ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन: ऋषि सुनक की राह भी कांटों भरी है
ऋषि सुनक के लिए आगे चुनौतियों का अम्बार है। सबसे पहले तो उन्हें अपने आप से लड़ाई जीतनी है। वित्तमंत्री के रूप में तो वे अपने आप को कोविड काल में प्रमाणित कर चुके हैं और इसी पहचान के कारण पार्टी में उन्हें बहुमत का समर्थन मिला है।
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ब्रिटेन ने वही किया ,जो उसे करना चाहिए था। उसके पास कोई विकल्प भी नहीं था। ऋषि सुनक को प्रधानमंत्री जैसा पद सौंपते हुए कंज़र्वेटिव पार्टी के परंपरागत समर्थक वर्ग में एक झिझक भी थी। जिस मुल्क़ को उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा ,अब वहाc का एक प्रतिभाशाली नौजवान उनके देश की दुर्दशा को सुधारने के लिए प्राण प्रण से संकल्प लेकर जुट गया है, लेकिन क्या इस नौजवान और उत्साही राजनेता का सियासी सफ़र बहुत आसान है? शायद नहीं। ब्रिटेन की मौजूदा मुसीबतें उसके अपने तंत्र और नाक़ाबिल नेताओं की देन हैं, इसलिए कोई जादू की छड़ी घुमा देगा और वे समाप्त हो जाएंगीं, यह समझना भी नासमझी होगी।
ऋषि सुनक के लिए आगे चुनौतियों का अम्बार है। सबसे पहले तो उन्हें अपने आप से लड़ाई जीतनी है। वित्तमंत्री के रूप में तो वे अपने आप को कोविड काल में प्रमाणित कर चुके हैं और इसी पहचान के कारण पार्टी में उन्हें बहुमत का समर्थन मिला है। इस आधार पर उनकी चुनौती का आकार और विकराल हो जाता है, क्योंकि वे भारतीय हैं।
विकट और विषम आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे देश को अगर उन्होंने उबार लिया तो वे एक महानायक के रूप में उभरेंगे और दशकों तक याद किए जाएंगे, लेकिन यदि वे नाकाम रहे तो भारतीयों के बारे में गोरों की धारणा स्थाई तौर पर बदल जाएगी। इसलिए ऋषि के लिए अपने आप से यह जंग जीतनी ज़रूरी है, इसके लिए उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा।
कठिन दौर से गुजर रहा है ब्रिटेन
दरअसल ब्रिटेन पहली बार अत्यंत ग़रीबी का सामना कर रहा है। वित्तीय बाज़ार ताज़ा दौर में उसके खिलाफ खड़ा नज़र आता है। सितंबर में जब ऋषि को पराजित कर लिज़ ट्रस ने प्रधानमंत्री पद संभाला था तो ब्रिटेन के लोग उनसे बड़ी आस लगाए बैठे थे। इसके चंद रोज बाद ही उनकी सरकार ने मिनी बजट का ऐलान किया। इसमें 45 अरब की टैक्स कटौती की बात कही गई थी। इससे समूचे बाज़ार में अस्थिरता और अफरा-तफरी की स्थिति बन गई।
डॉलर के मुकाबले पौंड अपने न्यूनतम स्तर पर जा पहुंचा। सरकार बैक फुट पर आ गई और उसने आयकर की ऊंची दरों वाला फैसला पलट दिया। लिज़ ट्रस पहले महीने में ही विवादों से घिर गई, तब उन्होंने अपने वित्तीय निर्णयों में साझीदार चांसलर क्वारटेज को बर्ख़ास्त कर दिया और जेरेमी हंट को नया वित्तमंत्री बनाया।
सरकार के आए दिन बदलते रंग से गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन तंग आ गईं, उन्होंने भी पद छोड़ दिया। घबराई लिज़ ट्रस ने भी अंततः बीस अक्टूबर को पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने मान लिया कि पार्टी ने उन्हें जो मेंडेट दिया था, उस पर वे खरी नहीं उतरी।
लेकिन आज के ब्रिटेन की तस्वीर वास्तव में कैसी है? वह एक ऐसा राष्ट्र बन चुका है, जिसमें मंहगाई चरम पर है। बिजली का बिल,महीने का किराना ,दूध ,फल और सब्ज़ियां और घरों का किराया जुटाना दूभर हो रहा है। विडंबना तो यह है कि अब अलग होने वाले दंपत्ति भी तलाक़ नहीं ले पा रहे हैं। वजह यह है कि वे अलग घर का ख़र्च नहीं उठा सकते।
एक औसत सामान्य से घर की कीमत ढाई करोड़ रुपये से अधिक है। साल डेढ़ साल पहले यह सिर्फ़ 35 लाख रुपये थी। मकानों के किराए भी लगभग दो गुने हो गए हैं। बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। लोगों के पास किश्त भरने के लिए पैसा नहीं है। ऐसे में तलाक़ चाहने वाले एक घर में एक ही छत के नीचे बिना आपस में बात किए दिन काट रहे हैं।
ब्रिटेन के सरकारी आँकड़े कहते हैं कि इन दिनों तलाक़ के मामले तो घटे हैं पर आपसी संबंधों में तनाव और अवसाद बढ़ रहा है। स्थानीय आवागमन की सेवाएं लड़खड़ा गई हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुविधाएं लचर हो रही हैं। कोविड के बाद से इस देश में शिक्षा का स्तर मुख्य धारा में नहीं लौटा है। बुजुर्ग और विकलांग अपनी सुविधाओं में गिरावट देख रहे हैं। ईंधन आपूर्ति विकट है, सरकार का ख़ज़ाना खाली है। ब्रेक्जिट के बाद यूरोपीय संघ से रिश्ते सामान्य नहीं हुए हैं और रूस-यूक्रेन जंग में निरंतर यूक्रेन को समर्थन के कारण ब्रिटेन की अंदरूनी सेहत खराब है।
ब्रिटेन में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो यह मानता है कि रूस यूक्रेन के बीच युद्ध में ब्रिटेन को तटस्थ रहना चाहिए, पर वह अरसे से अमेरिका का पिछलग्गू बना हुआ है। इस बारे में क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है।
बतौर प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की चुनौतियां
तो इन स्थितियों में कोई भी प्रधानमंत्री क्या करेगा? इसका जवाब ऋषि सुनक की वह छवि है, जो उन्होंने बोरिस जॉनसन मंत्रिमंडल में बतौर वित्तमंत्री कमाई थी। वे घनघोर कोरोना काल में एकदम मौलिक इकोनॉमिक बेल आउट एक्शन प्लान लेकर आए थे। मध्यवर्ग को इससे बड़ी राहत मिली थी। इन्हीं दिनों उन्होंने होटल उद्योग को पंद्रह हज़ार करोड़ पौंड से भी अधिक की सहायता दी।
अगस्त 2021 में उन्होंने कर्मचारियों तथा अपना रोज़गार कर रहे नागरिकों को दो लाख रुपये प्रति व्यक्ति की सहायता दी। इसके बाद कोरोना के दौरान चौपट हो गए पर्यटन उद्योग को भी 10 हज़ार करोड़ पौंड की मदद दी।
कभी होटल में वेटर और दवाओं के डिलीवरी बॉय का काम कर चुके ऋषि सुनक को मध्यम वर्ग की तकलीफें विचलित करती हैं, इसलिए जब उन्हें बोरिस जॉनसन के मंत्रिमंडल में काम करने का उन्मुक्त अवसर नहीं मिला तो उन्होंने मुक्त होना ही बेहतर समझा था। उनका भारतीय अमीर ससुराल भी उन्हें आम आदमी से दूर नहीं कर सकी और शायद यही वह भरोसा है ,जिसके दम पर ऋषि सुनक गोरों को मुश्किलों से बाहर निकालने का काम कर सकते हैं।
वैसे तो यह अनुमान लगाना तनिक जल्दबाज़ी होगी कि ऋषि की चुनौतियों को सुलझाने में हिन्दुस्तान किस तरह सहायता कर सकता है ,पर यह तो निश्चित है कि भारत ने वर्तमान में चीन के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के बावजूद कारोबारी खिड़की खोल कर रखी है। जितना व्यापार विनिमय इस शातिर और धूर्त पड़ोसी के साथ हो रहा है ,उसका आधा भी ब्रिटेन के साथ हो तो उसके लिए प्राणवायु साबित होगा। शायद इसीलिए दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता अब गंभीर शक्ल ले चुका है।
इस समझौते की चर्चा तो बोरिस जॉनसन के कार्यकाल से ही चल रही है। पर, उम्मीद कर सकते हैं कि ऋषि सुनक के कार्यकाल में यह परवान चढ़ेगा। कंप्यूटर टेक्नोलॉजी ,काँच ,लोहा ,स्वास्थ्य ,शिक्षा ,पर्यटन, रक्षा उपकरण और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में बात बढ़ेगी तो दूर तलक जाएगी।
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