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कूटनीति: युद्धाभ्यास का वैश्विक संदेश; समुद्र केवल जलराशि नहीं, बल्कि शक्ति, समृद्धि व रणनीति का केंद्र
अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
Published by: Pavan
Updated Fri, 27 Feb 2026 08:19 AM IST
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सार
विशाखापत्तनम में संपन्न हालिया युद्धाभ्यास का संदेश यही है कि समुद्र टकराव और आक्रामक शक्ति-प्रदर्शन के नहीं, बल्कि साझेदारी व सहयोग के प्रतीक हैं। इस प्रकार के युद्धाभ्यास यह सिद्ध करते हैं कि 21वीं सदी की चुनौतियों का समाधान एकाकी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से किया जा सकता है।
मिलन 2026 युद्धाभ्यास
- फोटो : ANI
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विस्तार
21वीं सदी में समुद्र केवल जलराशि नहीं, बल्कि शक्ति, समृद्धि व रणनीति का केंद्र बन चुके हैं। इस गंभीर सच की रोशनी में भारतीय नौसेना समय-समय पर मित्र देशों की नौसेनाओं के साथ सम्मिलित युद्धाभ्यास करती आई है। इसी शृंखला में विशाखापत्तनम में आयोजित 11 से 25 फरवरी तक चलने वाला बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ अब तक का सबसे बड़ा आयोजन बनकर उभरा है। इसमें 74 देशों के लगभग 90 युद्धपोतों ने भाग लिया है। जहां इसका तात्कालिक प्रभाव उन्नत युद्ध कौशल और बेहतर सामरिक क्षमता के रूप में दिखाई देगा, वहीं इसका दीर्घकालिक उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा, नियम-आधारित व्यवस्था व आपसी भरोसे को सुदृढ़ करना है। भारत की अगुवाई में उसके पूर्वी प्रवेशद्वार पर आयोजित युद्धाभ्यास संकेत देता है कि यह हिंद व प्रशांत महासागर ही नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
समुद्री मार्गों की सुरक्षा सभी देशों की साझा चिंता है। इसी पृष्ठभूमि में विश्व के सभी देश यह महसूस करने लगे हैं कि समुद्री डकैती, तस्करी, आतंकवाद और प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग अनिवार्य है। यह आयोजन भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका को भी रेखांकित करता है। भारत एक ‘विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार’ के रूप में उभर रहा है, जहां उसकी नौसेना न केवल संचालन क्षमता प्रदर्शित करती है, बल्कि समन्वय, प्रशिक्षण व मानवीय सहायता के क्षेत्रों में भी नेतृत्व पेश करती है।
भारत समुद्री क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वर्षों से प्रशंसनीय प्रदर्शन करता आया है, और विशाखापत्तनम का यह ‘मिलन’ उसी सोच और रणनीति का सशक्त उदाहरण है। दरअसल, ऊर्जा और व्यापार के प्रमुख समुद्री मार्गों पर नियंत्रण का प्रयास क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में, बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि समुद्र किसी एक शक्ति का क्षेत्र नहीं, बल्कि साझा धरोहर हैं, जहां नियम-आधारित व्यवस्था का सम्मान आवश्यक है। इस संदर्भ में क्षेत्रीय कूटनीति और संपर्क की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने हमेशा अपने पड़ोसी देशों के साथ सहयोगपूर्ण व सम्मानजनक संबंध की नीति अपनाई है। यह अभ्यास उसी दृष्टिकोण का प्रतीक है।
विशाखापत्तनम में हुए इस युद्धाभ्यास में क्षेत्रीय स्तर पर कनेक्टिविटी, निवेश और आर्थिक कूटनीति के माध्यम से प्रभाव-निर्माण की प्रवृत्तियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, पर पड़ोसी देशों में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों व संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के प्रयास में कभी-कभी सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा की झलक भी दिखाई पड़ने लगती है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के आसपास चीनी नौसेना की बढ़ती ताक-झांक और सक्रियता भी वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है।
इसी दूरदर्शी सोच के साथ विशाखापत्तनम का यह अभ्यास एक संतुलित संदेश भी देता है कि यह न तो टकराव का मंच है, न ही आक्रामक शक्ति-प्रदर्शन का, बल्कि यह साझेदारी, स्थिरता और सहयोग की संस्कृति का प्रतीक है। यहां विभिन्न देशों की नौसेनाएं साथ आकर यह प्रदर्शित करती हैं कि मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग संभव ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। इस प्रकार के युद्धाभ्यास यह सिद्ध करते हैं कि 21वीं सदी की चुनौतियों का समाधान एकाकी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से किया जा सकता है। विशाखापत्तनम में आयोजित इस युद्धाभ्यास को ‘मिलन’ नाम देकर भारत ने इसे केवल सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि वैश्विक सद्भाव और स्थिरता के एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। - edit@amarujala.com
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समुद्री मार्गों की सुरक्षा सभी देशों की साझा चिंता है। इसी पृष्ठभूमि में विश्व के सभी देश यह महसूस करने लगे हैं कि समुद्री डकैती, तस्करी, आतंकवाद और प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग अनिवार्य है। यह आयोजन भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका को भी रेखांकित करता है। भारत एक ‘विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार’ के रूप में उभर रहा है, जहां उसकी नौसेना न केवल संचालन क्षमता प्रदर्शित करती है, बल्कि समन्वय, प्रशिक्षण व मानवीय सहायता के क्षेत्रों में भी नेतृत्व पेश करती है।
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भारत समुद्री क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वर्षों से प्रशंसनीय प्रदर्शन करता आया है, और विशाखापत्तनम का यह ‘मिलन’ उसी सोच और रणनीति का सशक्त उदाहरण है। दरअसल, ऊर्जा और व्यापार के प्रमुख समुद्री मार्गों पर नियंत्रण का प्रयास क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में, बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि समुद्र किसी एक शक्ति का क्षेत्र नहीं, बल्कि साझा धरोहर हैं, जहां नियम-आधारित व्यवस्था का सम्मान आवश्यक है। इस संदर्भ में क्षेत्रीय कूटनीति और संपर्क की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने हमेशा अपने पड़ोसी देशों के साथ सहयोगपूर्ण व सम्मानजनक संबंध की नीति अपनाई है। यह अभ्यास उसी दृष्टिकोण का प्रतीक है।
विशाखापत्तनम में हुए इस युद्धाभ्यास में क्षेत्रीय स्तर पर कनेक्टिविटी, निवेश और आर्थिक कूटनीति के माध्यम से प्रभाव-निर्माण की प्रवृत्तियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, पर पड़ोसी देशों में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों व संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के प्रयास में कभी-कभी सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा की झलक भी दिखाई पड़ने लगती है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के आसपास चीनी नौसेना की बढ़ती ताक-झांक और सक्रियता भी वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है।
इसी दूरदर्शी सोच के साथ विशाखापत्तनम का यह अभ्यास एक संतुलित संदेश भी देता है कि यह न तो टकराव का मंच है, न ही आक्रामक शक्ति-प्रदर्शन का, बल्कि यह साझेदारी, स्थिरता और सहयोग की संस्कृति का प्रतीक है। यहां विभिन्न देशों की नौसेनाएं साथ आकर यह प्रदर्शित करती हैं कि मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग संभव ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। इस प्रकार के युद्धाभ्यास यह सिद्ध करते हैं कि 21वीं सदी की चुनौतियों का समाधान एकाकी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से किया जा सकता है। विशाखापत्तनम में आयोजित इस युद्धाभ्यास को ‘मिलन’ नाम देकर भारत ने इसे केवल सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि वैश्विक सद्भाव और स्थिरता के एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। - edit@amarujala.com