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हमारा दिमाग खाली हो रहा है: सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Tue, 28 Jul 2026 09:23 AM IST
सार

एक शोध के मुताबिक, 64 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी है, तो उसे कंप्यूटर या दिमाग में क्यों सहेजें। आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा।

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Human mind surrendering fundamental human instinct to preserve and remember to artificial intelligence nasty
एआई के दौर में ब्रेन से संबंधित समस्याएं (सांकेतिक) - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी संचय करने की प्रवृत्ति रही है। पहले गुफाओं में चित्र बने, अन्न को सहेजा, सभ्यता का निर्माण हुआ। इन्सान ने घर बनाना शुरू किया, फिर कागज पर इतिहास लिखा गया और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में हमने सब कुछ ‘कंप्यूटर व हार्ड ड्राइव’ में सेव करना शुरू कर दिया। ‘कंट्रोल प्लस एस’ सिर्फ एक कमांड नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान को सुरक्षित रखने का हमारा डिजिटल रक्षा कवच बन गया था। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और जनरेटिव एआई (जैसे चैटजीपीटी, क्लाउड) के आगमन ने इस मानवीय आदत पर एक ऐसा प्रहार किया, जिसकी चिंता समाजशास्त्रियों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों को भी है।

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जब मनुष्य अपनी बनाई चीजों को सहेजना बंद कर देता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाता है। माइक्रोसॉफ्ट व लिंक्डइन की मई 2024 की ‘वर्क ट्रेंड इंडेक्स’ रिपोर्ट बताती है कि आज दुनिया के 75 प्रतिशत से ज्यादा दफ्तरी कामकाजी लोग अपने रोज के काम, कोडिंग व रिसर्च के लिए सीधे एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई ने साल 2015-2016 के अपने एक बड़े शोध में इस आदत को ‘डिजिटल विस्मृति’(डिजिटल एम्नेशिया) का नाम दिया था। इस रिसर्च के मुताबिक, 64 फीसदी से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी चौबीसों घंटे मौजूद है, तो वे उसे अपने कंप्यूटर या दिमाग में सहेजने की मेहनत छोड़ चुके हैं। इसे ‘कॉग्निटिव ऑफलोडिंग’ कहते हैं, यानी दिमाग पर जोर डालने व डाटा सुरक्षित रखने का काम इन्सानों ने पूरी तरह मशीनों को सौंप दिया है। पिछले दो दशकों तक किसी भी डिजिटल क्रिएटर, लेखक या कोडर के लिए सबसे बड़ा डर था-डाटा का खो जाना। सिस्टम क्रैश होने के डर से उंगलियां अनैच्छिक रूप से हर दो मिनट में ‘कंट्रोल प्लस एस’ दबा देती थीं। यह इस बात का प्रतीक था कि हम अपने द्वारा बनाए गए कंटेंट के मालिक थे और उसे भविष्य के लिए सहेजना हमारी जिम्मेदारी थी।
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आज जनरेटिव एआई ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कोई कोडर अपने कोड की लाइब्रेरी सेव नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि अगली बार जरूरत पड़ने पर एआई कुछ ही सेकंड में नया व बेहतर कोड लिख देगा। जब ज्ञान ‘ऑन-डिमांड’ उपलब्ध हो, तो उसे सहेजने की मेहनत कौन करे? तकनीक की भाषा में इसे ‘एल्गोरिद्मिक री-जेनरेशन’ कहा जाता है, जहां संचय की आवश्यकता ही समाप्त हो रही है। साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो द्वारा ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित एक प्रसिद्ध शोध में पहली बार ‘गूगल इफेक्ट’ को दुनिया के सामने रखा गया था, जिसमें शोधकर्ताओं ने ये निष्कर्ष निकाला था कि जब लोगों को पता होता है कि जानकारी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगी, तो हमारा दिमाग जानकारी को याद रखने के बजाय ‘यह कहां मिलेगी’ उस रास्ते को याद रखता है।
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जनरेटिव एआई के दौर में यह ‘गूगल इफेक्ट’ अब  डिजिटल विस्मृति में बदल चुका है। हम फोन नंबर याद रखने की आदत पहले ही खो चुके थे, अब हम विचारों के तार्किक ढांचे को भी याद रखना छोड़ रहे हैं। जब हम किसी चीज को ‘सेव’ करते हैं, तो उसे एक श्रेणी देते हैं, जो हमारे मस्तिष्क में एक न्यूरल पाथवे बनाती है। सेव न करने का मतलब है कि हम उस ज्ञान के साथ अपना मानसिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं। आज हम जो कुछ भी लिख रहे हैं, वह सीधे एआई के सर्वरों पर जा रहा है। यदि कल ये एआई टूल्स सशुल्क (पेड) हो जाते हैं या इनका सर्वर डाउन हो जाता है, तो हमारे पास अपने काम का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। यह ज्ञान की एक नई औपनिवेशिकता है, जहां हमारा व्यक्तिगत बौद्धिक डाटा सिलिकॉन वैली की कंपनियों के नियंत्रण में है। हम इतिहास के सबसे बड़े कुछ चुनिंदा ‘कंटेंट क्रिएटर’ तो बन गए हैं, पर हमारे पास अपना खुद का कोई ‘आर्काइव’(संग्रह) नहीं है।


‘कंट्रोल प्लस एस’ केवल एक तकनीकी शॉर्टकट नहीं था, वह हमारी चेतना का एक हिस्सा था, जो कहता था- ‘यह विचार मूल्यवान है, इसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।’ यदि हम पूरी तरह से डिजिटल विस्मृति के इस प्रवाह में बह गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें।

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