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बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: आखिर क्या है वामपंथियों की चुनावी स्थिति?
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सार
ज्योति बसु 21 जून 1977 से 5 नवंबर 2000 तक 23 साल से अधिक मुख्यमंत्री रहे। इनके मुख्यमंत्रित्व काल में हुए हर चुनाव में वाममोर्चा को दो सौ प्लस और सीपीएम को डेढ़ सौ प्लस सीटें आईं।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026।
- फोटो : Freepik
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विस्तार
1977 से 2011 तक 34 साल लगातार सत्ता में रहे वामपंथी दल अब लगातार संघर्ष कर रहे हैं। सत्ता से बेदखल होने के 10 साल बाद 2011 के विधानसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाए। अब विधानसभा चुनाव 2026 में अधिकांश नए व युवा चेहरों के सहारे चुनावी मैदान में हैं।
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वामपंथी दलों के साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह जानने के पहले जरा पीछे चलना लाजमी होगा कि यह शिखर से सिफर तक आखिर कैसे पहुंचे! सत्ता में जब यह 1977 में आये थे, वामपंथी दलों के चुनावी प्रदर्शन से स्वयं ज्योति बसु हतप्रभ थे।
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यह सुखद विस्मय था सीपीएम व वाममोर्चा के लिए। होता भी क्यों नहीं! वाममोर्चा को 294 सदस्यीय विधानसभा में 231 सीटें और बड़े भाई की भूमिका निभा रहे सीपीएम को 178 सीटें आईं थीं। सीपीएम को ही बहुमत से 30 सीटें अधिक थी।
ज्योति बसु 21 जून 1977 से 5 नवंबर 2000 तक 23 साल से अधिक मुख्यमंत्री रहे। इनके मुख्यमंत्रित्व काल में हुए हर चुनाव में वाममोर्चा को दो सौ प्लस और सीपीएम को डेढ़ सौ प्लस सीटें आईं। यानी सीपीएम अपने बलबूते बहुमत में आती थी, लेकिन गठबंधन धर्म को ज्योति बसु ने बखूबी निभाया। वाममोर्चा में शरीक सभी वामपंथी दलों को उचित प्रतिनिधित्व व सम्मान दिए।
सत्ता में आने के बाद 1982 के दूसरे विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा को 209 और सीपीएम को 174 सीटें आईं। तीसरे विधानसभा चुनाव 1987 में वाममोर्चा को 212 और सीपीएम को 187 सीटें, चौथे विधानसभा चुनाव 1991 में वाममोर्चा को 204 सीटें और सीपीएम को 182 सीटें और पांचवें विधानसभा चुनाव में 1996 में वाममोर्चा को 213 और सीपीएम को 153 सीटें आईं थीं।
ज्योति बसु अपनी उम्र जनित अस्वस्थता को देखते हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य को 12 जनवरी 1999 को उप-मुख्यमंत्री बनाये जो कि इस पद पर 5 नवंबर 2000 तक रहे। मुख्यमंत्री ज्योति बसु के इस्तीफा देने के बाद 6 नवंबर 2000 को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इस पद पर 20 मई 2011 तक रहे। बुद्धदेव भट्टाचार्य के कार्यकाल में तीन विधानसभा चुनाव हुए।
बुद्धदेव भट्टाचार्य के पहले विधानसभा चुनाव 2001 में वाममोर्चा को 211 और सीपीएम को 143 सीटें आईं। पहली बार सीपीएम को बहुमत से पांच सीटें कम थीं। टीएमसी 60 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनी। दूसरे विधानसभा चुनाव 2006 में वाममोर्चा को 235 सीटें और सीपीएम को 176 सीटें आईं। तीसरे विधानसभा चुनाव 2011 में वाममोर्चा को महज 62 सीटें और सीपीएम को 40 सीटें आईं।
टीएमसी 184 सीटें जीतकर 2011 में सत्ता में आई और इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य शारीरिक अस्वस्थता के चलते सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। बुद्धदेव भट्टाचार्य के बाद डॉ सूर्यकांत मिश्रा ने कमान संभाला और 2016 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम को मात्र 26 सीटें आईं। दूसरी तरफ टीएमसी को दो सौ प्लस यानी 211 सीटें आईं।
सीपीएम अपने 187 सर्वाधिक सीट से 26 पर आ गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा का ही खाता नहीं खुला। टीएमसी दूसरी बार दो सौ प्लस यानी 215 सीटें जीती।
34 साल सत्ता में रहने के बाद वामपंथी दलों के साथ ऐसा क्यों और क्या हुआ कि शिखर से सिफर तक पहुंच गए! भ्रष्टाचार का ऐसा कोई गंभीर आरोप न ही सरकार या किसी मंत्री या विधायक पर लगा! 2011 में जब टीएमसी ने 34 साल के अजेय शासन को उखाड़ फेंका था, तब भी सीपीएम के पास अपना 40 फीसदी वोट बैंक सुरक्षित था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि महज एक दशक में यह मजबूत किला ताश के पत्तों की तरह ढह गया और वोट 5 फीसदी रह गया।
दरअसल, सत्ता की आदत, कैडरों का बीजेपी की ओर पलायन और युवा नेतृत्व की अनदेखी ने लाल झंडे को हाशिए पर धकेल दिया। फिर, जब वाममोर्चा ने उद्योगों को फिर से स्थापित करने की पहल की, तो सिंगूर और नंदीग्राम जैसी घटनाओं के कारण हालात बिगड़ गए और जो जनमत तैयार हुआ, वह पार्टी के ही खिलाफ चला गया।
जो लोग पहले से ही सीपीएम से ऊब चुके थे, वे उसके विरोध में सड़कों पर उतर आए। इसका फायदा ममता बनर्जी की टीएमसी ने उठाया और सत्ता हासिल कर ली।
दूसरी तरफ वामपंथी वोटों के गायब होने से जो राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ, उसे वामपंथियों की तरह दूसरी कैडर वाली पार्टी बीजेपी ने भर दिया।
जबकि बीजेपी वैचारिक रूप से वामपंथियों के बिल्कुल विपरीत है और बंगाल में एक नई और मजबूत ताकत है। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर वामपंथी वोटरों ने अपनी विपरीत विचारधारा की ओर झुकाव कैसे बढ़ा लिया? क्या सिर्फ इसलिये की वो राज्य में ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ अपनी सत्ता-विरोधी भावना जाहिर कर सकें!
एक मजबूत वामपंथी दल की गैर-मौजूदगी और बहुत कमजोर हो चुकी कांग्रेस के चलते, बीजेपी को अपने बिल्कुल विपरीत लाल खेमे में एक अप्रत्याशित सहयोगी मिल गया।
सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर तृणमूल कांग्रेस से लड़ने में बीजेपी की भरपूर मदद की। इस सांगठनिक समर्थन की बदौलत बीजेपी, टीएमसी-विरोधी और वामपंथी-समर्थक वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी झोली में डालने में पूरी तरह कामयाब रही।
बीजेपी 2021 के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक रूप से 77 सीटें जीतने में कामयाब रही। इसके चलते दो अन्य विपक्षी दल कांग्रेस और सीपीएम पूरी तरह से हाशिए पर चले गए और 2021 की विधानसभा चुनाव में उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी सीपीएम सहित वामपंथी दलों का खाता नहीं खुला।
बहरहाल, जनता से टूटी डोर और युवाओं के पलायन के बाद इस दफे काफी संख्या में युवाओं को मौका दिया गया है। दूसरी तरफ युवा नेता प्रतीकुर रहमान ने सीपीएम छोड़कर टीएमसी का झंडा थाम लिया है। उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत करते हुए पार्टी की स्टूडेंट विंग एसएफआई के प्रदेश अध्यक्ष और अखिल भारतीय उपाध्यक्ष का पद संभाला।
इसके बाद पार्टी की प्रदेश समिति के सदस्य के तौर पर आगे बढ़े। 2024 के लोकसभा चुनाव में डायमंडहार्बर सीट से अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा, अब पूरे राज्य में घूम घूमकर टीएमसी का चुनावी प्रचार कर रहे हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।