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हरित ऊर्जा के लिए चुनौती: बिजली बन तो रही है, पर रास्ता नहीं..!

Dhanendra Kumar धनेंद्र कुमार
Updated Thu, 08 Jan 2026 03:04 PM IST
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सार

भारत तेजी से हरित ऊर्जा उत्पादन की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, ट्रांसमिशन व्यवस्था की कमी इस प्रगति में एक बड़ी रुकावट बनती जा रही है। बिजली बनने के बाद भी वह उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पा रही है। 

Green Energy Generation Without Transmission: Indias Biggest Challenge In Renewable Power Expansion
Green Energy - फोटो : AdobeStock
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विस्तार
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देश में बिजली की जरूरत हर साल बढ रही है। खेतों की सिंचाई हो, छोटे उद्योग हों या घरों की रोशनी-बिजली के बिना काम नहीं चलता। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए हरित ऊर्जा पर जोर देना आवश्यक है। इसी जरूरत को देखते हुए भारत तेजी से सौर और पवन ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। सरकार ने लक्ष्य रखा है कि साल 2030 तक देश में 500 गीगीवॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा तैयार की जाए।

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राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और लद्दाख जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर सोलर और पवन बिजलीघर लगाए जा रहे हैं यह देश के लिए अच्छी बात है। लेकिन इसी के साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आ रही है।

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बिजली तैयार, फिर भी बंद क्यों?

कई जगह ऐसा हो रहा है कि बिजलीघर पूरी तरह तैयार है, सूरज चमक रहा है, हवा चल रही है, फिर भी बिजली का उत्पादन घटाना पड़ रहा है या बंद करना पड़ रहा है। इसकी वजह है ट्रांसमिशन लाइन-यानी वह व्यवस्था जो बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती है, में असंतुलन और क्षमता में कमी।


अगर बिजली बनाने का काम पहले पूरा हो जाए और लाइन बाद में बने, जो बनी हुई बिजली को आगें भेजा ही नहीं जा सकता।
इसी मजबूरी को तकनीकी भाषा में श्कर्टेलमेन्टश् कहा जाता है-यानी बिजली होते हुए भी उसका इस्तेमाल न हो पाना। इसके फलस्वरूप बिजली बनाने वाले डेवलपर्स को काफी हानि होती है, और कर्ज का बोझ बढ़ता रहता है।

कहां-कहां हो रही है यह दिक्कत?

  • राजस्थान में हाल के महीनों में कई बार सोलर और पवन बिजली का बड़ा हिस्सा ग्रिड में नहीं लिया जा सका।
  • गुजरात और महाराष्ट्र में भी बिजली तैयार होने के बावूजद उत्पादन घटाना पड़ा।
  • लद्दाख जैसे दूरस्थ इलाकों में आने वाले समय के लिए ट्रांसमिशन की तैयारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

Green Energy Generation Without Transmission: Indias Biggest Challenge In Renewable Power Expansion
Green Energy - फोटो : AdobeStock

इसका सीधा मतलब है-स्वच्छ बिजली की बर्बादी और देश को नुकसान। ग्रिड मजबूत है, लेकिन ट्रांसमिशन में असंतुलन और दबाव बढ़ गया है। यह सच है कि भारत का राष्ट्रीय बिजली ग्रिड दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत ग्रिड़ों में से एक है। पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने वर्षों तक देश को जोड़ने वाली बिजली लाइनों का मजबूत जाल खड़ा किया है। इसमें उनकी भूमिका सराहनीय रही है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। आज नवीकरणीय परियोजनाएं बहुत तेजी से बन रही हैं। एक साथ कई राज्यों में काम चल रहा है। कई बड़े प्रोजेक्ट एक-दूसरे पर निर्भर है।

ऐसे में अगर किसी एक लाइन या परियोजना में देरी हो जाए, तो उसका असर कई बिजलीघरों पर पड़ता है। यह किसी एक संस्था की कमी नहीं, बल्कि काम के बढ़ते बोझ की हकीकत है। कई कारणों से पावर ग्रिड कॉपोर्रेशन को 50 से अधिक काम मिला हुआ है, जबकि अन्य कई ट्रांसमिशन कंपनियों के पास अधिक काम नहीं है, और असंतुलन बना हुआ है।

जमीन और अनुमति की मुश्किलें

ट्रांसमिशन लाइन बनाना आसान नहीं है इसके लिए किसानों की जमीन से लाइन निकालनी पड़ती है। जंगल और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी लेनी होती है। कई जिलों और राज्यों से होकर लाइन जाती है। हर जगह अलग नियम और अलग प्रक्रिया होती है। इसी कारण कई बार ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट एक-दो साल तक लेट हो जाते हैं।

आखिर नुकसान किसका होता है?

जब बिजलीघर तैयार हैं, लेकिन लाइन नहीं, तो बिजली बनाने वालों को आर्थिक नुकसान होता है। निवेश करने वाले हिचकिचाने लगते हैं और आम आदमी तक सस्ती, साफ बिजली नहीं पहुंच पाती। कुछ कंपनियों ने तो नियामक आयोग में यह दावा किया है कि ट्रांसमिशन में देरी और कर्टेलमेन्ट से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

समाधान क्या है?

इस समस्या का हल समय रहते निकाला जा सकता है। पहला, काम का बंटवारा-जहां संभव हो, ट्रांसमिशन के काम में ज्यादा कंपनियों को मौका मिले, ताकि काम का बोझ बंटे और देरी कम हो। प्रतिस्पर्धा के लिए भी यह आवश्यक है। दूसरा, जल्दी मंजूरी-जमीन और अन्य अनुमतियों के लिए एक ही जगह से, तय समय में मंजूरी की व्यवस्था हो।

तीसरा, पहले से तैयारी-जहां बड़े सोलर या पवन पार्क बनने हैं, वहां ट्रांसमिशन लाइन का काम पहले या साथ-साथ शुरू हो। चौथा, स्थानी उपाय-बैटरी स्टोरेज और बेहतर प्रबंधन से कुछ बिजली को वहीं इस्तेमाल या सुरक्षित किया जा सकता है।

निष्कर्षः हरित ऊर्जा भारत के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है लेकिन सिर्फ बिजली बनाना ही काफी नहीं, उसे सही समय पर सही जगह पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। यह समय आरोप लगाने का नहीं, बल्कि देश के हित में मिलकर समाधान खोजने का है, ताकि किसानों की जमीन का सही इस्तेमाल हो, निवेशकों का भरोसा बना रहे और आम आदमी तक सस्ती और साफ बिजली पहुंच सके। जब ट्रांसमिशन ग्रिड मजबूत और सुचारू होगा, तभी हरित भारत और देश के तीव्र विकास का सपना सच होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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