आस-निरास भरे चुनाव: भाजपा, कांग्रेस और आप को खुशी भी दी और गम भी
आम आदमी पार्टी हिमाचल में खाता भी न खोल सकी और कांग्रेस को पीछे धकेलने के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद गुजरात में कांग्रेस से बहुत पीछे रह गई। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के साथ ही उसे राष्ट्रीय दल दर्जे की खुशी मिल गई।
विस्तार
गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव और दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों पर अगर समग्र दृष्टि डाली जाए तो इन नतीजों ने जीजान से जुटे और पूरी ताकत से जूझे हुए सत्ता के दावेदार तीनों राजनीतिक दलों को झटका भी दिया तो जश्न मनाने का मौका भी दे दिया। राजनीति में जब झटका लगता है तो उसके किरदार अपना गम छिपाने का बहाना ढूंढ ही लेते है, लेकिन जब खुशी का थोड़ा भी मौका मिलता है तो उसे मनाने और भुनाने की कोई कसर नहीं छोड़ते। इन चुनाव नजीजों ने तो गम भी दिया तो गम गलत करने के लिए भाजपा, कांग्रेस और आप को खुशियां भी दे दी। अब देखना यह है कि इन दलों को जो झटके मिले हैं उन पर आगे के लिए कितना मनन करते हैं। अब आगे चुनाव ही चुनाव हैं और 2024 में देश की सत्ता के लिए चुनावी महाभारत तय है।
तीनों दलों को चिन्तन मनन का मिला मौका
इन चुनावों में विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को हिमाचल प्रदेश में झटका लगा तो गुजरात में उसके हाथ ऐतिहासिक जीत लग गई। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को गुजरात में शर्मनाक हार से गुजरना पड़ा। मगर हिमाचल में उसने भाजपा से आराम से सत्ता छीन ली।
तीसरी किरदार आम आदमी पार्टी हिमाचल में खाता भी न खोल सकी और कांग्रेस को पीछे धकेलने के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद गुजरात में कांग्रेस से बहुत पीछे रह गई। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के साथ ही उसे राष्ट्रीय दल दर्जे की खुशी मिल गई। इस तरह इन चुनावों ने तीनों ही दलों को खुशी और गम, दोनों ही देकर आत्म चिन्तन के लिए वक्त दे दिया।
गुजरात में रिकार्ड और हिमाचल में दिल टूटा
भारतीय जनता पार्टी का गुजरात में चुनाव जीतना पहले ही तय माना जा रहा था। जीत का अंतर भी काफी अनुमानित था, मगर इतनी बड़ी जीत की संभवतः भाजपाइयों को भी उम्मीद नहीं रही होगी। वहीं, एजेंसियों ने हिमाचल में तो भाजपा को बहुमत मिलते हुए दिखाया, मगर गुजरात में इतनी बड़ी जीत की कल्पना नहीं की।
भाजपा की जीत प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य होने, मोदी का करिश्मा और गुजरात के गौरव जैसे भावानात्मक कारणों से सुनिश्चित ही थी। सन् 2017 के मुश्किल चुनाव कोध्यान में रख कर न केवल भाजपा ने, अपितु प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी ताकत झोंक दी थी। उन्हें 2017 के चुनाव की तरह अपने सम्मान और स्वाभिमान को गुजरात के स्वाभिमान से जोड़ना पड़ा। देशभर से गुजरात गए बाकी पार्टी नेताओं का ध्यान भी हिन्दुत्व पर रहा। इसलिए भाजपा की भारी जीत पहले ही पक्की हो गई थी।
भाजपा के खाते से एक राज्य घटा अगले साल 3 बचाने हैं
वहीं, भाजपा को हिमाचल से जो झटका लगा उसकी गूंज आने वाले चुनावों तक जा सकती है। वह इसलिए कि हार के मंहंगाई, बेराजगारी, भ्रटाचार और एंटी इन्कम्बेंसी जैसे जो कारण हिमाचल में थे वे अगले साल 9 राज्यों में होने वाले चुनावों में उभर सकते हैं। भाजपा ने उत्तराखण्ड में बारी-बारी चुनाव जीतने का ट्रेंड तो तोड़ दिया मगर ट्रेंड को हिमाचल में पूरी ताकत लगाने के बाद भी तोड़ न सकी। मोदी जी का करिश्मा इस हिमालयी राज्य में न चल सका।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केन्द्रीय मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर के क्षेत्रों में तक पार्टी हार गई। भाजपा अब तक 12 राज्यों में पूरी तरह और महाराष्ट्र में सिन्दे गुट की शिवसेना के साथ सत्ता भागीदार थी। हिमाचल के हाथ से निकलने के बाद उसके पास 11 राज्य रह गए जहां पूरी तरह उसकी हुकूमत है। अगले साल होने वाले चुनाव में उसे त्रिपुरा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की सत्ता भी बचानी है। जहां उसका मुख्य मुकाबला कांग्रेस से होगा। हालांकि आम आदमी पार्टी वहां भी भाजपा की मदद कर सकती है।
कांग्रेस को शर्मनाक हार और शानदार जीत दोनों मिलीं
गुजरात विधानसभा के 2017 में हुए चुनाव में कांग्रेस अपने नेताओं के बड़बोलेपन के कारण सत्ता के करीब आते-आते दूर छिटक गई थी। लेकिन इस बार की मोदी लहर ने उसे मान्यता प्राप्त विपक्षी दल कहलाने लायक भी नहीं छोड़ा। इतनी शर्मनाक हार के बावजूद कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों ने नई ऊर्जा और नई उम्मीद परोस कर दे दी। अब उसके पाले में तीन की जगह चार राज्य आ गए। वह तमिलनाडु, बिहार और झारखंड की सत्ता में भी मित्र दलों के साथ पार्टनर है।
फिर भी नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व वाली महाबली पार्टी भाजपा से उसका एक राज्य छीनना कोई आसान काम नहीं था। इससे पहले उत्तराखण्ड में कांग्रेस सत्ता छीनने का विफल प्रयास कर चुकी थी। जब ’’आप’’ जैसा नया नवेला क्षेत्रीय दल कांग्रेस को हराकर उसकी जगह लेना चाहता हो और निराशा के घटाटोप में डूबते जहाज की तरह पंछी उसे छोड़ रहे हों, ऐसे मौके पर भाजपा जैसी पार्टी को एक राज्य में हराना कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
अब कांग्रेस को आगे बचे गढ़ बचाने की चुनौती
राहुल गांधी तो 2024 के लिए मैदान तैयार कर ही रहे हैं, लेकिन उससे पहले कांग्रेस के सामने 2023 में अपने राज्यों का कुनबा बढ़ाने से पहले राजस्थान और छत्तीसगढ़ के गढ़ों को बचाने की चुनौती है। राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच का शीत युद्ध किसी से छिपा नहीं रह गया है। कांग्रेस की कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी संभावनाएं हैं। कर्नाटक में 2018 में कांग्रेस जनता दल सेकुलर के साथ सरकार बना चुकी थी, लेकिन अगले ही साल भाजपा के येदुरप्पा के हाथों उसका गठबंधन सत्ता गंवा बैठा। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के कारण मध्य प्रदेश में भी जीती हुई बाजी हाथ से निकल गई थी।
हिमाचल में जीरो पर आउट आप राष्ट्रीय दल बनी
इन चुनावों में हिमाचल में खाता भी न खोल सकने और गुजरात में केवल 5 सीटों पर संतोष करने वाली आम आदमी पार्टी सबसे अधिक गदगद नजर आ रही है। वह इन दोनों राज्यों में भाजपा से सत्ता छीनने के लिए मैदान में उतरी थी और इस उद्धेश्य के लिए पूरे संसाधनों को झोंकने के साथ ही उसने पूरे चुनावी हथकण्डे अपना लिए थे। वह मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में तो भाजपा से आगे निकल ही गई थी लेकिन वह भाजपा से हिन्दुत्व का एजेंडा छीनने का प्रयास भी कर रही थी।
बिल्किस बानो के साथ हुए अत्याचार का जिक्र करने से भी परहेज करना इसका उदाहरण है। उसके प्रचार का एक नरेटिव यह भी था कि ‘‘अब कांग्रेस कहीं नहीं है अपने वोट खराब न करो।’’ पार्टी को दो राज्यों में चुनावी हार के बावजूद सबसे बड़ी खुशी दिल्ली नगर निगम चुनाव में मिल गई। भले ही वह गुजरात-हिमाचल में भाजपा को सत्ता से बेदखल न कर सकी, मगर दिल्ली नगर निगम में तो उसने भाजपा को बाहर का रास्ता तो दिखा ही दिया। उससे भी बड़ी खुशी आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त होने की है।
अब तक 16 राज्यों में खाता नहीं खोल पाई आप
यह पार्टी 10 वर्षों के अपने जीवनकाल में अब तक 18 राज्यों में 21 चुनाव लड़ चुकी थी। इनमें से 15 चुनावों में वह जीरो पर आउट हो गई थी। अब खाली हाथ वाला सोलहवां राज्य हिमाचल बन गया है। लेकिन इस बार उसका खाता गुजरात में खुल ही गया। इस प्रकार वह दिल्ली, पंजाब, गोवा के बाद गुजरात में अस्तित्व में होने के कारण राष्ट्रीय दल बनने की हकदार बन गई। लेकिन उसका पहला लक्ष्य भाजपा न होकर कांग्रेस मुक्त भारत का है ताकि वह कांग्रेस की जगह ले सके और यह लक्ष्य फिलहाल संभव नजर नहीं आता। अलबत्ता विपक्षी एकता में सबसे बड़ा बाधक अवश्य बन सकता है।
सन् 2023 में होने हैं 9 राज्यों में चुनाव
लोकसभा के 2024 में होने जा रहे चुनाव से पहले 2023 फरवरी में त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके बाद मई में कर्नाटक के चुनाव, नवंबर में छत्तीसगढ़, मिजोरम और मध्य प्रदेश के चुनाव और दिसंबर में राजस्थान और तेलंगाना विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से नवंबर और दिसंबर में होने वाले चुनावों का असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है।
इसलिए आने वाला साल भी चुनावी गहमागहमी वाला होने वाला है। इन चुनावों में केजरीवाल की पार्टी जरूर किस्मत आजमाएगी और उसे खाता खोलने का मौका मिले या न मिले मगर कांग्रेस को पलीता लगाने का मौका अवश्य मिल जाएगा। इन चुनावों में कांग्रेस अपने नए गढ़ बचाने के साथ ही कर्नाटक और मध्य प्रदेश के जैसे लुटे हुए गढ़ पुनः जीतने का प्रयास करेंगी।
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