कोरोना डायरी-2: सन्नाटे, वीराने और भय के बीच भीतर डूबता मन
ख़्वाबों में संजोया योरप अब वीरान पड़ा है। प्राग के ऐतिहासिक चार्ल्स ब्रिज का भुतहा सन्नाटा डरावना है। मिलान के चौक सूने हैं और वेनिस की गलियारी नदियों पर गंडोला की बजाय सन्नाटा तैर रहा है। ना नाविक के गीत हैं ना प्रेमिका की शोखियांं। फेसबुक पर अन्य परिवारों के योरप यात्रा के फोटो देखकर पैसे जोड़ने वाले एक अलग ही तरह की उच्छवास छोड़ रहे हैं। बार्सिलोना के पर्यटकों से लबरेज तट सूने पड़े हैं।
न्यूयॉर्क का टाइम्स स्क्वेयर भी एकदम सुनसान पड़ा है। इस चौक की जीवंतता का गवाह रहा हर शख़्स इसकी विरानी से उठ रही हूक से खुद को जोड़ पा रहा है। इधर देश में भी कुतुब मीनार और ताजमहल से लेकर मंदिर-मस्जिद, मॉल-दफ़्तर, चौक-चौराहे सब सूने पड़े हैं। हर जगह बस कोरोना की प्रेत छाया नज़र आती है।
विपत्ति आने पर मंदिर की ओर दौड़ने वाला मन ये देख कर हतप्रभ है कि वहांं भी कोरोना की दीवार खड़ी है। शिर्डी, तिरुपति, सिद्धी विनायक, महाकाल, पीतांबरा पीठ सब बंद। इन धर्मस्थानों पर दर्शन कर, माथा टेक कर मिलने वाला आत्मिक सुकून भी कोरोना ने छीन लिया। प्रार्थना तेज हो गई है। साकार को लेकर मन सुन्न है और निराकार से बिना यत्न के ही मन जुड़ता जा रहा है।
स्कूल, कॉलेज, हवाई जहाज, मेट्रो सब सूने होते जा रहे हैं। क्वारंटाइन, आइसोलेशन और शट डाउन और सोशल डिस्टेन्सिंग, एकांतवास जैसे शब्द कानों में गूंज रहे हैं।
हर मिलने वाला चेहरा डरा रहा है। एक-दूजे के बीच संशय की बड़ी सी खाई है। कहीं ये संक्रमित तो नहीं? दिलों में दूरियांं रखते भी थे तो दिखाते नहीं थे पर इस दूरी की मजबूरी ऐसी है कि रखनी भी है और दिखानी भी। हम तो यों भी हाथ मिला भी रहे थे तो दिल नहीं। गले मिलना रस्मी सा हो गया था। अब तो दिशानिर्देश हैं कि बस नमस्ते ही कर लीजिए। और जिनसे सचमुच मिलना चाहते हैं - हाथ, दिल, गले सब मिलते रहे हैं उनके लिए मन कसमसा रहा है। उन्हें सामने देख कर भी सीने से नहीं लगा पा रहे। मन कोरोना पर लानत-मलानत भेज रहा है।
ये बीमारी मनुष्य चेतना के लिए जबर्दस्त आलोड़न लेकर आई है। सभ्यता की यात्रा में आई तमाम बाधाओं को ध्वस्त करने वाला मनुष्य लड़ भी रहा है और डर भी रहा है। इससे बचाने वाले टीके की खोज भी तेज हो गई है और तब तक इससे बचे रहने के उपाय भी। वैज्ञानिक अपना काम कर रहे हैं, चिकित्सक अपना और सरकारें अपना। बचे जनसमुदाय का मन कभी बाहर दौड़ता है कभी भीतर।
डराने वाली तमाम खबरों के बीच जब किसी के इस बीमारी से लड़कर ठीक हो जाने की खबर आती है तो वो खुश भी हो लेता है। जो घर से काम कर पा रहे हैं वो अपने परिवार के साथ होने के मनोभाव से खुश हैं। बच्चे मन बहलाए रखते हैं। जिन्हें कर्तव्य पथ पर डटे रहना है, सीमा पर, चौराहों पर, अस्पतालों में, चौकी पर, दफ्तर में वो नियम-निर्देशों का पालन कर काम में मन रमाए हुए हैं।
अपने सामने से घटनाओं और खबरों को घटते और गुजरते हुए देख रहे हैं। वो ये ही सोचते हैं माथे के सामने लगाया जा रहा थर्मल स्कैनर शरीर का ताप तो पढ़ लेगा, पर मन का संताप नहीं पढ़ पाएगा कभी। और अभी इस संताप के साथ जीना मजबूरी है मनुष्य की। दिहाड़ी वाले बीमारी से ज्यादा सूनी सड़कों और छिनते रोजगार से आधे हुए जा रहे हैं। इनके इस मासूम से सवाल का जवाब किसी के पास नहीं कि - हमारा दोष क्या है? अब उन्हें क्या बताएं के ये सवाल तो इस वक्त हम चीन से भी नहीं पूछ सकते!
जो कुछ भी हम इस समय देख रहे हैं वो अभूतपूर्व है। मानव सभ्यता ने इससे पहले भी कई महामारियांं और विभीषिकाएंं देखीं। जानें भी इससे ज्यादा गईं। पर ये कुछ अलग है। शेयर बाजार से खेल के मैदान तक और हवाई जहाज से लेकर रेलगाड़ी तक ऐसा असर अभूतपूर्व है। यहांं तक की देवस्थान भी बंद। वो देवस्थान जो ज्ञात इतिहास में यों बंद नहीं हुए। विश्व युध्द में भी नहीं। क्यों? सबकुछ बंद कर देने पर मजबूर कर देने वाला ये विषाणु क्या सचमुच इतना शक्तिशाली है? नहीं। पर उसका भय बहुत बड़ा है। किसको पकड़ेगा और किसको छोड़ेगा ये तय नहीं है।
दरअसल, इसके मूल में है संपर्क। वो संपर्क जो आज की दुनिया का आवश्यक अंग है। हमने बना लिया है। हम संपर्क और मेलजोल बढ़ाना चाहते थे तभी तो सड़कें बनाई, पटरियांं बिछाईं, हवाई जहाज चलाए, मॉल, रेस्तरां और क्लब बनाए। अब आप कह रहे हो की इन सबका उपयोग ना करो! कहीं भी ना जाओ! क्या सच में! अरे फालतू बात है ये सब... ऐसा ही सोचते रहे अधिकतर - पर जब मुसीबत सिर पर खड़ी हो गई तो यों लगा जैसे किसी ने थप्पड़ मार कर ख्वाब से जगाया हो! कुछ हालांकि अब भी ख्वाब में ही हैं .... और कुछ स्थितप्रज्ञ। पर संपर्क बनाए रखने के हमारे मूल पर गहरी चोट पहुंची है और इसी ने दुनिया को हिला दिया है, सब बंद करने पर मजबूर कर दिया है।
इस बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हमेशा इसी तरह की नकारात्मकता के साथ ही जीते थे। जो बस कयामत का ही इंतज़ार करते हैं। बर्बादी के नगमे गाते रहते हैं। अपनी उपलब्धि कुछ हो ना हो - बस ऐसी ही कोई विपदा आएगी और सब खत्म कर देगी, यही सोच कर मेहनत नहीं करते। जब सब डूबना ही है तो श्रम की, प्रयत्न की आवश्यकता ही क्या? इनकी तो इच्छा ही ये है कि सब डूब जाए। मनुष्य की स्वेद बूंदों से निर्मित तमाम सुविधाएं इन्हें भोगनी है पर उस सबको गरियाते भी रहना है। ये जो भी चाहें ..... दुनिया यों तो डूबने वाली नहीं है ... मनुष्य का जीवट है तब तक तो नहीं।
तो मनुष्य की कोरोना से जंग जारी है। कई तरह के दृश्य देखने को मिल रहे हैं। कुछ नकाब भी उतर रहे हैं। कुछ कलई भी खुल रही है। बाहर की ऊहापोह, सन्नाटा, वीरानगी और भय देख कर मन भीतर चला जाता है। ये सही समय भी है। और गहरे उतरने दें। जितना घर के भीतर रहना ज़रूरी है, उस से ज़्यादा ज़रूरी है मन के भीतर उतरना।
इस पोस्ट को लिख ही रहा था कि व्हाट्स एप पर एक फॉरवर्ड किया हुआ एक संदेश आया - क्या पता इंसान ही इस धरती पर वायरस हो और कोरोना उसकी वैक्सीन....
सोचने को मजबूर करने और कितना ही चौंका देने वाले इस विचार से स्पंदित होने के बाद भी इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। मैं ये मानता हूंं कि तमाम विकृतियों के बाद भी मनुष्य अच्छाइयों के लिए अपने आग्रह को बनाए रखेगा। वही उसके अस्तित्व का मूल भी है और हेतु भी। अच्छे लोग कम ही सही पर मानवता को जिलाए रखेंगे। अपनी असभ्यता से भी मनुष्य खुद ही लड़ेगा।
कोरोना से तो खैर हम लड़ ही लेंगे.!
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