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दिल्ली में युवाओं का प्रदर्शन: आंदोलन आपका हो, एजेंडा किसी और का नहीं
सार
लोकतंत्र में आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन विवेक बनाए रखना जिम्मेदारी है। अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलें, तभी परिवर्तन सकारात्मक होता है। यदि विवेक खो गया, तो सबसे सशक्त आंदोलन भी किसी और के हाथ का औजार बन सकता है।
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जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन
- फोटो : PTI
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विस्तार
जंतर-मंतर पर बीते दिनों जो कुछ भी हुआ, उसने केवल एक आंदोलन की तस्वीर नहीं दिखाई, बल्कि आज की युवा पीढ़ी के सामने खड़े एक बड़े प्रश्न को भी उजागर कर दिया। वह प्रश्न है- क्या हर वह व्यक्ति, जो किसी आंदोलन की भीड़ में दिखाई देता है, वास्तव में उसी उद्देश्य के लिए वहां मौजूद होता है?
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उत्तर है- जरूरी नहीं।
किसी भी आंदोलन में भीड़ दिखाई देती है, लेकिन भीड़ कभी एक जैसी नहीं होती। वहां अलग-अलग विचारों वाले लोग होते हैं, अलग-अलग संगठनों के लोग होते हैं, अलग-अलग राजनीतिक सोच वाले लोग होते हैं, अलग-अलग हितों वाले लोग होते हैं। कोई सचमुच पीड़ितों के साथ खड़ा होता है, कोई अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहता है, कोई राजनीतिक अवसर तलाशता है, कोई केवल भीड़ का हिस्सा बनना चाहता है और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किसी भी जनभावना को अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने का अवसर खोजते हैं।
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यहीं से युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।
यदि आपकी मांग न्यायसंगत है, यदि आपके साथ अन्याय हुआ है, यदि व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, तो अपनी बात रखना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में युवाओं की आवाज दबनी नहीं चाहिए। प्रश्न आंदोलन करने का नहीं है, प्रश्न यह है कि आंदोलन की दिशा किसके हाथ में है।
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मूल लक्ष्य से भटकते आंदोलन
इतिहास गवाह है कि अनेक बार वास्तविक पीड़ा किसी और की राजनीति का मंच बन गई। जिन युवाओं ने अपने भविष्य के लिए आवाज उठाई, कुछ समय बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि उनकी समस्या पीछे छूट गई और बहस किसी दूसरे विषय पर पहुंच गई। मुद्दा वही रहा, लेकिन मंच पर चेहरे बदल गए, नारे बदल गए और उद्देश्य भी बदल गया।
यही वह क्षण होता है, जब आंदोलन अपने मूल लक्ष्य से भटकने लगता है।
आज की जेन-जी तकनीक को समझती है, जानकारी तक उसकी पहुंच पहले की किसी भी पीढ़ी से अधिक है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन यही शक्ति तब कमजोरी बन जाती है, जब सोशल मीडिया की तेज रफ्तार, भावनात्मक भाषण, वायरल वीडियो और प्रभावशाली चेहरे उसकी स्वतंत्र सोच पर हावी होने लगते हैं।
याद रखिए, किसी आंदोलन में शामिल होना गलत नहीं है, लेकिन बिना सोचे-समझे किसी के पीछे चल पड़ना खतरनाक हो सकता है। हर नारा आपका नहीं होता, हर भाषण आपके हित में नहीं होता और हर मंच आपकी समस्या का समाधान नहीं चाहता।
इसलिए स्वयं से कुछ प्रश्न अवश्य पूछिए। क्या जो लोग आपके साथ खड़े हैं, वे आपकी समस्या का समाधान चाहते हैं या केवल आपकी संख्या का उपयोग करना चाहते हैं? क्या आंदोलन का एजेंडा वही है, जिससे आप जुड़े थे, या वह धीरे-धीरे किसी और दिशा में मुड़ चुका है? क्या निर्णय आंदोलन से जुड़े युवाओं द्वारा लिए जा रहे हैं, या कोई दूसरा उसकी दिशा तय कर रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर ही तय करेंगे कि आप आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं या केवल भीड़ का हिस्सा बन गए हैं।
अभिव्यक्ति के साथ जिम्मेदारी
लोकतंत्र में आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन विवेक बनाए रखना जिम्मेदारी है। अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलें, तभी परिवर्तन सकारात्मक होता है। यदि विवेक खो गया, तो सबसे सशक्त आंदोलन भी किसी और के हाथ का औजार बन सकता है।
जेन-जी को किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। उसे अपनी बात पूरी मजबूती से कहनी चाहिए। उसे अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। उसे व्यवस्था से जवाब भी मांगना चाहिए। लेकिन उतनी ही दृढ़ता से यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी आवाज किसी और की महत्वाकांक्षा का माध्यम न बन जाए।
याद रखिए, कठपुतली कभी अपनी दिशा स्वयं तय नहीं करती। उसकी डोर किसी और के हाथ में होती है। लेकिन जागरूक युवा कठपुतली नहीं बनते, वे अपनी डोर स्वयं थामते हैं।
इसलिए आवश्यकता आंदोलन से दूर रहने की नहीं, बल्कि आंदोलन के प्रति जागरूक रहने की है। आवश्यकता अपनी आवाज दबाने की नहीं, बल्कि अपनी आवाज पर अपना अधिकार बनाए रखने की है। आवश्यकता भीड़ बढ़ाने की नहीं, बल्कि उद्देश्य बचाए रखने की है।
यदि जेन-जी यह अंतर समझ गई, तो कोई भी उसकी ऊर्जा, उसके उत्साह और उसके भविष्य का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए नहीं कर पाएगा। तब आंदोलन केवल भीड़ नहीं होगा, बल्कि सचमुच परिवर्तन का माध्यम बनेगा- जहां नेतृत्व भी युवाओं का होगा, निर्णय भी युवाओं के होंगे और भविष्य भी युवाओं का होगा।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।