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मेरी ज्यादातर होलियां जेल में ही बीतीं: आजादी लाने की उमंगों के रंगों से रंगे थे हम, जमाना होली खेलने का न था
मन्मनाथ गुप्त
Published by: Pavan
Updated Wed, 04 Mar 2026 08:31 AM IST
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सार
वह जमाना हमारे लिए रंगों से होली खेलने का न था। आजादी लाने की उमंगों के रंगों से रंगे थे हम और हमारे कितने ही नौजवान। हमारी युवा टोली का कौल था: देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।
मेरी ज्यादातर होलियां जेल में ही बीतीं
- फोटो : FreePik
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विस्तार
हमारे पथ के प्रतिपादक थे कवि अजीमुल्ला, चापेकर बंधु, खुदीराम बोस, करतार सिंह सराबा, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस। मैं इन्हीं लोगों के साथ, कभी आगे, तो कभी पीछे था। हालात यह रहे कि मेरी लगभग बीस होलियां जेल में ही बीतीं।
वह जमाना हमारे लिए रंगों से होली खेलने का न था। आजादी लाने की उमंगों के रंगों से रंगे थे हम और हमारे कितने ही नौजवान। मेरा जन्म वसंत पंचमी के अगले दिन शीतल षष्ठी, सात फरवरी, 1908 को हुआ था। उस दिन सरस्वती पूजन होता है।
होली वसंत का ही त्योहार है। युवा हुए, तो हमारे मन में क्रांति की होली जली और हम जिन तमन्नाओं की तरंगों में झूमे, वह थी-
हमारा हिंद भी फूले-फलेगा,
एक दिन लेकिन मिलेंगे खाक में लाखों,
हमारे गुलबदन पहले।
सो, हम उस जमाने में क्रांतिकारियों के साथ थे और रक्त से होली खेलने के हामी थे, पर हमारा उद्देश्य एक सर्जन के समान देशरूपी शरीर को सड़ाने और कष्ट पहुंचाने वाले अंग को काट-मार कर अलग कर देने का था। हमारी युवा टोली का कौल था : देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।
हम अपने जमाने में उस पथ के पथिक रहे, जिसके प्रतिपादक थे कवि अजीमुल्ला, चापेकर बंधु, खुदीराम बोस, करतार सिंह सराबा, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस। मैं इन्हीं लोगों के साथ, कभी आगे, तो कभी पीछे था। हालात यह रहे कि मेरी लगभग बीस होलियां जेल में ही बीतीं। वहीं क्रांति के गीत गाते हुए हमने होलियां मनाई थीं। पत्नी के या किसी अन्य के साथ रंग-गुलाल और मस्ताते हुए होली खेलने का मौका ही कहां मिला था हमें। - प्रस्तुति सुधीर विद्यार्थी
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वह जमाना हमारे लिए रंगों से होली खेलने का न था। आजादी लाने की उमंगों के रंगों से रंगे थे हम और हमारे कितने ही नौजवान। मेरा जन्म वसंत पंचमी के अगले दिन शीतल षष्ठी, सात फरवरी, 1908 को हुआ था। उस दिन सरस्वती पूजन होता है।
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होली वसंत का ही त्योहार है। युवा हुए, तो हमारे मन में क्रांति की होली जली और हम जिन तमन्नाओं की तरंगों में झूमे, वह थी-
हमारा हिंद भी फूले-फलेगा,
एक दिन लेकिन मिलेंगे खाक में लाखों,
हमारे गुलबदन पहले।
सो, हम उस जमाने में क्रांतिकारियों के साथ थे और रक्त से होली खेलने के हामी थे, पर हमारा उद्देश्य एक सर्जन के समान देशरूपी शरीर को सड़ाने और कष्ट पहुंचाने वाले अंग को काट-मार कर अलग कर देने का था। हमारी युवा टोली का कौल था : देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।
हम अपने जमाने में उस पथ के पथिक रहे, जिसके प्रतिपादक थे कवि अजीमुल्ला, चापेकर बंधु, खुदीराम बोस, करतार सिंह सराबा, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस। मैं इन्हीं लोगों के साथ, कभी आगे, तो कभी पीछे था। हालात यह रहे कि मेरी लगभग बीस होलियां जेल में ही बीतीं। वहीं क्रांति के गीत गाते हुए हमने होलियां मनाई थीं। पत्नी के या किसी अन्य के साथ रंग-गुलाल और मस्ताते हुए होली खेलने का मौका ही कहां मिला था हमें। - प्रस्तुति सुधीर विद्यार्थी