ संदेश है कि वो नए लोगों के लिए सिंहासन खाली करें, मुख्यमंत्री पद की ख्वाहिश पालना तो बहुत दूर की बात है।
ऐसे लोग चाहिए जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष 45 वर्षीय नितिन नबीन को बेझिझक ‘सर’ कह सकें। लिहाजा वर्तमान केन्द्रीय मंत्री और पूर्व में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को छोड़ दें तो ‘डेंजर झोन’ में चल रहे तमाम नेताओं को भाजपा नेतृत्व ने रेड सिग्नल दे दिया है।
यानी मानकर चलें कि यह उनकी यह पारी सत्ता की राजनीति में आखिरी हो सकती है। इस डेंजर झोन में नरेन्द्र सिंह तोमर,कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल आदि प्रमुख हैं। इसमें नरोत्तम मिश्रा भी शुमार हो गए हैं। कुलमिलाकर शिवराज की पीढ़ी के तमाम लोग अब चार धाम की यात्रा की तैयारी कर लें।
इस समूचे घटनाक्रम ने 66 वर्षीय नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक भविष्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। जिस कारण से उनका टिकट काटा बताया जाता है, उसके निदान में तो बरसों लग सकते हैं, तब तक प्रदेश की राजनीति में बहुत सारा पानी बह चुका होगा। इस बीच नया नेतृत्व अपनी जड़ें जमा ले तो नरोत्तम के पास हरिभजन के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।
वैसे भी तीन दशकों से राजनीति में रचे पगे नरोत्तम के लिए ‘रिटायरमेंट’ की जिंदगी जीना मुश्किल है। जिस तरह उनके समर्थकों ने दतिया में बवाल काटा, उसके बाद संगठन में उनके पुनर्वास की संभावना पर भी पत्थर पड़़ गए हैं। दूसरे, अपने पुत्र को राजनीति में आगे बढ़ाने की योजना का रायता भी फैलता दिख रहा है।
नरोत्तम के सियासी सितारे चमकने की संभावना इसलिए भी न्यून थी, क्योंकि मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव राजनीतिक महत्वाकांक्षा की रेस में एक और खिलाड़ी को गवारा नहीं कर सकते थे। कोई भी मुख्यमंत्री नहीं चाहता। चूंकि पार्टी में अपेक्षकृत नई पीढ़ी के लिए मैदान साफ किया जा रहा है, इसलिए उसमें नरोत्तमों की बलि तो चढ़नी ही है। फिर अंतिम नतीजा जो हो।
दतिया की घटना इस संगठनात्मक संकल्प का पायलेट प्रोजेक्ट माना जाना चाहिए। धीरे-धीरे यह अन्य राज्यों पर भी लागू होगा। इस सफाई योजना को संघ का समर्थन भी प्राप्त है। अब देखना यह है कि बात कितनी दूर तलक जाती है।
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