विश्व साहित्य का आकाश: साहित्य अकादमी से पुरस्कृत दिनकर की रचना 'संस्कृति के चार अध्याय'
‘संस्कृति के चार अध्याय’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रची गई गद्य रचना है। विपुल रचनाकार दिनकर कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपनी ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किताब के द्वारा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को व्याख्याइत करते हैं।
विस्तार
1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कृत ‘संस्कृति के चार अध्याय’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (23 सितम्बर 1908-24 एप्रिल 1974) द्वारा रची गई गद्य रचना है। अब तक इसके कई संस्करण हो चुके हैं। 2016 में यह नए कलेवर में प्रकाशित (लोकभारती, इलाहाबाद) हुई है। विपुल रचनाकार दिनकर कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं, मगर उन्होंने सिद्ध किया है कि गद्य कवि का निकष होता है। मुझे लगता है इस असाधारण रचना हेतु उन्हें ज्ञानपीठ भी मिलना चाहिए था। हालांकि उन्हें बाद में 1972 में अपने मार्मिक प्रेम काव्य ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ प्राप्त हुआ।
वीर रस के कवि, बिहार के बेगूसराय जिला के सिमरिया ग्राम में एक किसान परिवार में जन्मे रामधारी सिंह ‘दिनकर’ लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।
दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ महागाथा को 750 से ऊपर पन्नों में बांध है। सत्तर साल बाद भी रचना की महत्ता बनी हुई है और आगे भी रहेगी। ध्यातव्य है इस उल्लेखनीय कृति की भूमिका प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है। रचनाकार किताब के निवेदन में लिखता है, ‘पुस्तक लिखते-लिखते, इस विषय में मेरी आस्था और भी बढ गई कि भारत की संस्कृति, आरंभ से ही सामासिक रही है।’
वहीं इसके समर्पण में वे लिखते हैं, ‘सामासिक संस्कृति की प्रतिमा राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी के पुनीत कर-कमलों में’। भूमिका एवं समर्पण बताता है, इन सब राजनितिज्ञों में एक-दूसरे केलिए कितना सम्मान था।
संस्कृति कभी इकहरी नहीं होती है, यह सतत प्रवहमान होती है। न मालूम इतने बाहरी और आंतरिक तत्व मिल कर इसका निर्माण करते हैं। संस्कृति की तुलना सागर से की जा सकती है, जिसमें तमाम नदियां आकर मिलती हैं। भागलपुर यूनिवर्सिटी के वाइस चान्सलर रहे दिनकर भी अपनी इस किताब में यही दिखा रहे हैं, भारतीय संस्कृति कई संस्कृतियों का समुच्चय है। इसका अस्तित्व भी बहुआयामी एवं बहुस्तरीय है।
हालांकि प्रारंभ से यह किताब सहमति-असहमति का मुद्दा रही है, इसे इसकी सफलता की तरह देखा जाना चाहिए। यह मौलिक विशद रचना जटिल भारतीयता को पारिभाषित करती है और देश को एक राष्ट्र-सांस्कृतिक इकाई की तरह दिखाती है। किताब प्रस्तावना-उपसंहार के अलावा, यह अपने नामानुकल चार अध्याय (रचनाकार जिन्हें चार क्रांन्तियों की तरह देखते हैं) में बंटी हुई है, साथ ही प्रत्येक अध्याय के कई उप-अध्याय या प्रकरण हैं।
पहले अध्याय (भारतीय जनता की रचना और हिंदू संस्कृति का अविर्भाव) वैदिक और पौराणिक काल) में 3 प्रकरण, दूसरे (प्राचन हिन्दुत्व से विद्रोह) में 7, तीसरे अध्याय (हिन्दु संस्कृति और इस्लाम) में 12 और चौथे (भारतय संस्कृति और यूरोप) में 17 प्रकरण हैं। इस तरह यह 39 प्रकरण में विभक्त किताब है।
वैसे कई अन्य विद्वानों की तरह मैं आर्य भारत में बाहर से आए, इस विचार से सहमत नहीं हूं। दिनकर की भी इसके लिए भी आलोचना होती है। वे अपने चार सोपानों को भारत निर्माण के निर्णायक बिन्दु मानते हैं। पहले अध्याय में भारतीय जनता की रचना और हिन्दू संस्कृति कैसे प्रारंभ हुई, आर्य-द्रविड़ संबंध, वर्ण व्यवस्था-जाति (जाति जो बाद में जन्म से जुड़ गई), वैष्णव धर्म, रामकथा, कृष्ण की पुरातनता, वेद आदि के विषय में विस्तार से अपनी बात रखते हैं।
दूसरे खंड में दिनकर हिन्दुत्व के अंतर्गत होने वाले विद्रोह, जैन-बौद्ध मतों के सिद्धांत, उनका वैदिक धर्म पर असर आदि को दिखाते हैं। इस अध्याय में वे सांस्कृतिक उपनिवेशों, गीता, शाक्त, तंत्र, योग, पुराण, शून्यवाद, कैवल्य इत्यादि का विश्लेषण एक बहुत बड़े फलक पर उदारता के साथ करते हैं।
तीसरा अध्याय मुस्लिम आक्रमण, हिन्दू समाज, दोनों के संबंध से जुड़ा है। इसी में वे भक्ति आंदोलन, सिख धर्म, शिल्म-कला पर मुस्लिम प्रभाव की चर्चा करते हैं। यहां भी वे सकारात्मक विचार के साथ रचनात्मक प्रभाव को लाते हैं।
चौथा अध्याय अंग्रेजों के आगमन के साथ प्रारंभ होता है। इसमें वे मिशनरी के भारत पर पड़े प्रभाव, अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति की व्याख्या करते हैं। इसी अध्याय में दिनकर ब्राह्मण समाज, भारतीय नवजागरण को भी विस्तार से समझाते हैं।
भारत की आधारभूत संस्कृति
ओज और आक्रोश के कवि ‘दिनकर’ के अनुसार आर्य एवं आर्येतर संस्कृतियों खासकर द्रविश तथा मोहन जोदड़ो के सम्मिश्रण से जो संस्कृति पैदा हुई, वही भारत की आधारभूत संस्कृति बनी। वे संस्कृति के विकास में दक्षिण भारत के योगदान को अधिक मानते हैं। साथ ही भारत के भौगोलिक स्थिति को चित्रित करते हैं, उनके अनुसार समुद्र एवं हिमालय के कारण भारत में बाहरी लोगों का आना सरल न था।
फिर भी वे मानते हैं कि आर्यों के पहले भी कुछ विदेशी समूह यहां आए होंगे। आर्यों के आने के बाद विदेशियों का आना कठिन हो गया। अत: वे आते और फिर चले जाते रहे।
उनका मानना है, समुद्री मार्ग से पश्चिमी लोगों के आने का प्रभाव हमारी संस्कृति पर बराबर पड़ा है। पश्चिमी देशों से आये लोगों खासकर अंग्रेजों के आगमन से भारत में औद्योगिक सभ्यता का प्रारंभ हुआ। पश्चिमी इतिहासकारों ने एक साजिश की और हमारे इतिहास को अपनी नजर से लिखा। परंतु हमारे बुद्धिजीवियों ने भी अपनी बुद्धि ताक पर धर कर पश्चिमी बुद्धिजीवियों की नकल करनी शुरु कर दी। वे भारतीय संस्कृति की कमजोरियों को भी बताते हैं।
उनका कहना है, हमने कुछ ऐसी परम्पराएं निर्मित कर लीं, जो अन्य किसी देश में कदाचित मिलती है, जैसे जाति प्रथा और उससे जुड़ी छूआछूत की भावना। यह सब हमें संकुचित बनाता है।
साथ ही वे कहते हैं, हमारे यहां दो शक्तियां निरंतर हमें प्रभावित करती रही हैं। एक ऐसी शक्ति है, जो बाहरी प्रभावों को पचा कर सामंजस्य उत्पन्न करने की कोशिश करती है। जबकि दूसरी शक्ति हमें विछिन्न करती है, अलगाव को बढ़ावा देती है। वे हमारी एक और कमजोरी को दिखाते हैं, वह है हमारी कथनी और करनी में फांक। एक ओर तो हम शांति, अहिंसा एवं सहिष्णुता की बात करते हैं।
वहीं दूसरी ओर हमारे यहां अशांति, हिंसा खूब देखने को मिलतील्ती है। इसी तरह जो भी तनिक हमसे भिन्न तरीके से सोचता है, उसके प्रति हम तत्काल असहिष्णु हो जाते हैं।
अपनी ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किताब के द्वारा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को व्याख्याइत करते हैं। बौद्धिक विमर्श भारत की चार महान सांस्कृतिक क्रांतियों के माध्यम से हमारे भारतीय समाज निर्माण के इतिहास को प्रस्तुत करता है। यह हमारे आपसी सामंजस्य, मित्रतापूर्ण रिश्तों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्वारा बनी राष्ट्रीय पहचान की शिनाख्त करती है। यह एक अनोखी किताब है, इसे सहमति-असहमति के बावजूद अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
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