विचार: पाकिस्तान के दुष्प्रचार का मुंहतोड़ जवाब था जम्मू-कश्मीर का संविधान
धीरे-धीरे भारतवासियों के मानस पटल से धारा 370 स्वतः ही विस्मृति में चली जाएगी और इतिहास के पन्नों में केवल शोधकर्ता ही उस धारा की तलाश करेंगे। लेकिन बावजूद तमाम आलोचनाओं और तर्कों के इस सच्चाई को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जम्मू-कश्मीर का संविधान अपने आप में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का एक माकूल जवाब भी था।
विस्तार
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 और उसकी धारा 35-ए के साथ ही राज्य के अलग संविधान को भारत की संसद द्वारा 5 अगस्त 2029 को समाप्त कर दिया गया था। अब भारत के सुप्रीम कोर्ट के 11 दिसम्बर 2023 के फैसले ने उस बहुचर्चित संवैधानिक प्रावधान और उस राज्य के अलग संविधान को सदा-सदा के लिए दफन कर दिया है। इसके बाद अब यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए।
वैसे भी धीरे-धीरे भारतवासियों के मानस पटल से धारा 370 स्वतः ही विस्मृति में चली जाएगी और इतिहास के पन्नों में केवल शोधकर्ता ही उस धारा की तलाश करेंगे। लेकिन बावजूद तमाम आलोचनाओं और तर्कों के इस सच्चाई को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जम्मू-कश्मीर का संविधान अपने आप में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का एक माकूल जवाब भी था। वह संविधान उस राज्य के भारत संघ के अनन्य भाग होने का एक दस्तावेजी प्रमाण भी था।
पाकिस्तान निरंतर दावा करता रहा कश्मीर पर
पाकिस्तान अपने जन्म के साथ ही जम्मू-कश्मीर की तुलना जूनागढ़ रियासत से करता रहा। जूनागढ़ का शासक मुस्लिम था और प्रजा हिन्दू थी, इसलिए पाकिस्तान का तर्क था कि जम्मू-कमीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है इसलिए उस पर उसका स्वाभाविक हक है। जबकि जूनागढ़ के भारत में विलय के भौगालिक और व्यवहारिक कारण थे।
पाकिस्तान इस रियासत के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाता रहा है। इस मुद्दे को लेकर सुयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का 91 वां संकल्प भी आया। इसके जवाब में जम्मू और कश्मीर के संविधान ने अपने स्वयं के संवैधानिक ढांचे के माध्यम से भारत के साथ अपने संबंधों को परिभाषित करके, राज्य के भारत में अंतिम विलय और भारतीय संघ के भीतर इसके अभिन्न अंग होने पर जोर देकर ऐसे दावों का मुकाबला किया था।
इस संविधान सभा द्वारा बनाए गए जम्मू और कश्मीर के संविधान में रक्षा, विदेशी मामले, वित्त और संचार को छोड़कर कई मामलों में राज्य को स्वायत्तता देने जैसे विशेष प्रावधान शामिल थे। इसने राज्य के स्थायी निवासियों के लिए विशेष अधिकार और विशेषाधिकार भी प्रदान किए।
संविधान की प्रस्तावना
जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया था कि ‘‘हम, जम्मू और कश्मीर राज्य के लोग, अक्तूबर के छब्बीसवें दिन हुए इस राज्य के भारत में विलय के अनुसरण में गंभीरता से संकल्प लेते हैं कि-
अपने आप को न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, पूजा की स्वतंत्रता, स्थिति और अवसर की समानता और हम सबके बीच प्रचार करना, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता, नवंबर, 1956 के इस सत्रहवें दिन हमारी संविधान सभा में एतद्द्वारा अपनाएं, अधिनियमित करें और दें। यह संविधान हमारे लिए है’
पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का अभिन्न मानता था वह संविधान
संविधान की प्रस्तावना से स्पष्ट ही था कि रियासत के लोगों ने जम्मू एवं कश्मीर राज्य को भारत का एक अखंड भाग मान लिया था। संविधान राज्य के लोगों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व प्रदान करता था और उस संविधान के अनुसार, जम्मू एवं कश्मीर राज्य में वह क्षेत्र शामिल है जो 15 अगस्त, 1947 के शासन के अंतर्गत था। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि इस राज्य के अधीन “पाक अधिकृत क्षेत्र” भी आता है।
संविधान सभा के 1954 के प्रस्ताव के बाद जम्मू और कश्मीर के संविधान में धारा को शामिल किया गया, जिसमें लिखा है, ‘‘जम्मू और कश्मीर राज्य भारत संघ का अभिन्न अंग है और रहेगा।’’ चूंकि जम्मू कश्मीर के लोगों द्वारा विधिवत् निर्वाचित संविधान सभा 26 अक्तूबर 1947 को भारत संघ में विलय को कानूनी रूप से वैध, संवैधानिक रूप से बाध्यकारी और अपरिवर्तनीय मान चुकी थी इसलिए पािकिस्तान द्वारा बार-बार जनमत संग्रह और आत्म निर्णय की मांग की हवा वैसे ही खिसक चुकी थी। यही नहीं 30 मार्च 1951 को सुरक्षा परिषद का 91वां जम्मू-कश्मीर के संविधान के प्रावधानों को प्रभावित नहीं कर सकती थी।
15 फरवरी 1954 को भारत में विलय की पुष्टि
वयस्क मताधिकार के आधार पर असंदिग्ध शब्दों में बुलाई गई संविधान सभा ने काफी बहस, विचार-विमर्श के बाद 15 फरवरी, 1954 को एक सुविचारित प्रस्ताव के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि की। इस संविधान सभा के उद्घाटन भाषण में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने कहा कि विधानसभा ’’विलय के संबंध में अपने तर्कसंगत निष्कर्ष देगी।
इस प्रकार, जम्मू और कश्मीर के लोगों ने अंततः अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली संविधान सभा के माध्यम से विलय के संबंध में किसी भी विवाद को सुलझा लिया। किसी ने भी, यहां तक कि सबसे खराब आलोचक ने भी, कभी भी संविधान सभा की प्रतिनिधि प्रकृति पर संदेह नहीं किया है।
जम्मू-कश्मीर का संविधान बनने में 5 साल लगे
राज्य नेतृत्व और भारत सरकार के बीच 1950 के दिल्ली समझौते के बाद 1951 में संविधान सभा का गठन किया गया था। इस समझौते ने राज्य के भारत में विलय की शर्तों को रेखांकित किया और जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक संविधान सभा की स्थापना का प्रावधान किया। सितम्बर-अक्तूबर 1951 में जम्मू एवं कश्मीर कीे संविधान सभा का निर्वाचन राज्य के भविष्य के संविधान के निर्माण के लिए तथा भारत के साथ सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए किया गया था। रियासत की संविधान सभा के अध्यक्ष जस्टिस मेहरचन्द महाजन और इसके 75 सदस्य थे जो कि अपने-अपने क्षेत्रों से चुने गए थे।
संविधान सभा की पहली बैठक 31 अक्टूबर 1951 को हुई थी। जम्मू एवं कश्मीर के संविधान को बनने में कुल 5 वर्ष का समय लगा। 17 नवम्बर, 1957 को जम्मू एवं कश्मीर का संविधान अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी, 1957 को प्रभाव में आया था। 2002 तक, संविधान में 29 संशोधन किए गए। 2002 तक संविधान में 158 अनुच्छेद थे जो 13 भागों और 7 अनुसूचियों में विभाजित थे।
संविधान को अपनाने के बाद, जम्मू और कश्मीर ने अगस्त 2019 तक इसके प्रावधानों के तहत कार्य किया, जब भारत सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को रद्द कर दिया, जिससे राज्य को पहले प्राप्त विशेष स्थिति और स्वायत्तता को प्रभावी ढंग से रद्द कर दिया गया और इसे पूरी तरह से एकीकृत कर दिया गया।
संविधान सभा का गठन
दरअसल महाराज हरिसिंह की 5 मार्च 1948 की उद्घोषणा के बाद 20 जून, 1949 को महाराजा द्वारा एक और घोषणा जारी की गई, जिसके द्वारा उन्होंने युवराज कर्णसिंह को अब तक प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियां प्रदान कर दी थीं और एक मई, 1951 को युवराज कर्णसिंह ने एक उद्घोषणा जारी की जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ निर्देश दिये थे कि जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए संविधान बनाने के प्रयोजनों के लिए वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने गए लोगों के प्रतिनिधियों से मिलकर एक संविधान सभा का गठन किया जाएगा और चुनाव में मतदान प्रत्यक्ष और (द्वारा) गुप्त मतपत्र से होगा।
संविधान सभा को उसकी सदस्यता में किसी भी रिक्ति के बावजूद कार्य करने की शक्ति होगी। यह भी निर्देश था कि संविधान सभा अपना स्वयं का एजेंडा तैयार करेगी और अपनी प्रक्रिया के संचालन और अपने व्यवसाय के संचालन के लिए नियम बनाएगी।
संविधान सभा का संयोजक 1951 में विधानसभा का गठन राज्य के लोगों की इच्छा का स्वाभाविक परिणाम था कि लोगों द्वारा चुनी गई विधायिका के प्रति उत्तरदायी एक लोकतांत्रिक सरकार हो।
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