महाराष्ट्र का सियासी 'ड्रामा': लेकिन हार कर भी जीत गए उद्धव ठाकरे
दरअसल गठबंधन की राजनीति और कुर्सी के खेल में ये रवायत नई नहीं है। शिवसेना ने फडनवीस से अपनी नाराज़गी की वजह से बेहद भारी मन से भाजपा का 30 साल पुराना साथ छोड़ा था, लेकिन देर-सवेर उसे वैचारिक रूप से सबसे करीब भाजपा के साथ आना ही था। रास्ते का रोड़ा सिर्फ और सिर्फ फडनवीस रहे और उनका अहंकार रहा...
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सियासत और कुर्सी का खेल भी बेहद दिलचस्प होता है। यहां जो दिखता है वह होता नहीं है और जो होता है वह दिखता नहीं है। महाराष्ट्र में भले ही इसे भाजपा का खेल माना जा रहा हो, लेकिन इस पूरे ड्रामे की स्क्रिप्ट कहीं न कहीं शिवसेना और उद्धव ठाकरे ने ही लिखी है। एकनाथ शिंदे को अपनी जगह कुर्सी पर बिठाकर ठाकरे ने शरद पवार जैसे सियासी दिग्गज को भी चित्त कर दिया और शिवसेना को अपने स्वाभाविक दोस्त भाजपा के साथ वापस पहुंचा दिया।
इस पूरे ड्रामे में देवेंद्र फडनवीस जितना खुश हो रहे थे, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने फिलहाल उन्हें सब्र करने के लिए मजबूर कर दिया है। याद कीजिए आज से ढाई साल पहले महाराष्ट्र चुनाव नतीजे आने के बाद किस तरह मुख्यमंत्री पद शिवसेना को दिलाने के लिए चौसर बिछाई गई और अजीत पवार की कथित बगावत के बाद किस तरह फडनवीस फिर से मुख्यमंत्री बनकर भी पांच दिनों में ही कुर्सी छोड़ने को मजबूर हो गए। उनकी जिद की वजह से शिवसेना ने अपनी स्वाभाविक हमराही भाजपा को छोड़कर एनसीपी और कांग्रेस का दामन थाम लिया था। पिछली फडनवीस सरकार में रहते हुए शिवसेना कैसे फडनवीस के खिलाफ लगातार मोर्चा खोलती रही थी और चुनाव से पहले ही अकेले लड़ने की धमकी दे चुकी थी, बल्कि गोवा में अकेले लड़ भी चुकी थी।
गोवा में 2017 में शिवसेना के अलग लड़ने और करारी हार का हवाला देते हुए अमित शाह ने आखिरी वक्त में महाराष्ट्र में शिवसेना को साथ लड़ने और गठबंधन न तोड़ने के लिए मना लिया था। शर्त यही थी कि मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा। लेकिन नतीजे आने के बाद हालात बदल गए। भाजपा संख्या के लिहाज़ से सबसे बड़ी पार्टी रही और देवेंद्र फडनवीस ये मानने को कतई तैयार नहीं हुए कि मुख्यमंत्री उनकी जगह शिवसेना का बन जाए। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व असमंजस में रहा और आखिरकार पांच ही दिन बाद फडनवीस को हटाकर शिवसेना के सीएम के नाम पर उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र विकास आघाड़ी (एमवीए) की सरकार बना ली। इस अघोषित शर्त पर कि उद्धव ढाई साल के लिए सीएम बनेंगे और उसके बाद एनसीपी का कोई नेता ये जिम्मेदारी संभालेगा। यानी ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ। हालांकि जब मौजूदा संकट गहराने लगा तो शरद पवार ने ऐसे किसी फॉर्मूले से इनकार कर दिया।
दरअसल गठबंधन की राजनीति और कुर्सी के खेल में ये रवायत नई नहीं है। शिवसेना ने फडनवीस से अपनी नाराज़गी की वजह से बेहद भारी मन से भाजपा का 30 साल पुराना साथ छोड़ा था, लेकिन देर-सवेर उसे वैचारिक रूप से सबसे करीब भाजपा के साथ आना ही था। रास्ते का रोड़ा सिर्फ और सिर्फ फडनवीस रहे और उनका अहंकार रहा। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व शुरू से ही इस बात को अच्छी तरह जानता था और सही वक्त का इंतज़ार कर रहा था। ऐसे में एकनाथ शिंदे को इस पूरे खेल का मोहरा बनाया गया, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इन ढाई सालों में फडनवीस और उद्धव की दूरियां और बढ़ीं, लेकिन उद्धव ठाकरे ने कभी भी आक्रामक तरीके से मोदी सरकार या भाजपा का विरोध नहीं किया। मुख्यमंत्री बनने की उनकी ख्वाहिश भी पूरी हो गई और अपने आदमी को ही प्रदेश की बागडोर सौंपने में वो कामयाब भी हो गए।
गौर कीजिए। एकनाथ शिंदे ने कभी खुलकर उद्धव ठाकरे का विरोध नहीं किया। वे आखिरी वक्त तक ठाकरे के सबसे करीब और प्रमुख मंत्रियों में रहे। यह ड्रामा शुरू भी तब हुआ जब ठाकरे ने अपने ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर लिया। अगली दावेदारी के लिए एनसीपी के साथ विवाद शुरू हो, इससे पहले शिवसेना के तमाम विधायक इस रणनीति के तहत शिंदे के साथ अलग होने का स्वांग करते रहे मानो वे पार्टी छोड़ रहे हों या भाजपा में जा रहे हों। इसे लेकर तकनीकी बहसें चलती रहीं, शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत से अनर्गल बयान दिलवाए जाते रहे ताकि मीडिया इस तल्खी को और बढ़ाती हुई दिखे। अलग गुट या असली शिवसेना कौन जैसे मुद्दे उठाए जाते रहे, दावे किए जाते रहे और मामला सुप्रीम कोर्ट तक खींचा गया, ताकि मामला लंबा चले और इस बीच मकसद हासिल कर लिया जाए। अगर ऐसा नहीं होता तो उद्धव इस पूरे ड्रामे की शुरुआत में ही बगैर इस्तीफा दिए मुख्यमंत्री आवास क्यों छोड़ देते, वापस मातोश्री क्यों चले जाते, क्यों ये लगातार कहते कि सारे विधायक उनसे संपर्क में हैं और क्यों कभी खुलकर एकनाथ शिंदे के बारे में कोई भी नकारात्मक बयान नहीं देते।
ठाकरे आखिरी वक्त तक शिंदे की तारीफ करते रहे और भरोसा जताते रहे कि वे लौट आएंगे। बयानबाजी के मोर्चे पर हमेशा से बड़बोले रहे संजय राउत को ही रखा गया। उद्धव ठाकरे एनसीपी और कांग्रेस का इस्तेमाल जितना करना था, कर चुके थे और अब महाराष्ट्र में उन्हें अपने स्वाभाविक सहयोगी के साथ वापस जाना था। साथ ही फडनवीस को भी उनकी जगह दिखानी थी, इसमें वे कामयाब हो गए। जाहिर सी बात है कि देश में लगातार मजबूत होती भाजपा और मोदी को वे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं कर सकते और दो साल बाद महाराष्ट्र में होने वाले चुनाव को लेकर भी उन्हें जमीन तैयार करनी है, ऐसे में ये उनकी दूरगामी रणनीति का हिस्सा हो सकता है कि वह फिर से शिवसेना और भाजपा को साथ ले आएं।
बेशक इस खेल में एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी उद्धव को समझ नहीं सके। अपने पिता बाला साहेब ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उद्धव ठाकरे ने अब खुद को भी किंगमेकर की तरह स्थापित करने की रणनीति अपनाई है। अब उन्हें अपने से ज्यादा अपने बेटे आदित्य ठाकरे का भविष्य देखना है। जाहिर है आने वाले वक्त में वो आदित्य को प्रदेश के मुखिया के तौर पर उभारने की कोशिश करेंगे और खुद एक किंगमेकर की तरह सियासी शतरंज के मोहरे चलते रहेंगे।