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Holi 2026 Alert: होली के उल्लास के रंग को हुड़दंग करता है भंग

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 03 Mar 2026 03:27 PM IST
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सार

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो  के आंकड़े और अस्पतालों के इमरजेंसी वार्डों की खौफनाक हकीकत इस बात की गवाह है कि हमने सामूहिक उल्लास को आत्मघाती उन्माद हुड़दंग में बदल दिया है।

Holi 2026 Alert: The hustle and bustle spoils the joy of Holi
होली 2026 - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

वसंत की मंद बयार के साथ जब टेसू के फूलों की लालिमा पहाड़ों और मैदानों को अपनी आगोश में लेने लगती है, तो मन बरबस ही फाग के गीतों की ओर खिंच जाता है। होली, जो मूलतः जड़ और चेतन के मिलन का पर्व है, आज एक ऐसी विडंबनापूर्ण दहलीज पर खड़ी है जहाँ उत्सव की पवित्रता और आधुनिकता का बेलगाम हुड़दंग आमने-सामने हैं।

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गढ़वाल के गांवों में चीर बंधन की प्राचीन मर्यादा हो या कुमाऊं की बैठकी होली की शास्त्रीय रागनियाँ, हमारे पूर्वजों ने इस पर्व को एक 'सांस्कृतिक चिकित्सा' के रूप में गढ़ा था। लेकिन आज, उसी सांस्कृतिक विरासत पर शराबखोरी और नशे के तांडव की परतें चढ़ गई हैं।
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो  के आंकड़े और अस्पतालों के इमरजेंसी वार्डों की खौफनाक हकीकत इस बात की गवाह है कि हमने सामूहिक उल्लास को आत्मघाती उन्माद हुड़दंग में बदल दिया है।

जब जोश खो बैठता है होश तो सड़कों पर बढ़ता जोखिम

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वार्षिक प्रतिवेदन उत्सव के नाम पर होने वाले इस विनाश की पुष्टि करते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, होली के पावन अवसर पर सड़क दुर्घटनाओं में सामान्य दिनों की तुलना में 32 से 38 प्रतिशत तक की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की जाती है।

यातायात पुलिस के प्रतिवेदनों पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि अकेले एक दिन में नशे की स्थिति में वाहन चलाने और तीव्र गति के कारण हजारों की संख्या में दंड-पर्चियां काटी जाती हैं, जिनमें से अधिकांश शिकार 18 से 35 वर्ष के युवा होते हैं। चिकित्सालयों का साक्ष्य और भी भयावह है; रसायनों युक्त रंगों के कारण आंखों की ज्योति जाने और त्वचा के गंभीर रोगों के मामलों में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है।

यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उस सामाजिक पतन का प्रमाण हैं जहाँ व्यक्तिगत रंजिश और नशे के वशीभूत होकर किए गए विवाद सामुदायिक संघर्ष का रूप ले लेते हैं और उत्सव की अगली सुबह कई घरों के लिए जीवन भर का मातम बन जाती है। 

उल्लास की ओट में रसायनों का जानलेवा खेल

होली के पीछे छिपे वैज्ञानिक पक्ष को टटोलें तो यह पर्व आयुर्वेद और ऋतु परिवर्तन के बीच एक सेतु का काम करता है। सर्दियों की विदाई और ग्रीष्म के आगमन के इस संधि काल में शरीर के भीतर दोषों का असंतुलन स्वाभाविक है। पुराने समय में पलाश (टेसू) के फूलों का अर्क, हल्दी और चंदन का उपयोग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक 'प्राकृतिक हीलिंग' प्रक्रिया थी।

पलाश के पानी से स्नान करना त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता था और आने वाली तपिश के लिए शरीर को तैयार करता था। यहाँ तक कि होलिका दहन की अग्नि और उसकी परिक्रमा वातावरण के हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने की एक सामूहिक वैज्ञानिक विधि थी। दुर्भाग्यवश, आज उन औषधीय रंगों की जगह घातक रसायनों, पेंट और ग्रीस ने ले ली है।

चिकित्सा जगत की रिपोर्टें भयावह हैं; होली के दौरान रासायनिक रंगों के कारण आँखों की रोशनी खोने, कॉर्निया डैमेज होने और त्वचा की लाइलाज एलर्जी के मामले सामान्य दिनों के मुकाबले 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं। 'बुरा न मानो होली है' का मुहावरा आज सहमति से उल्लंघन का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

सड़कों पर मौत का नाच और आंकड़ों का आईना

इस पर्व का सबसे अंधकारमय पक्ष वह हुड़दंग है जो सड़कों पर 'मौत का नाच' नचाता है। एनसीआरबी और विभिन्न राज्यों के ट्रैफिक पुलिस डेटा का विश्लेषण करें तो एक डरावनी तस्वीर उभरती है। होली के दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ सामान्य दिनों की तुलना में अचानक ऊपर चढ़ जाता है। इसका एकमात्र कारण है—बेलगाम शराबखोरी।

नशे की हालत में तेज रफ्तार मोटरसाइकिलें और सड़कों पर किया जाने वाला प्रदर्शन न केवल हुड़दंगियों की जान जोखिम में डालता है, बल्कि राह चलते उन निर्दोष लोगों के घरों का उजाला भी बुझा देता है जो शांति से त्योहार मनाना चाहते हैं।

अकेले राष्ट्रीय राजधानी और उत्तर भारत के महानगरों में होली के दिन हजारों की संख्या में 'ड्रिंक एंड ड्राइव' के चालान इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी सामाजिक चेतना कितनी सुस्त पड़ चुकी है। अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटर उस दिन घायलों से पटे रहते हैं, जिनमें से अधिकांश मामले नशे के कारण हुए आपसी झगड़ों या वाहन दुर्घटनाओं के होते हैं।

लुप्त होती सांस्कृतिक मर्यादा और सामाजिक क्षरण

यदि हम गढ़वाल और कुमाऊं की समृद्ध परंपराओं की ओर मुड़कर देखें, तो होली राग-विराग का एक आध्यात्मिक संगम थी। वहाँ संगीत की एक मर्यादा थी, शब्दों का एक शास्त्र था और रंगों में एक गरिमा थी। आज उन लोक-परंपराओं की जगह कानफोड़ू डीजे और अश्लील गानों के शोर ने ले ली है।

उत्सव के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ होने वाली अभद्रता और छेड़छाड़ ने इस त्योहार को 'भय' का पर्व बना दिया है। सामूहिक उल्लास का अर्थ कभी भी व्यक्तिगत गरिमा का हनन नहीं था। हम भूल रहे हैं कि होली आत्मिक शुद्धिकरण का अवसर थी, जहां आपसी द्वेष को रंगों में घोलकर मिटाया जाता था, न कि नशे की धुंध में नए विवादों को जन्म दिया जाता था।

आज का 'उन्मादी युवा' यह समझने में असमर्थ है कि त्योहारों का आनंद चेतना खोने में नहीं, बल्कि चेतना के विस्तार में है।

संकल्प की जरूरत: रंग वही जो दिल जोड़ें

वक्त आ गया है कि हम होली के उस खोए हुए गौरव और वैज्ञानिक गरिमा को पुनर्स्थापित करने के लिए सामूहिक प्रयास करें। उत्सव की सार्थकता तभी है जब वह किसी दूसरे की सिसकी का कारण न बने।

कानून और पुलिस अपनी भूमिका निभाएंगे, लेकिन एक जागरूक समाज के रूप में जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी होगी। हमें अपनी नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि पलाश के फूलों की वह मंद सुगंध और अपनों का साथ किसी भी कृत्रिम नशे से कहीं अधिक आनंददायक है।

होली आत्ममंथन का भी पर्व है—क्या हम वास्तव में त्योहार मना रहे हैं या सिर्फ अपनी कुंठाओं को भीड़ के नाम पर बाहर निकाल रहे हैं? आइए, इस बार संकल्प लें कि हम रंगों के माध्यम से दिलों को जोड़ेंगे, सड़कों पर हादसों की इबारत नहीं लिखेंगे।

असल होली वही है, जो शाम ढलते समय किसी के घर में मातम नहीं, बल्कि हर चेहरे पर एक आत्मिक संतोष और खुशनुमा चमक छोड़ जाए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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