स्मृति शेष आशा भोसले: शोख नजर की बिजलियां..!
आशा भोसले जैसे कलाकार शताब्दियों में एक बनते हैं, उनके गीतों की चर्चा तो हर समय कलाकारों के बीच, संगीत के शोधार्थियों और गायक गायिकाओं के मध्य, सोशल मीडिया के ढेरों प्लेटफार्मों पर होती ही रहेगी। प्ले लिस्ट ढूंढ़-ढूंढ़ कर सुनी ही जाएगी, मगर इस बात की तह तक कौन जाएगा कि ऐसी आवाज़ को सत्तर साल तक बरक़रार रखने की जद्दोजहद में आशा भोसले कितना तपी हैं? उन्होंने ऐसा क्या चख लिया था, जिस अमृत को हम सभी ख़ुद के लिए पाना चाहते हैं।
विस्तार
आशा भोसले के अवसान से हिन्दी फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा दौर समाप्त हो गया, जिसके सन्दर्भ में स्वयं आशा जी यह कहती थीं कि वे उस जनरेशन की आखिरी मुगल हैं। हजारों की संख्या में गाए फ़िल्म गीतों की एक बड़ी विरासत मौजूद है, जिसके चलते सिनेमा-संगीत का एक बड़ा युग हमेशा ही मार्गदर्शी बनकर आने वाले पाश्र्वगायक, गायिकाओं के लिए सुलभ रहेगा। वे सिर्फ़ लता मंगेशकर और आशा भोसले की संगीत की शैली के अध्ययन से यह सीख सकते हैं कि फ़िल्म संगीत के सीमित क्षेत्र में जहां तीन मिनट की धुन आधारित अदायगी में भी अपनी कोमलता बचाए रखनी होती है, उसे किस तरह इन दिग्गज पाश्र्वगायिकाओं ने अपने इनोवेशन, सुरीलेपन व सांसों पर एकाधिकार के साथ साधा हुआ था।
यह अचरज भरी बात है कि शुद्ध शास्त्रीयता और रागदारी के आंगन में विकसित होने वाला संगीत का मामला, सिनेमाई परिदृश्य पर अपना असर छोड़ते वक्त, कैसे सन्तुलित और संयमित व्याकरण में नायाब बन जाता है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण, लता जी के बाद निःसन्देह आशा भोसले ही थीं। उन्होंने उस व्याकरण को भी पूरी तरह स्वीकार न करते हुए, ख़ुद के नवाचार से एक अलग ही मार्ग का राही बनाया।
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मंगेशकर घराने से अलग, अपने पिता की नाट्य संगीत परम्परा का आनुवांशिक असर रखते हुए भी आशा जी ने फ़िल्म संगीत में वह काम किया, जिसे पारम्परिक कतई नहीं कहा जा सकता। एक तरह से वह पिछली सदी में पाश्र्वगायन की दुनिया में प्रयोगों से भरी हुई कलाकार थीं, जो एस.डी. बर्मन के लिए अलग-अलग रंगत में कभी बच्चों की शरारत जैसा गीत ‘रात अकेली है बुझ गये दिए’ (ज्वेल थीफ़) गाते हुए, दूसरे छोर पर ‘बन्दिनी’ के लिए उत्तर प्रदेश की प्रचलित कजरी की लोकधुन पर भाई-बहन के विरह का असाधारण करुणा का गीत ‘अबके बरस भेज भैया को बाबुल’ निभाती थीं।
इतना ही नहीं, ठेठ बनारसी अन्दाज़ में कहरवे के ठेके वाला मुजरा भी उन्होंने एस.डी. बर्मन के लिए ‘नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर’ (काला पानी) के लिए गाया।... और उन्मुक्तता की उड़ान देता हुआ दादा बर्मन के लिए ही ‘सुजाता’ का ‘काली घटा छाए मोरा जिया लहराए’.... ये थीं आशा भोसले, जिन्होंने अपने ही शिल्प का हर बार अतिक्रमण किया। हर बार पहले से अधिक चैकस, कुछ नया रचने की जिद में पड़ी हुई कोशिश...
दरअसल, आशा भोसले का अर्थ ही गायिकी में उस सैलाब का आमंत्रण है, जो शोखी और खिलन्दड़ेपन को एक साथ साधते हुए भी कहीं न कहीं अपनी तालीम को अन्तःसलिल करते हुए गीतों को अतिरिक्त खनक, कुछ अधिक उत्साह और पीड़ा के अवसर पर बेधक ढंग से दर्द की अनुभूति देता है। यह अपने में दिलचस्प बात है कि आशा जी को हमेशा चुलबुले और शोख गीतों के लिए याद किया गया, मगर ग़ौर करें, तो मालूम होगा कि उनके रंगपटल पर सर्वाधिक दर्द भरे नगमों की आजमाइश रही है।
याद कीजिए-
‘बैठे हैं रहगुजन पर दिल का दिया जलाए’ (चालीस दिन),
‘कोई शिकवा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं’ (नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे),
‘बेकसी हद से जब
गुजर जाए’ (कल्पना), ‘चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया’ (प्राण जाए पर वचन न जाए), ‘रोते-रोते नैना’ (घुंघरु की आवाज़), ‘और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं’ (सनी), ‘ये ही वो जगह है, ये ही वो फिजाएं’ (ये रात फिर न आएगी), ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ (आहिस्ता आहिस्ता), ‘ये क्या जगह है दोस्तो’ (उमराव जान) और ‘खाली हाथ शाम आई है’ (इजाज़त)... ये लिस्ट बढ़ती चली जाएगी, जब भी हम दर्दभरे गीतों को आशा भोसले की प्लेलिस्ट से चुनकर सुनना चाहेंगे।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह लगता है कि उनकी आवाज़ में जो एक बेस क्वालिटी थी, वह मन्द्र सप्तक पर उनसे सोज़ भरे गीतों को गवाने की एक बड़ी कैफ़ियत के रूप में उभरी। उसका असर यह रहा कि उनके गाए फ़िल्म गीतों में भी एक अलग तरह की शान्ति और उदात्तता का मामला उभर आया, जिससे उन गीतों का मेयार भी कुछ अलग ढंग से कर्णप्रिय बन सका।
उदाहरण के तौर पर जयदेव के संगीत निर्देशन में जयशंकर प्रसाद की रचना ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन’ और उन्हीं के द्वारा कम्पोज़ की गई अद्भुत ग़ज़ल ‘कभी शाख ओ सब्जा ओ बर्ग पर’ के अलावा गुलाम अली के साथ ‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ याद किए जा सकते हैं। कितनी प्रशान्त गायिकी और उसी क्षण उसमें से उठता हुआ पीड़ा का संयत भाव...
इसी के दूसरे छोर पर वसन्त प्रभु के संगीत निर्देशन में मराठी के ढेरों प्रभात गीतों को भी याद किया जा सकता है, जिसमें ‘उठि गोविन्दा उठि गोपाला’ को भला कौन भूल पायेगा?
आशा भोसले अपनी हरफनमौला गायिकी के लिए भी एक ऐसा माइलस्टोन बन चुकी हैं, जिनका कवर या काॅपी करना पूरी तरह से संगीत के व्याकरण में फिट नहीं बैठेगा। कारण यह कि उन्होंने अपने गायन को सिर्फ़ साधा या तराशा ही नहीं, बल्कि वैचारिक ढंग से आगे बढ़ाया। उस विचार को स्वायत्त किया, जहां एक ओर ओ.पी. नैय्यर का पंजाबी रिद्म पैटर्न पर ढला नाल और ढोलक वाला संगीत था, तो दूसरी ओर पंचम के साथ संगीत में गहराई का मामला, जिनकी स्वयं की नींव में उस्ताद अली अकबर ख़ां से सीखा हुआ सरोद और पण्डित सामता प्रसाद ‘गुदई महाराज’ की सोहबत शामिल थी। उन्होंने युवा दिनों में ब्रिजेन बिस्वास से तबले की बारिकियां भी सीखी थीं, जो बाद में आशा जी की संगति में भी उनके व्याकरण को मदद देने में काम आया। ताल और रिद्म को आत्मसात करने का एक प्रभावी अनुभवी।
आशा भोसले जैसे कलाकार शताब्दियों में एक बनते हैं, उनके गीतों की चर्चा तो हर समय कलाकारों के बीच, संगीत के शोधार्थियों और गायक गायिकाओं के मध्य, सोशल मीडिया के ढेरों प्लेटफार्मों पर होती ही रहेगी। प्ले लिस्ट ढूंढ़-ढूंढ़ कर सुनी ही जाएगी, मगर इस बात की तह तक कौन जाएगा कि ऐसी आवाज़ को सत्तर साल तक बरक़रार रखने की जद्दोजहद में आशा भोसले कितना तपी हैं? उन्होंने ऐसा क्या चख लिया था, जिस अमृत को हम सभी ख़ुद के लिए पाना चाहते हैं।
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