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रूस और भारत: यादों में बसे सोवियत की गंध और बारूद के धमाकों में अंतर्द्वंद की दास्तान

Jaideep Karnik जयदीप कर्णिक
Updated Tue, 01 Mar 2022 07:29 PM IST
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सार

एक ऐसे दौर में जबकि दुनिया एक बार फिर से तीसरे महायुद्ध के मुहाने पर बैठी है, यह लेख भारत-रूस के प्रगाढ़ अंतरसंबंधों की यात्रा को मुड़कर देखता है और वर्तमान में युद्ध की अनिश्चित, असंभावित और विकृत व दुष्चक्र से भरी मानसिकता को भी कटघरे में खड़ा करता है-

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रूस और यूक्रेन का युद्ध भारत में इतना अहम बना हुआ है। यही वजह है कि देश के सबसे बड़े सूबे के चुनाव को लेकर उतनी खबरें नहीं पढ़ी जा रही जितनी रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

दृश्य एक : कथा सागर

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साल 1986। दूरदर्शन पर रात को प्रसारित धारावाहिक “कथा सागर”। विश्व साहित्य से ली गई चुनिंदा कहानियां। इन कहानियों को पर्दे पर उतारने के लिए मेहनत की श्याम बेनेगल, कुन्दन शाह, वेद राही और सत्येन बोस जैसे प्रख्यात निर्देशकों ने। किरदार निभाए थे अशोक कुमार, सत्येन कप्पू, राजेन्द्र गुप्ता, किट्टू गिडवानी, नीना गुप्ता और सुप्रिया पाठक जैसे बेहतरीन कलाकारों ने।  

कथा सागर की इन्हीं लहरों में डूबते-उतरते हम लियो टोल्स्टोय, एंतन चेखव और निकोलाई गोगूल जैसे रूसी साहित्यकारों से परिचित हुए। रूसी साहित्य का चस्का लगा। चाहे टोल्स्टोय की ‘Where Love is God is’ हो जिसे ‘ ‘प्रतीक्षा’ नाम से फिल्माया गया या फिर चेखव की वार्ड नंबर 6, जीवन का संदेश देती छोटी कहानियाँ।  

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दृश्य दो: पुस्तक मेले  

1985 से 1989 के बीच देश के अलग-अलग शहरों में लगने वाले रूसी पुस्तक मेले। उनमें मिलने वाली बहुत उपयोगी पुस्तकें जो बहुत सस्ती भी होती थीं। ये मेले सार्वजनिक स्थलों के साथ ही स्कूलों में भी लगते थे। गणित, विज्ञान और अन्य विषयों की पुस्तकें। साथ ही मिलने वाला रूसी साहित्य, जो हाथ लगे तो फिर छूटे नहीं।  

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लिओ टॉल्सटॉय: ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका की आंधी में बिखरे सोवियत संघ ने दुनिया में और भी बहुत कुछ बिखेर दिया। शीत युद्ध तो खत्म हुआ पर बर्फ फिर भी पिघली नहीं।   - फोटो : अमर उजाला

दृश्य तीन: वो सुंदर पत्रिकाएं 

सोवियत भूमि और सोवियत नारी। चिकने पन्नों पर सुंदर तस्वीरों से सजी दो ऐसी पत्रिकाएं जो कई घरों का हिस्सा थीं। ये पत्रिकाएं सामान्य से कुछ बड़े आकार की थीं। सोवियत भूमि में वहां के कला संस्कृति को लेकर लेख होते थे और सुंदर बड़े चित्र। सोवियत नारी महिलाओं पर केन्द्रित पत्रिका थी।  

पिताजी ने ये पत्रिकाएं घर पर नियमित मंगवानी शुरू कर दी थीं। मुझे इन पत्रिकाओं का खास तौर पर इंतजार रहता था। पढ़ने के लिए भी और एक समय के बाद इनके पन्ने कॉपी-किताबों के कवर के रूप में बहुत उपयोगी साबित होते थे।


दृश्य 4: 1971  

बाद की पीढ़ी के लिए भी ये मजबूत याद है। मुसीबत में मिली मदद कोई नहीं भूलता। पूर्वी पाकिस्तान के रूप में अलग कर दिए गए भारत के अंग में हुई जंग को भला कौन भुला सकता है? सोचिए आज की स्थिति में पूर्वी पाकिस्तान होता तो भारत के लिए कितना मुश्किल होता इस परिस्थिति से निपटना! जब हम इस नासूर का इलाज कर रहे थे, अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के इशारे पर अपने नौसेना के जहाज बंगाल की खाड़ी की तरफ रवाना कर चुका था। सोवियत रूस ने ऐसे में दो टूक कह दिया था कि अगर अमेरिकी बेड़े ने किसी भी तरह की हिमाकत की तो उन्हें हिन्द महासागर में ही डुबो दिया जाएगा।  

दृश्य 5: 1991  

एक हसीन सपना जो टूट गया। सोवियत संघ का सपना। भारत में बहुतों को इस बिखराव की किरचन आज तक चुभती है। साम्यवाद के तिलिस्म का टूटना एक अलग मुद्दा है। ‘सब एक जैसे हैं और उन्हें एक ही तरह से जीना चाहिए’ ये सिद्धान्त कितना सही और गलत है ये अलग बहस का मुद्दा है। पर ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका की आंधी में बिखरे सोवियत संघ ने दुनिया में और भी बहुत कुछ बिखेर दिया। शीत युद्ध तो खत्म हुआ पर बर्फ फिर भी पिघली नहीं।  

दरअसल, इन पांच दृश्यों के अलावा भी कई सारे दृश्य हैं, कई सारी परतें, कई मुद्दे और बहुत सारे किन्तु परंतु। बहुत से सफहे हैं जो तर्क और भावनाओं की लड़ाई को दर्ज किए हुए हैं।  

फिर भी जो लोग इन दृश्यों के साथ बड़े हुए हैं या इनसे वाकिफ हैं या उनके अवचेतन में इसके अंश चस्पा हैं, वो इस समय भयानक अंतर्द्वंद से गुजर रहे हैं। हमारे मुसीबत के दोस्त रूस को लेकर भावुक बने रहें या फिर अपनी जिद से यूक्रेन पर सैन्य कार्रवाई कर रहे पुतिन से चिढ़ जाएं, कभी यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की तस्वीरें लुभाती हैं तो कभी उनका वतन पर मर मिटाने का जज़्बा।  

यही वजह है कि रूस और यूक्रेन का युद्ध भारत में इतना अहम बना हुआ है। यही वजह है कि देश के सबसे बड़े सूबे के चुनाव को लेकर उतनी खबरें नहीं पढ़ी जा रही जितनी रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर। छात्र फंसे हैं। भारत के हित भी दांव पर हैं, ये सब अपनी जगह पर तार भी जुड़े हैं। एक हूक है, जो खींचती है।  

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रूस-यूक्रेन युद्ध: दुनिया तो लड़ने के नए बहाने ढूंढ लेगी। हम किस तरफ होंगे ये भी बड़ा सवाल नहीं है। बड़ा सवाल ये है कि मूल्यों की रक्षा कौन करेगा? - फोटो : रायटर्स

ये सारे मामले उतने स्याह और सफ़ेद हैं भी नहीं जितने दिखते हैं। एक बड़ा पेंच ये भी फंसा है कि इस दफे चीन भी रूस के साथ खड़ा है और पाकिस्तान भी। यानी 1971 के के समय जो परिस्थितियां थीं, ठीक उसके उलट। तब पाकिस्तान अमेरिका की गोद में बैठा था। रूस के भारत के पक्ष में आने पर चीन भी ऐंठ गया था। अमेरिका के उकसावे पर उसने भारत पर हमले का मन भी बना लिया था पर ठिठक गया। मतलब अमेरिका, चीन और पाकिस्तान एक तरफ थे और भारत और रूस एक तरफ।  
 

देखिए दुनिया कितनी तेजी से बदल गईं। आज तात्कालिक तौर पर ही सही रूस चीन और पाकिस्तान एक दिखाई देते हैं, सबके अपने स्वार्थ हैं। भारत ने कूटनीतिक स्तर पर बहुत सही निर्णय लेते हुए रूस का साथ दिया है। यूक्रेन ने कभी कूटनीतिक स्तर पर भारत का साथ नहीं दिया। पर भारत युद्ध के भी खिलाफ है। एक सत्य ये भी है कि पश्चिमी देशों ने पुतिन को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आग लगाकर तमाशा देखना इनकी फितरत है। पर इस आग से इनके दामन भी जलते हैं इस बात को ये हर बार भूल जाते हैं। आखिर रूस के खिलाफ खड़े किए ओसामा ने ही इनके गाल पर जोरदार तमाचा मारा था।  
 

तर्कों और भावनाओं के आलोड़न में सबसे आवश्यक है मूल्यों की रक्षा। दुनिया तो लड़ने के नए बहाने ढूंढ लेगी। हम किस तरफ होंगे ये भी बड़ा सवाल नहीं है। बड़ा सवाल ये है कि मूल्यों की रक्षा कौन करेगा? युद्ध के आते ही मानवता और सिद्धांतों के प्रश्न बड़े हो जाते हैं और युद्ध के जाते ही फिर से छोटे।

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रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत के लिए बेलारूस की सीमा पर सज गयी है मेज - फोटो : Agency

बहरहाल, दो महत्वपूर्ण तथ्य जिसकी वजह से इस मामले में रूस की स्थिति बदल गई-  पहला है युद्ध का स्वरूप। ये युद्ध दो देशों की सीमाओं पर आमने सामने नहीं लड़ा जा रहा है। ये युद्ध शहरों में, गली मोहल्लों में, मिसाइलों से और वेक्यूम बमों से लड़ा जा रहा है। जब सैनिक-सैनिक से लड़ता है तो बात अलग होती है। हालांकि सैनिक भी इंसान हैं और उनका मारा जाना भी दुःखद है, बुरा है। पर जब आम नागरिक मारे जाते हैं, रिहायशी इमारतें ध्वस्त होती हैं तो फिर नज़रिया ही बादल जाता है।  

दूसरा तथ्य ये है कि इस युद्ध में रूस इमारतों को गिरा देगा पर यूक्रेन के लोगों ने जिस राष्ट्रवाद के साथ रूस का प्रतिकार किया है उसका क्या होगा? युद्ध जीत लेने के बाद भी पुतिन हारे हुए ही नज़र आएंगे, अगर जनसमर्थन उनके साथ ना हो।  

युद्ध है। बम-बारूद है। मौतें हैं। क्या सैनिक क्या नागरिक। इच्छाएं हैं, महत्वाकांक्षाएं हैं, घमंड है, स्वार्थ है। जीत है हार है। .... और इस सबके बीच उठती हुई वो सोवियत हूक है जो जमाने से भीतर धंसी हुई है।  

इस हूक के बीच हम सबको वही पक्ष लेना होगा जो इस संसार को पहले से बेहतर कर पाए। दुर्भाग्य कहें या विडंबना कि कई बार ऐसा कोई पक्ष ही नज़र नहीं आता। तब तक धमाकों के बीच हूक को सुनते हुए प्रार्थना के स्वर ऊंचे रखने होंगे।  

रूस और भारत: यादों में बसे सोवियत की गंध और बारूद के धमाकों में अंतर्द्वंद की दास्तान
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