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खास: सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी; शिवशंकर खेलें फाग गौरा संग लिये
विद्यानिवास मिश्र
Published by: Pavan
Updated Wed, 04 Mar 2026 08:37 AM IST
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सार
यों तो होली में बूढ़े बाबा भी देवर लगते हैं, पर जो नवेलियों को भी नवल लग सके, ऐसे नंदलाल की बातें कीजिए, जिसकी सांवली-सलोनी मूर्ति आज रंग में रंग उठी है।
सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सुना है, महाकाल के मंदिर में शिव को चिता-भस्म चढ़ाना जरूरी होता है। अबीर और गुलाल से ये देवता रीझने वाले नहीं। हम यदि मसान की मस्ती कायम न रख सके, तो हमारा शिव शव हो जाएगा, तब छिन्नमस्ता महाकाली उसके ऊपर तुरंत खप्पर लिए नाच मचाने लगेगी। उस शोणित-रंजित दृश्यपट से अपने क्षितिज को बचाने के लिए ही हमें आज यह चौताल उठाना है- शिवशंकर खेलें फाग गौरा संग लिये।
यों तो इस महीने में बूढ़े बाबा भी देवर लगते हैं, पर जो नवेलियों को भी नवल लग सके, ऐसे नंदलाल की रसीली बातें कीजिए, जिसकी सांवली-सलोनी मूर्ति आज बसंती रंग में नख-शिख सराबोर हो उठी है। हां, यह दूसरी बात है कि हमारा यह बांका छैला भी परकीया के पीछे ही अधिक पागल है, यहां तक कि उसे अपने पीतांबर के लिए चीनांशुक के बिना काम नहीं चलता और वह अपनी ‘उज्ज्वल नीलमणिता’ खोकर लाल-लाल रह गया है।
उसे इतनी भी अपने गांव-घर की सुधि नहीं है कि आज होली के दिन जब गांव का गांव इस नए वसंत में होरहा हो चुका है, तब बीतते संवत्सर की चिताधूलि उड़ाने के लिए उसे बार-बार फेरी लगाना है। फागुन में छाने वाली घनघटा चीरकर उसे एक किरण झलकानी है, द्वार-द्वार दुख की लरजती छाया में उसे आनंद की धूप-छांह खेलनी है, और न जाने किस युग से चला आता हुआ यह गीत उसे गाना है- सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी।
आनंद लाने के लिए बांकी जवानी को अपने ‘घर की वर बात’ विलोकनी होगी, नहीं तो घर एकदम उजड़ चुका है, सुरमा लगाने वाले रंगी बुढ़ऊ से कोई उम्मीद वैसे ही नहीं है, अब आशा है, तो उसी अल्हड़ मनमोहन से, जो न जाने कहां-कहां रंगरेली करके अनमने और सूखे भाव से रीति निभाने के लिए मधुरात के ढुलते प्रहर में अपनी थकित और निराश प्रेयसी के पास फाग खेलने आता है, दुख में पगी हुई नवेली इस सूखे स्नेह को दूर से झारती हुई कहती है- ‘फाग खेलने की मनाही नहीं है, पर तुम्हारी आंखों में जो किसी दूसरी बड़भागिनी का रंग चढ़ा हुआ है, उसी को अपने में पाकर मेरी आंखें निहाल हैं। उसमें फिर अपनी यह अबीर न मिलाओ, इतनी ही विनती है। मैं तो होरहा हो ही रही हूं, अब प्रेम को होरहा न करो।’
मैं गंवार अनपढ़ किसान ठीक यही बात अपना होरहा भूनते-भूनते सोचता हूं कि मेरी बात कौन समझेगा। मानता हूं, लोकगीतों का फैशन चल गया है, आधी रात बेला अब दिल्ली शहर के बीच भी फूलने लगा है और जिसमें ग्राम्यता की झीनी पॉलिश पर हृदय शहराती, रजत बोलपटों से ऐसे पनघट वाले रूमानी गीत हर एक बंगले में लहराने लगे हैं और विहंगम कवियों की वाणी भी ग्राम्या की छवि निहारने लगी है।
मैं तो इस उधेड़-बुन में देखता हूं कि होरहा की आग हवा के झोंकों में बुझ गई है। अधझुलसा रहिले (चने) का डांठ धुअठ भर गया है, कड़े छिलके के भीतर छिपे हुए दाने अभी दुबार के दुबार बने हुए हैं, उनके रस तक आंच पहुंच न सकी। परंतु मेरे अंतर की अधपकी फल, बाहर की ज्वाला की लहक पाकर ही एकदम राख हो गई है। बस इसके अनुताप में गुनगुनाता बच रहा है- नहिं आवत चैन हाय जियरा जरि गइले... - होरहा निबंध के संपादित अंश
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यों तो इस महीने में बूढ़े बाबा भी देवर लगते हैं, पर जो नवेलियों को भी नवल लग सके, ऐसे नंदलाल की रसीली बातें कीजिए, जिसकी सांवली-सलोनी मूर्ति आज बसंती रंग में नख-शिख सराबोर हो उठी है। हां, यह दूसरी बात है कि हमारा यह बांका छैला भी परकीया के पीछे ही अधिक पागल है, यहां तक कि उसे अपने पीतांबर के लिए चीनांशुक के बिना काम नहीं चलता और वह अपनी ‘उज्ज्वल नीलमणिता’ खोकर लाल-लाल रह गया है।
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उसे इतनी भी अपने गांव-घर की सुधि नहीं है कि आज होली के दिन जब गांव का गांव इस नए वसंत में होरहा हो चुका है, तब बीतते संवत्सर की चिताधूलि उड़ाने के लिए उसे बार-बार फेरी लगाना है। फागुन में छाने वाली घनघटा चीरकर उसे एक किरण झलकानी है, द्वार-द्वार दुख की लरजती छाया में उसे आनंद की धूप-छांह खेलनी है, और न जाने किस युग से चला आता हुआ यह गीत उसे गाना है- सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी।
आनंद लाने के लिए बांकी जवानी को अपने ‘घर की वर बात’ विलोकनी होगी, नहीं तो घर एकदम उजड़ चुका है, सुरमा लगाने वाले रंगी बुढ़ऊ से कोई उम्मीद वैसे ही नहीं है, अब आशा है, तो उसी अल्हड़ मनमोहन से, जो न जाने कहां-कहां रंगरेली करके अनमने और सूखे भाव से रीति निभाने के लिए मधुरात के ढुलते प्रहर में अपनी थकित और निराश प्रेयसी के पास फाग खेलने आता है, दुख में पगी हुई नवेली इस सूखे स्नेह को दूर से झारती हुई कहती है- ‘फाग खेलने की मनाही नहीं है, पर तुम्हारी आंखों में जो किसी दूसरी बड़भागिनी का रंग चढ़ा हुआ है, उसी को अपने में पाकर मेरी आंखें निहाल हैं। उसमें फिर अपनी यह अबीर न मिलाओ, इतनी ही विनती है। मैं तो होरहा हो ही रही हूं, अब प्रेम को होरहा न करो।’
मैं गंवार अनपढ़ किसान ठीक यही बात अपना होरहा भूनते-भूनते सोचता हूं कि मेरी बात कौन समझेगा। मानता हूं, लोकगीतों का फैशन चल गया है, आधी रात बेला अब दिल्ली शहर के बीच भी फूलने लगा है और जिसमें ग्राम्यता की झीनी पॉलिश पर हृदय शहराती, रजत बोलपटों से ऐसे पनघट वाले रूमानी गीत हर एक बंगले में लहराने लगे हैं और विहंगम कवियों की वाणी भी ग्राम्या की छवि निहारने लगी है।
मैं तो इस उधेड़-बुन में देखता हूं कि होरहा की आग हवा के झोंकों में बुझ गई है। अधझुलसा रहिले (चने) का डांठ धुअठ भर गया है, कड़े छिलके के भीतर छिपे हुए दाने अभी दुबार के दुबार बने हुए हैं, उनके रस तक आंच पहुंच न सकी। परंतु मेरे अंतर की अधपकी फल, बाहर की ज्वाला की लहक पाकर ही एकदम राख हो गई है। बस इसके अनुताप में गुनगुनाता बच रहा है- नहिं आवत चैन हाय जियरा जरि गइले... - होरहा निबंध के संपादित अंश