विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: कॉस्टयूम डिजाइनर डॉली अहलूवालिया
ओमकारा’ के लिए 2007 में डॉली को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला, यही पुरस्कार उन्हें 2014 ‘भाग मिल्खा भाग’ और 2015 में ‘हैदर’ के लिए मिला। ‘हैदर’ के लिए ही उन्हें पहला रजत कमल मिला, इसके पहले उन्हें 2013 में सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री (विक्की डोनर) का रजत कमल प्राप्त हुआ था।
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इसे कहते हैं, जीवन की सार्थकता! लंबी बीमारी के बाद भी जिजीविशा से भरपूर, खुश और सकून भरा जीवन।
बारह पुरस्कार में दो नेशनल फिल्म पुरस्कार, तीन फिल्म-फेयर पुरस्कार, तीन इंटरनेशनल इंडियन फिल्म अकादमी पुरस्कार के साथ कई कार्य एक साथ साधने वाली डॉली अहलूवालिया ने वैसे तो अभिनय के लिए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का स्वर्ण पदक जीता था और अभिनय के साथ-साथ बन बैठीं एक नामी कॉस्ट्यूम डिजाइनर। वे नाटक एवं फिल्म दोनों केलिए वस्त्र सज्जा करती हैं।
वे मानती हैं कॉस्ट्यूम डिजाइनर उनके अंदर था, अवसर पाकर निखर आया और यह अवसर उन्हें अनायास मिल गया। इब्राहिम अल्का जी ने डॉली की इस प्रतिभा को पहचाना और इसकी प्रशंसा की। उन्होंने उन्हें प्रतिमाओं, किताबों, फोटो देखकर उनके वस्त्र पर ध्यान देने को कहा। डॉली को म्यूजियम जाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दिशा में आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का कोई कोर्स न करने वाली को श्रीमती रोशन इब्राहिम अल्काजी ने यह अवसर दिया। कीर्ति ‘ईडिपस’ नाटक कर रही थीं जिसकी वस्त्र सज्जा श्रीमती अल्का कर रही थीं, जैसे सब छात्र सहायक के रूप में अपना नाम देते हैं, डॉली ने अपना नाम वस्त्र सज्जा के लिए दे दिया और इस उनके इस काम की शुरुआत हुई।
बाजार जाकर उपयुक्त कपड़ा खरीदना उन्होंने सीखा। वे अपनी बुआ को भी इसका क्रेडिट देती हैं जिन्होंने उनके भीतर ड्रेस सेंस पैदा किया। एक बार ‘ऑथेलो’ नाटक के लिए रॉबिन दास वस्त्र सज्जा कर रहे थे और उन्होंने अपना काम डॉली को पूरी तरह सौंप दिया।
कॉस्ट्यूम को पूजा मानती हैं डॉली
कॉस्ट्यूम को पूजा मानने वाली, दिल्ली में 1957 में पैदा हुई डॉली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया, फिर एनएसडी से कोर्स किया और वहीं की रेपोर्टरी कंपनी में भी दस साल काम किया। वे थियेटर के लिए वस्त्र सज्जा कर रही थीं तभी उन्हें शेखर कपूर का फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ केलिए वस्त्र सज्जा का प्रस्ताव मिला और उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा।
‘ओमकारा’ के लिए 2007 में उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला यही पुरस्कार उन्हें 2014 ‘भाग मिल्खा भाग’ और 2015 में ‘हैदर’ के लिए मिला। ‘हैदर’ के लिए ही उन्हें पहला रजत कमल मिला, इसके पहले उन्हें 2013 में सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री (विक्की डोनर) का रजत कमल प्राप्त हुआ था। ‘हैदर’ के लिए ही उन्हें सर्वोत्तम वस्त्र सज्जा का इंटरन्वेशनल इंडियन फिल्म अकादमी पुरस्कार मिला जो उन्हें पहले भी ‘भाग मिल्खा बाग’ हेतु भी प्राप्त हुआ था। यह उन्हें ‘लव आज कल’ केलिए भी मिला था, लेकिन तब यह इन्हें अनैता श्रॉफ के साथ साझा मिला था।
भले ही उन्होंने ड्रेस डिजाइनिंग का कोर्स नहीं किया है मगर इस क्षेत्र में इतना अच्छा काम किया कि उन्हें एनएसडी, सिडनी के नेशनल इंस्ट्यूट ऑफ ड्रैमेटिक आर्ट्स में विजिटिंग प्रोफेसर का पद हासिल हुआ। साक्षात्कार में वे बताती हैं कि इस सफलता का कारण उनका आत्मविश्वास है, वे जानती हैं कि वे कर सकती हैं। लेकिन श्रेय अपने माता-पिता, गुरुओं एवं भगवान को देती हैं।
फिल्म और नाटक के वस्त्र विन्यास भिन्न होते हैं नाटक में दर्शक दूर बैठे होते हैं जबकि सिनेमा में कैमरा सब कुछ दर्शक के नजदीक ले जाता है। उनकी वस्त्र सज्जा सौंदर्य से आगे बढ़कर कहानी कहती है, चरित्र को गढ़ती है, पात्र को जीवन्त बनाती है। नाटक की वस्त्र सज्जा हेतु उन्हें संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
कई फिल्मों के लिए किया काम
27 फिल्मों में बतौर अभिनेत्री डॉली अहलूवालिया ने कई प्रसिद्ध निर्देशकों के नाटक जैसे ‘तुगलक’, ‘अग्नि और बरखा’ (प्रसन्ना), ‘अंधा युग’ (एम के रैना), ‘सीगल’, ‘उमराओ’ (अनुराधा कपूर), ‘हेमलेट’ (हैनरी पीटरसन) आदि का वस्त्र सज्जा दायित्व संभाला है। उन्होंने टीवी केलिए ‘जमीन’, ‘तन्हाईयां’, ‘तितली’, ‘वापसी’ आदि हेतु भी यह कार्य किया है।
फिल्म ‘गांधी’ के लिए वे सहायक कस्टूम डिजायनर थीं। उन्होंने अब तक 28 फिल्मों के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग की है, जिसमें ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’, ‘रॉक स्टार’, ‘कमीने’, ‘आजा नच ले’, ‘पार्टीशन’, ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
किसी भी प्रोडक्शन की सफलता में वस्त्रों का बहुत बड़ा हाथ होता है। कपड़ों की अपनी चाक्षुष भाषा होती है, जो दर्शक से सीधे संवाद करती है, इसीलिए यदि कोई कपड़ों की बेकदरी करता है, तो डॉली को बहुत गुस्सा आता है। हमारे यहां कॉस्टूम डिजाइनिंग को अधिक सम्मान नहीं मिलता है, लोग उसे फैशन डिजाइनिंग ही मानते हैं, जबकि दोनों बहुत अलग है।
वस्त्र डिजाइनिंग हेतु रकम लगती है, बिना पैसा डाले, बिना उचित वेशभूषा के ‘हैदर’, ‘वाटर’, ‘रंगून’, ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’, ‘रॉक स्टार’ सफल नहीं हो सकती थीं।
कभी-कभी अजीब स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसे ‘हैदर’ की शूटिंग केलिए डॉली सारे कपड़े दिल्ली से तैयार करके ले गई थीं, मगर एक गाने के दौरान पहले बीस डांसर की बात थी मगर दृश्य फिल्माने केलिए पचास डांसर उपयुक्त अनुभव किए गए तब विशाल भारद्वाज ने डॉली पर भरोसा किया और उन्होंने डेढ़-दो दिन के भीतर सारी जरूरत पूरी की।
उनके अनुसार यह उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती रही है, खुश हैं कि वे उसका सफलतापूर्वक सामना कर सकीं। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण काम करने केलिए आदमी को अपना दिल-दिमाग, आंख-विचार सब हर वक्त खुले रखने चाहिए।
समय के साथ अनुभव से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है।
एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि उनके लिए मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता में सकून पाती हैं। वे पुरस्कार के पेछे नहीं भागती हैं, हां मिलता है तो उसे अपनी मेहनत पर बरस कृपा मान कर स्वीकार करना चाहिए। डॉली अहलूवालिया को भारतीय संगीत- शास्त्रीय, इंस्ट्रूमेंटल, पियानो सुनना पसंद है। उनके अनुसार संगीत रूह तक जाती है।
यह शौक उन्हें अपनी मां से मिला है। उन्हें याद है बड़े गुलाम अली खान उनके घर आते थे।
वंशी कौल ने ‘रंग यात्रा’ के दौरान नाटकों के प्रयुक्त हुए वस्त्रों की प्रदर्शनी लगाई थी जिसमें डॉली निर्मित ‘ऑथेलो’ नाटक के वस्त्र प्रदर्शित थे, जिनें खूब सराहना मिली। वे उसे अपना एक सर्वोत्तम काम मानती हैं। अपनी जिंदगी से खूब खुश डॉली अहलूवालिया अपनी काबिलियत के बल पर अंतरराष्ट्रीय कल्चरल एक्चेंज प्रोग्राम एवं समारोहों के तहत सिडनी, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, पेरिस, जर्मनी आदि देशों में जा चुकी हैं और इन अनुभवों ने उन्हें समृद्ध किया है। वे अपनी जिंदगी के अंत तक काम करना चाहती हैं। उम्र के बावजूद वे खूब सक्रिय हैं।
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