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जीवन धाराः हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दोनों तुम्हारे भीतर हैं
ओशो
Published by: Pavan
Updated Tue, 03 Mar 2026 08:39 AM IST
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सार
हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं- प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटनेवाली दो घटनाएं हैं। जब तक तुम्हारे मन में संदेह है, हिरण्यकश्यप है। कितनी बार नहीं तुम्हारे मन में श्रद्धा का भाव उठता है, पर संदेह उसे झपटकर पकड़ लेता है।
जीवन धाराः हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दोनों तुम्हारे भीतर हैं
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
होलिका दहन रहस्य पुराण इतिहास नहीं है। पुराण महाकाव्य है। पुराण में किन्हीं घटनाओं का अंकन नहीं है, वरन किन्हीं सत्यों की ओर इंगित है। पुराण शाश्वत है। ऐसा कभी हुआ था कि नास्तिक के घर आस्तिक का जन्म हुआ? ऐसा नहीं; सदा ही नास्तिकता में ही आस्तिकता का जन्म होता है। नास्तिकता आस्तिकता की मां है, पिता है। नास्तिकता के गर्भ से ही आस्तिकता का आविर्भाव होता है।
हिरण्यकश्यप कभी हुआ या नहीं, मुझे प्रयोजन नहीं है। प्रह्लाद कभी हुए, न हुए, प्रहलाद जानें। पुराण में जिस तरफ इशारा है, वह रोज होता है, प्रतिपल होता है, हमारे भीतर हुआ है, हमारे भीतर हो रहा है। जब भी कहीं भी मनुष्य होगा, पुराण का सत्य दोहराया जाएगा। पुराण सार-निचोड़ है; मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित सत्य है। साधारणतः हम समझते हैं कि नास्तिक आस्तिक का विरोधी है। वह गलत है। नास्तिक बेचारा विरोधी होगा कैसे! नास्तिकता को आस्तिकता का पता नहीं है। आस्तिकता के विरोध में नहीं हो सकती नास्तिकता, क्योंकि आस्तिकता तो नास्तिकता के भीतर से ही आविर्भूत होती है।
नास्तिकता जैसे बीज है और आस्तिकता उसी का अंकुरण है। बीज का अभी अपने अंकुर से मिलना नहीं हुआ। जब तक बीज है, तब तक अंकुर नहीं है। अंकुर तो तभी होगा, जब बीज टूटेगा और भूमि में खो जाएगा। बीज से ही अंकुर पैदा होता है, लेकिन बीज के विसर्जन से, बीज के खो जाने से, बीज के तिरोहित हो जाने से। बीज अंकुर का विरोधी कैसे हो सकता है! बीज तो अंकुर की सुरक्षा है। लेकिन, बीज को अंकुर का कुछ पता नहीं है। इसी अज्ञान में बीज संघर्ष भी कर सकता है अपने को बचाने का-कि टूट न जाऊं, खो न जाऊं, मिट न जाऊं! उसे पता नहीं कि उसी की मृत्यु से महाजीवन का सूत्र उठेगा। उसे पता नहीं, उसी की राख से फूल उठनेवाले हैं। इसलिए बीज क्षमा योग्य है, उस पर नाराज मत होना। दया योग्य है।
इसलिए जब भी कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होगा, संप्रदाय से संघर्ष निश्चित है होगा ही। संप्रदाय यानी हिरण्यकश्यप, धर्म यानी प्रहलाद। निश्चित ही हिरण्यकश्यप शक्तिशाली है, प्रतिष्ठित है। सब ताकत उसके हाथ में है। प्रह्लाद नया-नया उगा अंकुर है। सारी शक्ति तो अतीत की है, वर्तमान तो अभी-अभी आया है। पर मजा यही है कि वर्तमान जीतेगा और अतीत हारेगा; क्योंकि वर्तमान जीवंतता है और अतीत मौत है। हिरण्यकश्यप के पास सब था। वह जो चाहता, करता। जो चाहा उसने करने की कोशिश भी की, फिर भी हारता गया। शक्ति नहीं जीतती, जीवन जीतता है। प्रतिष्ठा नहीं जीतती, सत्य जीतता है। संप्रदाय पुराने हैं।...
इसलिए मैं कहता हूं, पुराण तथ्य नहीं है, सत्य है। कुछ एक शक्ति है, जो व्यक्ति की नहीं है, परमात्मा की है। वही तो भक्त का अर्थ है। भक्त का अर्थ हैः जिसने कहा, 'मैं नहीं हूं, तू है'! भक्त ने कहा, 'अब जले तो तू जलेगा; मरे तो तू मरेगा; हारे तो तू हारेगा; जीते तो तू जीतेगा। हम बीच से हट जाते हैं।' नास्तिकता में ही आस्तिक पैदा होगा। तुम सभी नास्तिक हो। हिरण्यकश्यप बाहर नहीं है, न ही प्रह्लाद बाहर है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं-प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटनेवाली दो घटनाएं हैं। जब तक तुम्हारे मन में संदेह है, हिरण्यकश्यप है। कितनी बार नहीं तुम्हारे मन में श्रद्धा का भाव उठता है, पर संदेह उसे झपटकर पकड़ लेता है। कितनी बार नहीं, तुम किनारे-किनारे आ जाते हो छलांग लगाने के, संदेह पैर में जंजीर बनकर रोक लेता है, क्या कर रहे हो! पैर रुक जाते हैं। सोचते हो, कल कर लेंगे, इतनी जल्दी क्या है! क्रांति कितनी बार तुम्हारे भीतर नहीं उन्मेष लेती है! कितनी बार नहीं तुम्हारे भीतर क्रांति का झंझावात आता है--और तुम बार-बार संदेह का साथ पकड़कर रुक जाते हो! यह तुम अपने भीतर खोजो। यह कथा पुराण में खोजने की नहीं है। यह तुम्हारे प्राण में खोजने की है। यह पुराण तुम्हारे प्राणों में लिखा हुआ है। – ओशो भक्ति-सूत्र प्रवचन –16
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हिरण्यकश्यप कभी हुआ या नहीं, मुझे प्रयोजन नहीं है। प्रह्लाद कभी हुए, न हुए, प्रहलाद जानें। पुराण में जिस तरफ इशारा है, वह रोज होता है, प्रतिपल होता है, हमारे भीतर हुआ है, हमारे भीतर हो रहा है। जब भी कहीं भी मनुष्य होगा, पुराण का सत्य दोहराया जाएगा। पुराण सार-निचोड़ है; मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित सत्य है। साधारणतः हम समझते हैं कि नास्तिक आस्तिक का विरोधी है। वह गलत है। नास्तिक बेचारा विरोधी होगा कैसे! नास्तिकता को आस्तिकता का पता नहीं है। आस्तिकता के विरोध में नहीं हो सकती नास्तिकता, क्योंकि आस्तिकता तो नास्तिकता के भीतर से ही आविर्भूत होती है।
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नास्तिकता जैसे बीज है और आस्तिकता उसी का अंकुरण है। बीज का अभी अपने अंकुर से मिलना नहीं हुआ। जब तक बीज है, तब तक अंकुर नहीं है। अंकुर तो तभी होगा, जब बीज टूटेगा और भूमि में खो जाएगा। बीज से ही अंकुर पैदा होता है, लेकिन बीज के विसर्जन से, बीज के खो जाने से, बीज के तिरोहित हो जाने से। बीज अंकुर का विरोधी कैसे हो सकता है! बीज तो अंकुर की सुरक्षा है। लेकिन, बीज को अंकुर का कुछ पता नहीं है। इसी अज्ञान में बीज संघर्ष भी कर सकता है अपने को बचाने का-कि टूट न जाऊं, खो न जाऊं, मिट न जाऊं! उसे पता नहीं कि उसी की मृत्यु से महाजीवन का सूत्र उठेगा। उसे पता नहीं, उसी की राख से फूल उठनेवाले हैं। इसलिए बीज क्षमा योग्य है, उस पर नाराज मत होना। दया योग्य है।
इसलिए जब भी कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होगा, संप्रदाय से संघर्ष निश्चित है होगा ही। संप्रदाय यानी हिरण्यकश्यप, धर्म यानी प्रहलाद। निश्चित ही हिरण्यकश्यप शक्तिशाली है, प्रतिष्ठित है। सब ताकत उसके हाथ में है। प्रह्लाद नया-नया उगा अंकुर है। सारी शक्ति तो अतीत की है, वर्तमान तो अभी-अभी आया है। पर मजा यही है कि वर्तमान जीतेगा और अतीत हारेगा; क्योंकि वर्तमान जीवंतता है और अतीत मौत है। हिरण्यकश्यप के पास सब था। वह जो चाहता, करता। जो चाहा उसने करने की कोशिश भी की, फिर भी हारता गया। शक्ति नहीं जीतती, जीवन जीतता है। प्रतिष्ठा नहीं जीतती, सत्य जीतता है। संप्रदाय पुराने हैं।...
इसलिए मैं कहता हूं, पुराण तथ्य नहीं है, सत्य है। कुछ एक शक्ति है, जो व्यक्ति की नहीं है, परमात्मा की है। वही तो भक्त का अर्थ है। भक्त का अर्थ हैः जिसने कहा, 'मैं नहीं हूं, तू है'! भक्त ने कहा, 'अब जले तो तू जलेगा; मरे तो तू मरेगा; हारे तो तू हारेगा; जीते तो तू जीतेगा। हम बीच से हट जाते हैं।' नास्तिकता में ही आस्तिक पैदा होगा। तुम सभी नास्तिक हो। हिरण्यकश्यप बाहर नहीं है, न ही प्रह्लाद बाहर है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं-प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटनेवाली दो घटनाएं हैं। जब तक तुम्हारे मन में संदेह है, हिरण्यकश्यप है। कितनी बार नहीं तुम्हारे मन में श्रद्धा का भाव उठता है, पर संदेह उसे झपटकर पकड़ लेता है। कितनी बार नहीं, तुम किनारे-किनारे आ जाते हो छलांग लगाने के, संदेह पैर में जंजीर बनकर रोक लेता है, क्या कर रहे हो! पैर रुक जाते हैं। सोचते हो, कल कर लेंगे, इतनी जल्दी क्या है! क्रांति कितनी बार तुम्हारे भीतर नहीं उन्मेष लेती है! कितनी बार नहीं तुम्हारे भीतर क्रांति का झंझावात आता है--और तुम बार-बार संदेह का साथ पकड़कर रुक जाते हो! यह तुम अपने भीतर खोजो। यह कथा पुराण में खोजने की नहीं है। यह तुम्हारे प्राण में खोजने की है। यह पुराण तुम्हारे प्राणों में लिखा हुआ है। – ओशो भक्ति-सूत्र प्रवचन –16