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अलविदा 2020: पूरी दुनिया के लिए कई सबक छोड़ गया ये साल

Riyaz Khan रियाज खान
Updated Sat, 26 Dec 2020 12:18 PM IST
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most memorable moments of 2020 coronavirus covid 19
कैलेंडर के आखिरी लीफ को पलटने के साथ ही एहसास हुआ कि इस असाधारण वर्ष का अंत भी निकट आ ही गया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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अपनी तल्खियों के बावजूद, जाने वाला यह साल हम सभी को कुछ ऐसी यादों का तोहफा देकर जा रहा है जिसे आप हमेशा संभाल कर पास रखना चाहेंगे। इस महीने की पहली सुबह जब मेरी नजर अपनी मेज पर रखे टेबल-कैलेंडर को ठीक करते हुए लाल मोटे अक्षरों में लिखे ‘दिसंबर’ पर पड़ी तो सहसा गुलजार साहब की रचना ‘आने वाला पल जाने वाला है‘ स्मरण हो आई।

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कैलेंडर के आखिरी लीफ को पलटने के साथ ही एहसास हुआ कि इस असाधारण वर्ष का अंत भी निकट आ ही गया। इस बरस अति सूक्ष्म नोवेल कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को जैसे अपने गोल कंटीले शरीर में उलझा कर रख दिया है। किसी अति रोमांचक टी -20 मैच की अंतिम कुछ गेंदों की भांति, लॉकडाउन, सोशल डिस्टैन्सिंग, क्वारेंटीन, मास्क , सैनिटाइजर, टेस्टिंग, पी.पी.ई. किट, वेंटीलेटर और काढ़ा जैसे गंभीर शब्दों के इर्द-गिर्द, अब साल 20-20 के भी कुछ ही दिन शेष रह गए हैं।
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यह साल हमारे जीवन में जिस प्रकार की चुनौतियां तथा बदलाव लेकर आया है, एक वर्ष पूर्व उसकी कल्पना भी साधारण व्यक्ति के लिए लगभग नामुमकिन थी। आप और हम कई महीनों तक अपने घरों के गेट से बाहर नहीं निकले और हम में से बहुत सारे लोग अपने घरों के किसी अलग कमरे में हफ्तों क्वारेंटीन भी रहे।

लॉकडाउन की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही शहर की तमाम व्यस्त सड़कें वीरान बन गई थीं। भोर में पार्कों की ताजा हवा, हमेशा गुलजार रहने वाली बाजारें, पॉश इलाकों की दिलकश रौनकें, चाय की दुकानों का कभी न चुपने वाला शोर, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के आस-पास छात्रों की हर समय दिखने वाली चहल पहल - सब मानों पल भर में इतिहास बन गए थे।

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे व चर्च जैसी जगहों पर भी अकीदतमंदों का आना थम सा गया था। इसी साल ऋषि कपूर तथा इरफान खान जैसे न जाने हमारे कितने प्रिय हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गए। मुझे एक बुजुर्ग वकील मित्र के शव को कंधा न दे पाने का मलाल शायद जीवनभर रहेगा।

अभी भी, सुबह सडकों पर छोटे बच्चों के शोर से भरी स्कूल बसों की कमी शिद्दत से खलती है। इन सब तल्खियों ( कटुता ) के बावजूद यह साल हम सभी को कुछ न कुछ ऐसी अविस्मरणीय यादों का तोहफा देकर जा रहा होगा, जिन्हें सोचकर हम भविष्य में भी आनंदित होते रहेंगे। लॉकडाउन की घोषणा सुनते ही सिर्फ चार घंटों में महीने भर के सामान की फास्ट ट्रैक खरीदारी, घर की छतों को ही पार्क समझ वहीं पर प्रतिदिन कई किलोमीटर लंबी मॉर्निंग वॅाक, घर में किचन की तरफ कभी भूल से भी न जाने वाले लोगों का अचानक से मास्टर शेफ जैसा अवतरण, रोज शाम को मॉडल शॉप पर बिना नागा जाने वालों का महीनों तक घर पर बने जल-जीरा से ही संतोष, पड़ोस के घर से किसी की मात्र छींक पर ही उसे बिना बताए (एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए ) तुरंत 100 नंबर पर फोन, किसी मास्क पहने व्यक्ति को दूर से आता देख ( उसको पहचान लेने के बावजूद भी) अपना रास्ता बदल देना, ताली-थाली और टॉर्च जैसी घटनाएं हमेशा गुदगुदाती रहेंगी।

हम अन्य चीजों की तरह हफ्तेभर के संतरे भी साथ ही ले आते थे...

most memorable moments of 2020 coronavirus covid 19
लॉकडाउन में अधिकतर लोगों ने यह आदत बना ली थी कि जरूरी सामान लेने के लिए हफ्ते में सिर्फ एक बार ही घर से बाहर निकला जाए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

लॉकडाउन में अधिकतर लोगों ने यह आदत बना ली थी कि जरूरी सामान लेने के लिए हफ्ते में सिर्फ एक बार ही घर से बाहर निकला जाए। सभी कहते थे – ‘जान है तो जहान है’, इस बात को मैंने भी अपना मूल मंत्र बना लिया था। लॉकडाउन के दौरान, जब पहली बार सामान लेने के लिए बाजार गया तो एक सब्जी-  फरोश भाई की सफाई के प्रति जागरूकता देख कर मैं हैरान रह गया।

मुझे सब्जी का थैला पकड़ा कर उन्होंने मेरे द्वारा दिए गए पैसों को बोरी के नीचे जल्दी से दबाया और तराजू के नीचे ( छिपा कर) रखी हैंड सैनिटाइजर की शीशी बंदूक की तरह निकाल कर उससे तुरंत अपने हाथ सैनिटाइज किए। आरंभ में कोरोना का खौफ ऐसा रहा कि घर के बाहर से आने वाली किसी भी वस्तु की सफाई एक सनक की हद तक की जाती थी। जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो संतरों का सीजन था।

हम अन्य चीजों की तरह हफ्तेभर के संतरे भी साथ ही ले आते थे। घर में भी यह प्रोटोकॉल बना कि बहार से आए किसी भी सामान को पहले बरामदे में रख कर अच्छे से सैनिटाइज किया जाए। इस नियम के तहत प्रत्येक संतरे को भी छिलके सहित सैनिटाइज किया जाता था। बच्चों के लिए यह घंटों का टास्क हो जाता था। कई महीनों तक मेरे सफाई के इस खब्त को बर्दाश्त करने के लिए मैं अपने परिवार के सदस्यों का हमेशा कृतज्ञ रहूंगा।

संभवतः एक जिन को तो काबू में रखा जा सकता होगा, पर बच्चों को हर समय घर के भीतर रखना माता-पिता के लिए बड़ी चुनौती है। चरणबद्ध अनलॉक के होते ही मैंने इस चैलेंज से निपटने के लिए सबसे पहले तीन साइकिलें खरीदीं - एक अपने लिए और दो बच्चों की। रोज सुबह हम तीनों लंबी साइकिलिंग पर निकल जाते थे। बच्चों को कार में बैठाकर बाहर ले जाने की तुलना में उनके साथ साइकिलिंग के आनंद में हमने जमीन-आसमान का फर्क महसूस किया।

हम तीनों को एक साथ साइकिलिंग करते देख बहुत सारे अन्य लोगों ने भी इसे सराहा और अपनाया। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बच्चों के साथ साइकिलिंग इस वर्ष की सबसे खूबसूरत यादों में से एक रहेगी। कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है, इसलिए लोगों का सावधानी बरतना स्वाभाविक है। पर इसके चलते कुछ लोग इस हद तक मोहतात रहे कि आज तक अपने घरों से बाहर ही नहीं निकले। इसके विपरीत जो लोग अधिक सोशल हैं, उनका हर समय घर में बैठना मुश्किल था।

इस पर मुझे एक बहुत ही मजेदार किस्सा हमारे एक कहानीकार मित्र ने बताया कि उनका अपने बचपन के किसी दोस्त से लॉकडाउन के बाद मुलाकात करने को दिल चाहा, पर उनके उस दोस्त ने हर बार न मिलने का कुछ न कुछ बहाना बना दिया। अंततः बेतकल्लुफी के चलते वह अपनी कार ले कर अपने उस मित्र के घर के सामने जा पहुंचे और वहीं से उनको फोन करके बालकनी पर आने के लिए कहा।

जिस मित्र से रोज का मिलना रहा हो, उसे इतने दिनों बाद देखकर ( दूर से ही सही ) मेरे कहानीकार मित्र को खुशी तो हुई पर दोनों के बीच बातचीत दूर से मोबाइल पर ही हुई। चलते - चलते, मेरे मित्र मजाक में उनको यह कह कर वापस आ गए – “दोस्त ! मरने के लिए कोरोना का होना शर्त नहीं है।“ इन खट्टी - मीठी यादों के साथ इस दुश्वार साल 2020 को अलविदा और आप सभी को क्रिसमस तथा आगामी नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

(लेखक हैदराबाद स्थित एक आई.टी व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में  निदेशक व स्तंभकार हैं )

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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