एनआरसी सही है या गलत, पता नहीं, पर मैं अपनी बच्ची से 10 दिन से मिल नहीं पाई हूं..!
एक हैं शालिनी। आप कुछ और भी कह सकते हैं। क्योंकि यहां नाम का महत्व नहीं है। महत्व उस दर्द, पीड़ा और मानसिक यंत्रणा का है जो देश में चल रहे एनआरसी के हो-हल्ले में किसी के भी कानों तक पहुंच नहीं पा रही।
तो शालिनी मूलत: गोरखपुर की रहने वाली हैं। पर दिल्ली में ही पली-बढ़ी। अभावों और संघर्षों में गुजरे बचपन ने उम्र पहले ही पका दी। उसकी दुनिया में बड़ी इमारतें और ऊंचे मकान इसलिए होते हैं क्योंकि उनमें ईंटे रखकर सीमेंट से जोड़ने पर शालिनी जैसों के घर में भी चार पैसे जुड़ जाते हैं। सितोलिया, गिल्ली-डंडा और छुपा-छाई के साथ ही रोटी बेलना, बर्तन-कपड़े और ललचाई निगाहों से बचते हुए मजुरी करना भी कब सीख जाते हैं पता ही नहीं चलता।
बाबुल के आंगन में खेलती, मचलती और बड़ी होती बच्ची कब बहुत बड़ी होकर पराई होने को तैयार हो जाए, पता नहीं चलता। शालिनी भी हो गई। तमाम कहे-सुने-लिखे के बाद भी पीहर तो पीहर ही होता है। वहां के गोबर लीपे आंगन में दुनिया का सबसे महंगा इत्र महकता है। तमाम दुश्वारियां भी मीठी लगती हैं। उस घर आंगन को छोड़ जब शालिनी ने नवजीवन में प्रवेश किया तो उसने भी हसीन सपने सजाए। जिन ईंटों को जोड़कर पैसे कमाती थी उन्हें ही जोड़कर अपना घर बसाने के सपने।
अच्छा है कि ख्वाब बुनने पर अभी तक तो कोई प्रत्यक्ष कर है नहीं। उसका जीवन ठीक ही चल रहा था। एक बेटी हुई, फिर एक बेटा। सुंदर सजीला संसार। बचपन में दूर दिखने वाला चांद बहुत करीब नज़र आने लगा। इसी चांद को छूने के लिए जब ऐडी उठाई तो नीचे से ज़मीन खिसक गई। जैसे कोई कहा रहा हो - तुमने हिम्मत कैसे की चांद को छूने की? वक्त ऐसे फिसला जैसे मुट्ठी से रेत!
पति का साथ क्या छूटा, शालिनी की तो दुनिया ही बदल गई। दोनों ही बच्चों की ज़िम्मेदारी उस पर आन पड़ी। मुश्किल वक्त में उसे ईंटों की जुड़ाई याद आ गई। उसने अपनी हिम्मत जोड़ी और अपने पैरों पर खड़े होने की ठान ली।
आप सोच रहे होंगे कि कहानी तो अच्छी लग रही है पर इसका एनआरसी से क्या लेना-देना?
तो सुनिए- अपना परिवार चलाने के लिए शालिनी कैब ड्राइवर बन गई। सुबह 9 से रात 9 बजे तक 12 घंटे कैब चलाती है। इसी कमाई से वो घर और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलाती है। 11 साल के बेटे को पढ़ने के लिए दिल्ली से बाहर भेज दिया है। 16 साल की बेटी उसी के साथ रहती है। वो अपनी बेटी से पिछले दस दिनों से नहीं मिल पाई है। केवल फोन और वीडियो कॉल से काम चल रहा है। उसके खाने-पीने के लिए आस-पड़ोस की मदद लेनी पड़ रही है। बच्ची भी 10 दिनों से स्कूल नहीं गई है। क्यों? क्योंकि शालिनी दिल्ली की पास उस गांव में रहती है जिसका रास्ता कालिंदी कुंज और शाहीन बाग से होते हुए जाता है।
पिछले जुम्मे को नागरिकता कानून को लेकर हुए बवाल के बाद से शाहीन बाग और आसपास के इलाके में लगातार धरना-प्रदर्शन चल रहा है। वहां से कालिंदी कुंज, सरिता विहार और अन्य सटे हुए इलाकों का आवागमन अवरुध्द हो गया है। शालिनी का कहना है कि उसने घर जाने की कोशिश की भी तो 5 घंटे लग गए। रात 3 बजे घर पहुंची और सुबह 7 बजे निकलना था। ऐसे में उसकी रोजी कैसे चलेगी? बच्ची स्कूल नहीं जा पा रही है। तमाम लोग अपनी गाड़ियां बाहर ही छोड़कर 1-2 घंटे पैदल चलकर घर जा रहे हैं और आ रहे हैं। जीवन नर्क हो चुका है। और लोगों को धरने से फुर्सत नहीं!
वो कहती हैं- अरे ये कानून सही है या गलत, ये मुझे नहीं पता पर मैं अपनी बेटी सी नहीं मिल पा रही हूं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
आप बताइए कि शालिनी के इस सवाल का क्या जवाब देंगे? और शालिनी की ही तरह यातना भोगने वाली जो सैकड़ों कहानियां अनसुनी ही रह गईं, उनकी सुनवाई दुनिया की किस अदालत में होगी?