विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: शाजी एन करुण- विलक्षण सोच का निर्देशक
फिल्म संस्थान से निकलते ही शाजी को यहां अधिकारी बनने का अवसर मिला। शुरू में काफी समय तक वे मलयालम के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक जी. अरविंदन के सिनेमाटोग्राफर रहे।
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मुझे आज भी याद है, इमरजेंसी के दौरान केरल के एक इंजीनियरिंग के छात्र राजन को पुलिस उठा ले गई और उसे शारीरिक यंत्रणा देकर, पीट-पीट कर मार डाला, उसकी लाश तक का किसी को पता ठिकाना न मिला। जब यह खबर लोगों तक पहुंची, पूरा देश स्तब्ध था। लोग पुलिस की क्रूरता-अत्याचार की बात करते, अधिकांश लोगों की सहानुभूति राजन के साथ थी। लोग नेताओं से गुस्सा थे, उन्हें बुरा-भला कह रहे थे।
राजनीति गरम थी, लोग तरह-तरह की विचारधारा के पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क कर रहे थे। परंतु कदाचित ही कोई उसके परिवार की बात कर रहा था। इन सबके बीच एक व्यक्ति बिल्कुल अलग तरीके से सोच रहा था। विलक्षण सोच का एक आदमी कुछ भिन्न सोच रहा था। प्रतिभावान व्यक्ति की सोच-समझ अधिकांश लोगों से अलग होती है।
कुछ साल बाद इस व्यक्ति ने अपनी सोच, सहानुभूति-तदानुभूति को कहानी की शक्ल दे दी और उसे परदे पर उतारा। इस फिल्म का नाम है, ‘पिरवी’। यह भी ध्यातव्य है कि यह इस आदमी की पहली फिल्म है। फिल्म को 15 पुरस्कार प्राप्त हुए।
फिल्म- ‘पिरवी’
जब अधिकांश लोग पुलिस क्रूरता, नेताओं की स्वार्थपरता की बात सोच रहे थे, इस व्यक्ति ने राजन के परिवार पर, उनकी भावनाओं-अनुभवों, उनके दु:ख-दर्द पर अपना ध्यान केंद्रित किया। फिल्म में राजन को रघु नाम दिया गया है। पूरी फिल्म न तो कभी रघु को दिखाती है और न ही पुलिस की क्रूरता को सामने लाती है। लेकिन दर्शक सारे समय उसकी उपस्थिति अनुभव करता है।
एक रिटायर्ड प्रोफेसर के एकमात्र बेटा रघु के गायब होने के बाद उसके 80 साल के पिता, मितियाबिंद से अंधी हुई मां और बहन का क्या हाल है, यही इस फिल्म का प्रतिपाद्य है। इस मार्मिक, संवेदनशील फिल्म के निर्देशक का नाम है, शाजी नीलकंठन करुणाकरण, प्रचलित नाम है, शाजी एन. करुण।
शाजी एन. करुण का जन्म 1 जनवरी 1950 को केरला के कोलम जिले में परिवार के बड़े बेटे के रूप में हुआ। पिता का नाम है एन. करुणाकरण एवं माता हैं चंद्रमति। जल्द ही ये लोग राजधानी तिरुअनंतपुरम् में आ बसे। वहीं कॉलेज से शाजी ने ग्रेजुएशन किया और 1971 में पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलेविजन संस्थान में सिनेमाटोग्राफी का प्रशिक्षण लेने पहुंच गए। उस साल 100 उम्मीदवारों में से मात्र 8 का चयन हुआ था। वहां से 1975 में उन्होंने स्वर्ण पदक के साथ डिप्लोमा पाया।
इसी साल अपने जन्मदिन पहली जनवरी को शाजी ने अपनी पड़ोसन अनुसुया से विवाह किया। अनिल एवं अप्पु इन दोनों के बेटे हैं। उनके भावी स्वसुर ने उन्हें पुणे जाने की सलाह दी थी। इसी समय केरल में राज्य फिल्म विकास कोरपोरेशन की स्थापना हुई। फिल्म संस्थान से निकलते ही शाजी को यहां अधिकारी बनने का अवसर मिला। शुरू में काफी समय तक वे मलयालम के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक जी. अरविंदन के सिनेमाटोग्राफर रहे।
अरविंदन की फीचर फिल्मों के अलावा उन्होंने ‘अरापेट्टा केट्टिया ग्रामतिल’, ‘पंचवटी पालम’, ‘माराट्टम’, कांचन सीता’, ‘तम्पु’, ‘कुम्मट्टी’, ‘एस्तापन’, ‘पंचगनी’, ‘फ्लैशबैक’, ‘द सीयर हू वॉक्स अलोन’, ‘ओरिदत्त’ आदि कुल 27 फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी की। उन्होंने अपने मेंटोर जी अरविंदन पर ‘ए ड्रीम टेक्स विंग्स: जी. अरविंदन’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई।
1988 से शाजी ने अपनी दिशा बदली ली। वे फिल्म निर्देशक बन गए, पहली फिल्म लाजबाव ‘पिरवी’ बनाई। फिल्म न तो राजनीतिक टिप्पणी करती है, न ही किसी विचारधारा का पोषण करती है। न ही कोई जजमेंट देती है, मात्र और मात्र भावनाओं, अनुभवों पर केंद्रित रहती है। कहानी एवं स्क्रीनप्ले शाजी एन. करुण ने एस. जयचंद्रन नायर एवं रघुनाथ पालेरी के साथ मिल कर लीखा है, संगीत जी. अरविंदन ने मोहन सितारा के साथ मिल कर तैयार किया है।
संकेतों से भरी इस फिल्म में राजन के पिता फिल्म पिता राघव चाकियार (वास्तविक प्रोफेसर टी. वी. ईश्वर वारियर) की भूमिका प्रेमजी ने की है। अर्चना बहन मालती बनी है और मां बनी हैं, लक्ष्मी कृष्णनकुट्टी। अगर जीवन में मात्र यही फिल्म बनाते तब भी सिने-इतिहास में सदा केलिए दर्ज रहते।
पांच पुरस्कार विजेता फिल्म- ‘स्वाहम्’ (1994)
उनकी दूसरी फिल्म का नाम है, ‘स्वाहम्’ (1994)। 2 घंटे 21 मिनट की यह फिल्म 5 पुरस्कार जीतती है। यहां गांव का एक चाय दुकान चलाने वाला दुर्घटना में मर गया है। उसकी पत्नी, बेटा-बेटी आर्थिक कठिनाई में हैं। बेटे के सेना में भर्ती होने से कुछ उम्मीद है मगर वह भी खर्चीला है। यहां पत्नी अन्नपूर्णा की भूमिका में अश्वनी हैं, बेटा रमय्या की भूमिका हरि दास ने की है, भरत गोपी जमींदार बने हैं। इस फिल्म का स्क्रीनप्ले भी शाजी ने जयचंद्रन एवं रघुनाथ पालेर के साथ मिल कर लिखा है।
28 अप्रैल 2025 को कैंसर से गुजरे शाजी एन. करुण की फिल्म ‘वानप्रस्थम्’ (1999) अवश्य देखी जानी चाहिए। करीब दो घंटे की मोहनलाल-सुहासिनी अभिनीत ड्रामा फिल्म शाजी की अन्य फिल्मों की भांति दर्शकों की कल्पना हेतु बहुत कुछ छोड़ती है।
13 पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म का कैमरा प्रसिद्ध संतोष शिवन ने संभाला है। उनका फिल्मांकन सदा की भांति कमाल का है जो बारीक-से-बारीक बातें, मुद्राएं पकड़ता है। फिल्म कथकलि के नर्तक कुन्नीकुट्टन (मोहनलाल) एवं एक उच्च जाति की स्त्री सुभद्रा (सुहासुनी) के वर्जित संबंध पर आधारित है।
सिने-कलाकार शाजी बहुत आत्मीयता एवं मार्मिकता के साथ केरल से फिल्म संस्थान पहुंचने का वर्णन करते हैं। वैसे वे चिकित्सक बनना चाहते थे, उसके लिए प्रवेश परीक्षा पास कर चुके थे। केरल से पहली बार बाहर निकल कर पुणे के अजनबी वातावरण में खुद को समायोजित कर सत्यजित राय के हाथों डिप्लोमा ले सिने-संसार में प्रवेश करते हैं और इस दुनिया में अपना झंडा गाड़ते हैं।
वहीं उन्होंने सिनेमाटोग्राफी के साथ अपने ज्ञान का विस्तार करने केलिए निर्देशन के क्षेत्र में भी सीखना प्रारंभ कर दिया था। वहां डिप्लोमा फिल्म केलिए उन्हें प्रसिद्ध सिनेमाटोग्राफर मधु अंबाट के सहायक का काम मिला। बाद में उन्होंने ‘लेडी ऑफ द लैंडिंग’ तथा ‘जेनेसिस’ दो अन्य डिप्लोमा फिल्म का छायांकन किया। मगर बनना तो उन्हें फिल्म निर्देशक था।
उन्होंने उपरोक्त फिल्मों के अलावा ‘कुट्टी श्रांक: द सेलर ऑफ हार्ट्स’, ‘निषाद’, ‘शी’, ‘द वाइडिंग सोल’, ‘शाम्स विजन’ कुल नौ फिल्में निर्देशित कीं। अंतिम दिनों में वे केरल स्टेट फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन थे। मृत्यु के दो महीने पहले उन्हें मलयालाम सिनेमा में योगदान हेतु जे. सी. डेनियल लाइफटाइम अवार्ड मिला था।
वे नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया की तकनीक कमिटी के प्रमुख सदस्य थे।
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