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दूसरा पहलू: काल्पनिक हैं अकबर और बीरबल के किस्से

भूपेंद्र कुमार Published by: लव गौर Updated Mon, 23 Feb 2026 05:05 AM IST
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सार

इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं था, ये बस बाद में गढ़ी गईं, यानी वक्त के साथ अफसाना ही हकीकत बन गया।

stories of Akbar and Birbal are fictional, not historical
काल्पनिक हैं अकबर और बीरबल के किस्से - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

क्या आपको भी लगता है कि अकबर और बीरबल के किस्से सच्चे हैं? बहुत-से लोग तो यही मानते हैं, पर इतिहास किंवदंतियों और मिथकों से अलग होता है। मिथक गढ़े जा सकते हैं, पर तारीख वास्तविकता की मजबूत बुनियाद पर टिकी होती है। किताबों में, टीवी पर कितनी ही बार बीरबल की बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी की कहानियां देखी-सुनी जाती हैं। इनमें जो बताया जाता है, उससे तो यही लगता है कि अकबर और बीरबल का ज्यादातर वक्त दिलजोई और दरबारी विनोद में बीतता होगा। आइए जानते हैं कि बीरबल कौन थे।
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अकबर के नवरत्नों में शामिल बीरबल का वास्तविक नाम महेश दास था। 1569 ईस्वी में वह मुगल बादशाह के दरबार में आगरा पहुंचे। वह अकबर के भरोसेमंद सेनापति थे।  बीरबल ने कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। स्वात घाटी (अब पाकिस्तान में) में यूसुफजई कबीले की जंग में लड़ते हुए उनकी मौत हो गई और शव का भी पता नहीं चल सका। बीरबल अकेले हिंदू थे, जिन्होंने अकबर के दीन-ए-इलाही धर्म को स्वीकार किया था। अकबर ने ही महेश दास को बीरबल की पदवी दी थी, जो प्रचलित हो गया।
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इतिहासकार एचएस होडीवाला के अनुसार, बीरबल नाम कथासरित्सागर से प्रेरित बैताल पचीसी के एक चरित्र वीरवर से निकला है। वेताल पंचविंशति का लेखन 11वीं शताब्दी का माना जाता है। अकबर ने कथासरित्सागर का फारसी में अनुवाद कराया था।

तो फिर सवाल उठता है कि अकबर-बीरबल के किस्सों की शुरुआत कहां से और कैसे हुई? अबुल फजल की पुस्तक आइन-ए-अकबरी और बदायूंनी ने मुंतखब-उत-तवारीख में बीरबल की सैन्य तथा बौद्धिक क्षमताओं के बारे में तो लिखा है, पर कहीं भी हाजिरजवाबी या हंसी-मजाक के किस्सों का जिक्र नहीं है। इन किस्सों का जिक्र सबसे पहले मासिर-उल-उलमा पुस्तक में मिलता है। इसे शाहनवाज खान ने लिखा था, जो विजयनगर साम्राज्य के शासक कृष्णदेव राय और उनके दरबारी कवि रामकृष्ण तेनालीराम के किस्सों से बखूबी वाकिफ थे। तेनालीराम दरबारियों की हर साजिश को विफल कर राजा के प्रिय बने रहते थे।

औरंगजेब ने जब गोलकुंडा पर हमला किया, तो दक्कन की कहानियां भी उत्तर की तरफ आने लगीं। वहां के कृष्णदेव अकबर और तेनालीराम बीरबल हो गए। 19वीं सदी आते-आते इतना प्रचार हुआ कि लोग इन्हें ही सही मानने लगे। अकबर-बीरबल की कहानियों पर शोध करने वाले अमेरिकी इतिहासकार सीएम नईम का कहना था कि इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं था, ये बस बाद में गढ़ी गईं, यानी वक्त के साथ अफसाना ही हकीकत बन गया।
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