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मुद्दा: बिजली क्षेत्र को सुधारों का इंतजार, अब असली परीक्षा यह है कि हर उपभोक्ता तक कैसे पहुंचाई जाए?

Sat, 27 Jun 2026 08:30 AM IST
Pavan गोपाल कृष्ण अग्रवाल
गोपाल कृष्ण अग्रवाल Published by: Pavan Updated Sat, 27 Jun 2026 08:30 AM IST
सार

भारत ने बिजली उत्पादन बढ़ाने की चुनौती काफी हद तक जीत ली है, लेकिन अब असली परीक्षा यह है कि हर उपभोक्ता तक निर्बाध, पारदर्शी और भरोसेमंद बिजली कैसे पहुंचाई जाए?

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Issue: Power sector awaits reforms; the real test now is how to ensure supply reaches every consumer
electricity - फोटो : amar ujala

विस्तार

भारत जिस अर्थव्यवस्था का निर्माण करने जा रहा है, उसे भरोसेमंद बिजली आपूर्ति की बेहद जरूरत होगी। अगले विकास चक्र के अगुआ क्षेत्र डाटा सेंटर, सेमीकंडक्टर फैब, बैटरी गीगा फैक्टरी, ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट व एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, सभी में एक बात समान है। इनके लिए कुछ सेकंड की अस्थिरता कोई मामूली परेशानी नहीं, बल्कि वित्तीय प्रणाली पर सीधा असर डालने वाली घटना होती है।
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बीते वर्षों में दुनियाभर के डाटा सेंटरों की बिजली खपत में हर साल लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो अन्य सभी क्षेत्रों की कुल बिजली खपत वृद्धि की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा तेज है। अप्रैल, 2026 तक देश की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 537 गीगावाट से अधिक हो चुकी है और इसमें गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी लगभग 51 प्रतिशत है। जो देश कभी बिजली कटौती के लिए जाना जाता था, आज वह दुनिया की सबसे बड़ी बिजली प्रणालियों में से एक संचालित कर रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि हम बिजली पैदा कर सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उसे बेहतर तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकते हैं।
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एक आम भारतीय परिवार या फैक्टरी को ही देख लीजिए। अगर ब्रॉडबैंड सेवा खराब हो, तो एक दिन में ऑपरेटर उसे बदल सकता है। अगर कोई बैंक ज्यादा शुल्क वसूलता है, तो ग्राहक दूसरे बैंक का रुख कर सकते हैं। पर, जब बिजली आपूर्ति बाधित होती है या बिलिंग में पारदर्शिता नहीं रहती, तो उपभोक्ता के पास जाने के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। इसी कमी को दूर करने के लिए समानांतर लाइसेंसिंग की अवधारणा लाई जा रही है। बिजली अधिनियम लंबे समय से एक ही क्षेत्र में एक से अधिक वितरण लाइसेंसधारकों को सेवा देने की अनुमति देता है। पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र का पूरा ध्यान बिजली उत्पादन बढ़ाने, ग्रिड विस्तार करने और उन लोगों तक बिजली पहुंचाने पर रहा, जिनके पास पहले कोई सुविधा नहीं थी। तब वे प्राथमिकताएं सही थीं, लेकिन अब समय बदल गया है।
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इस समय चल रही गंभीर बहस, खासकर बिजली (संशोधन) विधेयक, 2025 के मसौदे को लेकर है। आशंका जताई जा रही है कि निजी बिजली वितरक सिर्फ मुनाफे वाले शहरी व औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ध्यान देंगे, जबकि ग्रामीण-किसान परिवारों की जिम्मेदारी सार्वजनिक कंपनियों पर छोड़ देंगे। पर, मसौदा विधेयक में हर लाइसेंसधारी पर यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन लागू किया गया है। सरकारें सब्सिडी नीति तय करती रहेंगी, ग्रामीण विद्युतीकरण सार्वजनिक दायित्व बना रहेगा और नियामक संस्थाएं नेटवर्क एक्सेस, टैरिफ और उपभोक्ता संरक्षण पर निगरानी रखती रहेंगी।


देशभर में कुल 72 डिस्कॉम संचालित हैं, जिनमें 44 सरकारी, 16 निजी क्षेत्र की कंपनियां और 12 बिजली विभाग शामिल हैं। टाटा पावर डीडीएल ने वित्त वर्ष 2024 तक एटीएंडसी घाटा 53 से घटाकर 5.9 फीसदी कर दिया। वहीं, टोरेंट पावर (अहमदाबाद-गांधीनगर) का टीएंडडी घाटा 2025 की पहली छमाही में 4.5 फीसदी और सीईएससी, कोलकाता का 2025 में 6.5 प्रतिशत रहा। अगर यह मॉडल देश के सबसे जटिल शहरी बाजारों में सफल हो सकता है, तो यह कहना मुश्किल है कि यह दूसरे इलाकों में काम नहीं कर सकता। बिजली उत्पादन में महारत हासिल करने के बाद अब भारत को उसकी निर्बाध और प्रभावी आपूर्ति में भी माहिर होना होगा, और पूरे सिस्टम के केंद्र में उपभोक्ता को रखना होगा।
 
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