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बड़ा सवाल: सोनम वांगचुक का आंदोलन कितना जायज, क्या निकलेगा इसका नतीजा?

Sat, 18 Jul 2026 02:33 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sat, 18 Jul 2026 02:33 PM IST
सार

सोनम वांगचुक को शनिवार तड़के पुलिस जबरन उठा ले गई और उनकी बिगड़ती हालत के मद्देनजर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। फिलहाल इस आंदोलन के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है और सोनम वांगचुक द्वारा 20 जुलाई का प्रस्तावित मार्च भी खटाई में पड़ गया है।

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sonam wangchuk news How justified is the movement cockroach janata party
20 दिन से अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को पुलिस ले गई अस्पताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जैसी की संभावना थी, वही हुआ। दिल्ली के जंतर -मंतर पर 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट), सोनम वांगचुक को शनिवार तड़के पुलिस जबरन उठा ले गई और उनकी बिगड़ती हालत के मद्देनजर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। पुलिस ने वहां जुटे प्रदर्शनकारियों को भी चलता किया।

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हालांकि सोनम की जगह काॅकरोच जनता पार्टी के संयोजक अभिजीत दिपके अब अनशन पर बैठ गए हैं, लेकिन फिलहाल इस आंदोलन के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है और सोनम वांगचुक द्वारा 20 जुलाई का प्रस्तावित मार्च भी खटाई में पड़ गया है।
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लद्दाख के मूल निवासी सोनम की सरकार से यूं तो कई मांगें हैं, लेकिन मुख्य रूप से वो नीट परीक्षा में घोटाले के लिए केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा और प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में सुधार प्रमुख हैं। सोनम के ताजा आंदोलन के औचित्य, टाइमिंग, उसके सामाजिक राजनीतिक असर और सरकार के रवैये को लेकर मोटे तौर पर दो अलग-अलग राय हैं। 
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  • पहले वर्ग का मानना है कि सरकार को निष्ठुरता और बेरूखी दिखाने के बजाए सोनम की मांगों पर संवेदनशीलता से विचार और संवाद करना चाहिए। क्योंकि सोनम जो कर रहे हैं, वो विरोध का गांधीवादी तरीका है और लोकतंत्र में इसका समुचित सम्मान होना चाहिए।
  • दूसरे वर्ग का मानना है कि सोनम की मांगें ऐसी नहीं हैं कि जिसकी खातिर वो अपनी जान की बाजी लगा दें। उनकी मांग मुख्य तौर पर व्यवस्था सुधार से जुड़ी हैं, उसे मनवाने और सरकार पर समुचित दबाव बनाने के लिए अनशन की जगह सड़कों पर संगठित आंदोलन ज्यादा कारगर होता।


वैसे भी वर्तमान सरकार ऐसे आंदोलनों के दबाव में नहीं आती। लिहाजा आमरण अनशन से निजी शोहरत और सहानुभूति तो मिल सकती है, जमीनी लाभ नैतिक समर्थन से ज्यादा कुछ नहीं मिलता। व्यावहारिक दृष्टि से भी सोनम के आंदोलन के पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक पेंच हैं। 

कुछ सियासी पार्टियों ने सोनम का अब तक जबानी समर्थन किया है, तो कांग्रेस जैसी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी शुरू से ही इसे संदेह की नजर से देखते हुए आंदोलन से दूरी बनाए हुए है। और तो और जिन युवाओं की खातिर सोनम आमरण अनशन कर रहे हैं, उनकी रुचि भी इस आंदोलन में ज्यादा नहीं दिखती। यानी परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर उनके मन में भी रोष तो है, लेकिन वह इतना भी नहीं है कि वो अपनी वर्च्युअल दुनिया छोड़कर वास्तविक दुनिया में कफन बांध कर उतर आएं।

सोनम के साथ मैदानी तौर पर वो सीजेपी है, जिसका खुद का वजूद भी वर्च्युअल ही ज्यादा है। जबकि तमाम एआई और डिजीटल प्रगति के बावजूद हकीकत में जन आंदोलन सड़कों पर ही करने पड़ते हैं। उसमे भी निरंतरता चाहिए न कि जेन जी तरह एक टेम्प्रेरी इंवेट का क्रेज। 

वैसे भी आंदोलनों के मामले से निपटने का मोदी सरकार का तरीका पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में काफी भिन्न है, जिस पर बहस की गुंजाइश हमेशा रही है। मसलन सरकार ने अगर किसी आंदोलन को ढील दी हो या अचानक अपने कदम पीछे खींच लिए हो, तो जो आगे होता है, वह राजनीतिक लाभ-हानि के तहत ही होता है। और इतनी सफाई और बेरहमी से होता है कि उन आंदोलनो का अपेक्षित चुनावी लाभ विपक्षी पार्टियों को नहीं मिल पाता।

बावजूद तमाम नैतिक समर्थन, सहानुभूति और संवेदनशीलता के आग्रह के, सोनम वांगचुक का आंदोलन भी उसी दिशा में जाता दिख रहा है। इसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट और डाॅक्टरों ने भी भूख हड़ताल पर बैठे सोनम की गिरती सेहत को लेकर गहरी चिंता जताते हुए उनका ध्यान रखने की हिदायत दी थी। शनिवार सुबह हुई पुलिस कार्रवाई में भी इसी को आधार बनाया गया।

पुलिस कर्मी सादे कपड़ों में पहुंचे और सोनम को उठा ले गए। हालांकि सीजेपी नेता अभिजीत दिपके ने पुलिस पर आंदोलनकारियों पर लाठी चार्ज करने का आरोप लगाया। इस कार्रवाई के एक दिन पहले ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को भी बदल दिया गया था। गौरतलब है कि जंतर मंतर पर इस आंदोलन की शुरुआत अभिजीत दिपके ने की थी और सोनम वांगचुक इसमें 28 जून को शामिल हुए थे। 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर

कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित सोनम वांगचुक के आंदोलन में शामिल होने के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खी मिलने लगी। अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि लाखों भारतीय छात्रों के लिए न्याय की मांग कर रहे युवाओं के आंदोलन को वांगचुक की भूख हड़ताल से नई गति मिली है।

इसी अखबार को दिए इंटरव्यू में सोनम ने कहा कि  सीजेपी का आंदोलन उस संघर्ष से जुड़ा हुआ है, जिसे मैंने अपनी युवावस्था में शुरू किया था। यह भी उल्लेखनीय है कि ‘आमरण अनशन के दौरान सोनम का वजन साढ़े 9 किलो तक कम हो गया है। लिहाजा कई नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओंऔर कलाकारों ने सोनम से अनशन समाप्त करने की अपील भी की। 

आंदोलन को लेकर कई सवाल

जहां तक सोनम के वर्तमान आंदोलन की बात है तो उसको लेकर कई सवाल हैं। पहला तो यह कि सोनम केन्द्रीय शिक्षा मंत्री से जो इस्तीफा मांग रहे हैं, वह राजनीतिक मांग है। सो सरकार शायद ही माने। उनकी प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक बंद करने और व्यवस्थाओं को पुख्ता बनाने की मांग जायज है, लेकिन जिस ‘नीट’ यूजी  के संदर्भ में वो ये मांग कर रहे हैं, उसकी तो पुनर्परीक्षा भी हो गई तथा रिजल्ट भी घोषित हो गया।

रीएग्जाम में व्यवस्थाएं पुख्ता रहीं और नतीजों को सभी ने स्वीकार किया। साथ ही सीबीएसई बोर्ड परीक्षा में ऑन लाइन मार्किंग को लेकर हुआ विवाद भी हल हो गया है। ऐसे में दूसरी मांग का महत्व केवल सैद्धांतिक ही रह जाता है।

इसी तरह देश में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं जैसे स्थायी मुद्दे हैं, लेकिन उनको लेकर भी कोई बड़ा आंदोलन (किसान आंदोलन छोड़ दें) तो अन्ना आंदोलन के बाद बीते डेढ़ दशक में खड़ा नहीं हो सका है। 

दूसरे, पेपर लीक मामले के भुक्त भोगी युवा भी अगर सोनम के आंदोलन से ज्यादा नहीं जुड़ रहे तो इस आंदोलन के औचित्य पर उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए। वैसे भी आज के जमाने में किसी भी मुद्दे पर युवाओं को सड़कों तक खींच लाना शिव धनुष उठाने जैसी चुनौती है। क्योंकि युवाओं की समस्याएं भले ही जायज और पुरानी हो, लेकिन विचार और एप्रोच की दृष्टि बहुत एकाकी और आत्मकेन्द्रित है।

सत्ता  और व्यवस्था परिवर्तन जैसे बड़े उद्देश्यों के लिए व्यापक आंदोलन की खातिर समुचित भीड़ जुटाना अब टेढ़ी खीर है, खासकर उस पीढ़ी से जो आपसी संवाद, प्रेम और नफरत भी व्हाट्सएप मैसेजों और सोशल मीडिया के जरिए करती हो। विपक्षी पार्टियों ने भी सोनम के आंदोलन को जबानी समर्थन इस सावधानी के साथ दिया कि कहीं इसका श्रेय सोनम अकेले न ले जाएं। बहुत से बुद्धिजीवियों में सोनम के आंदोलन को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदना थी।

एक पत्रकार ने इस मुद्दे पर आम लोगों की निर्लिप्तता पर क्षुब्ध होकर लिखा कि आज की पीढ़ी को ‘सोनम रघुवंशी चाहिए, सोनम वांगचुक नहीं।‘ यह अपने आप में प्रतीकात्मक बात थी। अलबत्ता सोनम के समर्थन में कुछ मशहूर हस्तियों की सोशल मीडिया पोस्ट देखने को मिलीं, जिससे कुछ खास बनना बिगड़ना नहीं था। 

‘आंदोलनजीवी’ सोनम

शायद सरकार को भी इस आंदोलन की गहराई का पूरा अंदाजा था, इसलिए उसने शुरू में उसे अनदेखा किया और पानी सिर से गुजरते ही सोनम को अस्पताल पहुंचा दिया। अब आगे इस आंदोलन को फिर से जिंदा करना आसान नहीं है। संभव है कि सरकार की नजर में ‘आंदोलनजीवी’ सोनम फिर कोई नया मुद्दा लेकर फिर अनशन पर बैठ जाएं। इसी संदर्भ में एक अहम बात अभिनेता आमिर खान का स्पष्टीकरण है।

आमिर ने सोनम के आंदोलन का समर्थन तो किया, साथ में यह भी कहा कि उनकी हिट फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का चर्चित पात्र ‘रेंचो’ (फुनसुख वांगडू) सोनम वांगचुक से प्रेरित नहीं था। अभी तक यही माना जाता रहा है कि उस चरित्र के पीछे प्रेरणा सोनम वांगचुक थे। आमिर ने यह सफाई अभी क्यों दी, यह भी बड़ा सवाल है। 

वैसे सोनम पहले भी आमरण अनशन करते रहे हैं। इस मामले में उनकी तुलना महाराष्ट्र के मनोज जरांगे से की जा सकती है, जो हर दो-चार महीने में मराठा आरक्षण को लेकर आमरण अनशन शुरू कर देते हैं, लेकिन राजनीति के दुष्चक्र को अभी तक नहीं भेद पाए हैं।

पिछले साल भी सोनम केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और राज्य में छठी अनुसूची लागू करने की मांग को लेकर गांधीवादी तरीके 15 दिनों तक क्रमिक अनशन पर बैठे थे। लेकिन बाद में आंदोलन के हिंसक होने से सोनम को अपना अनशन समाप्त करना पड़ा था। सरकार ने इस हिंसा के लिए वांगचुक को ही जिम्मेदार माना था। 

दरअसल साठ वर्षीय सोनम वांगचुक को एक नवाचारी, पर्यावरणवादी और शिक्षा विद के रूप में जाना जाता है। उनके पिता भी जम्मू-कश्मीर राज्य में मंत्री रहे हैं। वो पेशे से इंजीनियर हैं और जनआंदोलन में अग्रणी रहे हैं। लेकिन जब से वो राजनीतिक आंदोलन में शामिल हुए हैं, सरकार के निशाने पर हैं। हालांकि वो हिम्मत हारने वालों में से नहीं है। देखने की बात यह है कि सोनम अब आगे क्या करते हैं और सरकार उनके साथ क्या सलूक करती है?




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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