कोरोना डायरी-1ः ये चरित्र की परीक्षा का समय है
आपदाएँ होती ही परीक्षा के लिए हैं। हर स्तर पर। व्यक्ति, समाज, राष्ट्र। इस सबसे ऊपर मनुष्यता की परीक्षा।
चीन ने इस आपदा से निपटने के तरीके से अपना राष्ट्रीय चरित्र फिर एक बार स्थापित किया। कैसे भी हो-मार-ठोक कर ही सही, हम अपना काम निकलवा लेंगे। दुनिया से झूठ बोलेंगे। सख्ती करेंगे। संसाधन जुटाएंगे पर कर देंगे। चीन में व्यक्ति और समाज के स्तर पर भी बहुत कुछ घटित हुआ, पर आवाज़ों को दबा दिया गया। जैसे डॉक्टर ली वेनलियांग जिन्होंने सबसे पहले कोरोना को लेकर चेताया था।
इटली के गणतंत्र ने बढ़ते पर्यटक और बढ़ती अर्थव्यवस्था ही देखी है। खुलेपन को अपनी पहचान बनाया है। चीन के वुहान से चमड़ा कारोबार के चलते मिलान के व्यापारिक रिश्ते प्रगाढ़ हैं और आवाजाही भी खूब। खतरे को भांपने में चूक गए। उत्तरी इटली में वायरस फैलने के बाद लोग कब अचानक अपने साथ वायरस लेकर दक्षिण इटली भाग गए, पता ही नहीं चला। अब वहां पूरे देश में तालाबंदी की स्थिति है, अस्पताल कम पड़ गए हैं और वृद्धों को उनके भाग्य पर छोड़ दिया गया है। वो अपनी बालकनियों में गीत गाकर इस डर से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिका भी बच नहीं पाया
अमेरिका आपदा से निपटने में माहिर माना जाता है। शुरुआत में खूब सख्ती भी दिखाई। लेकिन इस वायरस का फैलाव ही कुछ इस तरह से है कि समझना मुश्किल है। दुनिया छोटी हो गई है। मन जुड़े ना जुड़ें दुनिया पहले से अधिक जुड़ी हुई है। आवाजाही और संपर्क चिन्हों को तमाम तकनीक के बाद भी आसानी से ना पहचाना जा सकता है ना मिटाया ही जा सकता है।
अमेरिका अब इस कोशिश में है कि कैसे भी तीसरे चरण की भयावह स्थिति तक ना पहुंचे। वो इस वायरस को चीन का बताकर अभी भी ध्रुवीकरण और अपनी चौधराहट स्थापित करने में लगा है। अमेरिकी डरे हुए हैं। बुरी तरह। लेकिन अपने पूरे सिस्टम के साथ इस युद्ध में लगे हैं। पहले प्रामाणिक टीके की खबर भी अमेरिका से ही आई है और एक महिला पर सीधे इसका प्रयोग करने का साहस भी अमेरिका ने दिखाया है।
भारत में जब हम चीन से आने वाले सच्चे-झूठे खतरनाक वीडियो देख रहे थे तो कुछ डर, कुछ मनोरंजन, कुछ रोमांच और कुछ आनंद के साथ इसको देख रहे थे। पर ये आपदा जल्द ही इस रूप में हमारे घर पर, हमारे सिर पर खड़ी होगी ये बहुत कम ने सोचा होगा। विदेश घूमते, मॉल जाते मोबाइल चलाते हमारे जीवन में कोरोना का कहर इस कदर हावी होगा ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।
वो तो कहते ही हैं ना - जाके पैर ना फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। सो बिवाई पड़ गई। हमने भी देश, समाज और व्यक्ति के स्तर पर कोरोना से अपनी जंग शुरू कर दी।
अलर्ट तो रहे लेकिन इटली का दरवाजा खुला रह गया
देश के स्तर पर हमने चीन से आने वाले खतरे को लेकर अत्यधिक सख्ती बरती, लेकिन इटली का दरवाजा खुला रह गया। बहुत कोशिश करने पर ये खतरा कम हो सकता था। पूरी तरह रोकना इसलिए मुश्किल है कि जो व्यक्ति हवाई अड्डे पर स्वस्थ है वो कोरोना संक्रमित है या नहीं इसे पता लगाने का कोई झटपट तरीका नहीं है। तरीका यही है कि बाहर से आने वाले सभी यात्रियों को 14 दिन की निगरानी में रखने पर ही देश में आने दिया जाता। ये व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाया और वायरस तेजी से घुस आया।
देश के स्तर से आगे तो इस वायरस से समाज और व्यक्ति को ही जूझना है। व्यक्ति को पता है कि वो संक्रमित स्थान से आया है पर इसे हल्के में लेकर घूम रहा है। समाज अपने मेल-जोल के मूल स्वभाव को आसानी से छोड़ नहीं पा रहा। संक्रमित और पॉज़िटिव मरीज पृथक वॉर्ड छोड़कर भाग रहे हैं। अपने साथ दूसरों की जान भी खतरे में डाल रहे हैं। चिकित्सक सेवा में जुटे हैं और स्वास्थ्य अधिकारी और प्रशासन रोज नए नियम बनाने में जुटे हैं।
वहीं दूसरी ओर समाज और व्यक्ति के स्तर पर बहुत से लोग अत्यधिक सतर्क हैं। बहुत सावधान हैं। निर्देशों का पालन कर रहे हैं। बार-बार हाथ धो रहे हैं। कम से कम संपर्क रख रहे हैं। लेकिन सिर्फ उनकी सावधानी से नहीं चलेगा। इस पूरे मामले में तो करे कोई और भरे कोई वाला मामला है।
वायरस चीन से आया है पर दुनिया भुगत रही है। ये विषाणु जैविक हथियार है या नहीं इस पर भी बाद में जांच कर लेंगे, अभी तो मुसीबत सिर पर खड़ी है, इससे निपटना होगा।
देश में जमाखोरी और मुनाफाखोरी के भी खूब किस्से सामने आए हैं। इस पर लानत-मलानत भी खूब हो रही है। बाज़ार से सैनेटाइजर गायब हैं। 50 का मास्क 500 में बिक रहा है। पर वहीं 2 रुपए में मास्क बेचे जाने और दूसरों की मदद के किस्से भी बहुत हैं।
सो ऐसा नहीं हैं कि सब बुरा ही बुरा है। पर मूल मुद्दा है चरित्र की परीक्षा और निर्धारण का।
देश ने आपदाएं पहले भी सही हैं। विदेशी आक्रांताओं और अंग्रेजों की गुलामी से लेकर कई महामारियों तक। सवाल है उससे निपटने के हमारे तरीके का। अधिसंख्य जनता और कई राजा आक्रांताओं के आगे झुक गए। कुछ लड़े और जम कर लड़े।
ऐसे ही कई लोगों ने अंग्रेजों को ही अपना शासक स्वीकार कर लिया। कोई हो नृप, हमें का हानि। उन्हें सेवक भी मिले, पुलिस वाले भी और फौजी भी। सब यहीं से। पर कुछ लोग लड़े खूब लड़े और देश आजाद हो गया। यहां भी कुछ के किए का फायदा सबको मिला।
इतिहास ने मौक़ापरस्तों को कैसे याद किया और लड़ाकों को कैसे ये सबको पता है।
ऐसे ही इस आपदा में चरित्र दिखाने का वक्त है - राष्ट्र के स्तर पर, समाज के स्तर पर और व्यक्ति के स्तर पर।
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