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देव की डायरी: राजनीति का व्याकरण, संज्ञा चुनाव लड़ रही है और कर्ता कुर्सी पर है...
सार
हिंदी व्याकरण के टर्म ने राजनीति में जो 'घुसपैठ धर्म' की आधारशिला रखी है, उसके तहत यहां कोई भी अपनी धुरी पर टिका नहीं रह पाता। संज्ञा को लगता है कि वही सबसे बड़ी है। वही आजकल हर जगह चुनाव लड़ रही है। सर्वनाम ने गठबंधन कर लिया है। वह कहता है, "नाम मत लो, 'वह' कह दो। आजकल नाम लेने में जोखिम है। विशेषण बीच में आकर हर किसी का मेकअप करने लगता है और कर्ता बेचारा अदालत में खड़ा अभियुक्त-सा पूछता रहता है, "आखिर किया किसने?"
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राजनीति का व्याकरण
- फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
हिंदी के मास्टर साहब ब्लैकबोर्ड पर चाक से व्याकरण के सूत्र लिखते थे। हम समझते थे, वे भाषा पढ़ा रहे हैं। अब लगता है, वे राजनीति का प्रारंभिक प्रशिक्षण दे रहे थे। तब हम व्याकरण से डरते थे। आज देखता हूं कि नेता उससे खेलते हैं। मास्टर साहब ने कहा था, "भाषा बिना व्याकरण के नहीं चलती।" राजनीति ने साबित कर दिया कि व्याकरण बिना भाषा के भी चल सकती है।
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व्याकरण में सबसे पहले संज्ञा आई थी। मास्टर साहब बोले थे, हर आदमी का एक नाम होता है। अब राजनीति कह रही है, हर नाम का एक आदमी होना जरूरी नहीं। यहां नाम पहले पैदा होता है। आदमी बाद में। काम बाद में होता है। शिलापट पहले लग जाता है।
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कई बार तो लगता है, पुल केवल इसलिए बनता है कि उस पर किसी का नाम लिखा जा सके। नाम का भी अपना लोकतंत्र है। हर नाम दूसरे नाम को मिटाना चाहता है। इतिहास से लेकर अस्पताल तक यही प्रतियोगिता चल रही है। देश में नाम बदलने की जितनी जल्दी है, उतनी शायद हालात बदलने की भी नहीं।
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संज्ञा के भी कई रूप हैं। कुछ व्यक्तिवाचक संज्ञाएं इतनी मोटी हो जाती हैं कि पूरी पार्टी उनका विशेषण बन जाती है। बाकी नेता फुटनोट बनकर रह जाते हैं। भाववाचक संज्ञा भी कम दिलचस्प नहीं। ईमानदारी, नैतिकता, शुचिता, त्याग, और सेवा, ये सारे शब्द चुनाव के मौसम में प्रवासी पक्षियों की तरह लौट आते हैं।
मतदान खत्म। पक्षी उड़ गए। शब्द फिर शब्दकोश में बैठ गए। जातिवाचक संज्ञा का नाम पहले आदमी था। अब मतदाता है। मतदान तक वह जनार्दन है। नतीजे के बाद आंकड़ा।
संज्ञा के बाद सर्वनाम
फिर व्याकरण में आया था सर्वनाम। यहीं राजनीति मुस्कुराई। मास्टर साहब ने कहा था, "संज्ञा बार-बार आए तो सर्वनाम लगा दो।" नेताओं ने कहा, "जिम्मेदारी बार-बार आए तो सर्वनाम लगा दो।"
घोटाला हुआ तो फलां ने किया। बेरोजगारी बढ़ी तो पिछली सरकार कर गई। महंगाई बढ़ी तो दुनिया जिम्मेदार है। लेकिन, पुल बना तो मैंने बनाया। हवाई अड्डा बना तो यह मेरी सोच थी। बारिश भी अगर समय पर हो जाए, तो उसका श्रेय लेने की इच्छा दिखाई देने लगती है।
राजनीति में 'वे' सबसे गुनहगार शब्द है। और 'मैं' सबसे ईमानदार। सर्वनाम का ऐसा उपयोग शायद पाणिनि ने भी नहीं सोचा होगा।
सर्वनाम के बाद विशेषण
फिर विशेषण आया। विशेषण वाक्य का वह चापलूस है, जिसका अपना कोई वजूद नहीं, लेकिन जिसके बिना किसी का काम नहीं चलता। वह कभी कर्ता के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है, तो कभी संज्ञा की आरती उतारने लगता है।
विशेषण का काम ही है सच को इतना फुला देना कि वह झूठ लगने लगे। वह 'सफेद' को 'दूधिया सफेद' और 'चोर' को 'कथित चोर' बना देता है।
राजनीति के व्याकरण में माननीय, लोकप्रिय, जनप्रिय, कर्मयोगी, विकास पुरुष, गरीबों का मसीहा...देश का लाल, इतने विशेषण चिपका दिए गए हैं कि आदमी कहीं दिखाई ही नहीं देता। ठीक वैसे ही, जैसे पुरानी दीवार पर इतने पोस्टर चिपक जाएं कि दीवार गायब हो जाए। विशेषण राजनीति का मेकअप है। चेहरा चाहे जैसा हो, कैमरे में चमकना चाहिए।
इसके बाद क्रिया
अब क्रिया की बारी है। व्याकरण कहता है, क्रिया मतलब काम। राजनीति कहती है, क्रिया मतलब घोषणा। करेंगे, बनाएंगे, लाएंगे, दिलाएंगे या हटाएंगे। क्रिया हमेशा भविष्य काल में रहती है। वर्तमान काल बेचारा फाइल में पड़ा रहता है। भूतकाल हर चुनावी सभा में भाषण देता है।
क्रिया के बाद कर्ता
फिर कर्ता आया। मास्टर साहब ने कहा था, जो काम करे, वही कर्ता। राजनीति ने नियम बदल दिया। जो फीता काटे वही कर्ता। जिसके हाथ में कैंची है, इतिहास उसी का है। सड़क किसने बनाई, कोई नहीं पूछता। फीता किसने काटा, सबको याद रहता है। काम करने वाला सरकारी फाइल में मिलता है। श्रेय लेने वाला फोटो में।
कर्ता के बाद कारक
फिर कारक आया। यहीं आकर व्याकरण ने राजनीति से हाथ मिला लिया। संबंध कारक भी होता है, मतलब का, के या की। यह मुख्यमंत्री जी का आदमी है। वह मंत्री जी के रिश्तेदार हैं। यह उद्योगपति की पसंद है।
डिग्री बाद में देखी जाती है। पहचान पहले। यहां योग्यता का पहला प्रमाण पत्र परिचय है। बाकी प्रमाण पत्र केवल फाइल मोटी करने के काम आते हैं।
अपादान का महत्व
और फिर आया था अपादान। मास्टर साहब ने पढ़ाया था -"पेड़ से पत्ता गिरा।" उन्हें क्या मालूम था कि एक दिन पत्ते नहीं, विधायक गिरेंगे। सुबह पार्टी से अलग। दोपहर विचारधारा से अलग। शाम सिद्धांत से अलग। रात नई पार्टी में शामिल। इतनी तेजी से तो मौसम भी नहीं बदलता। नेता बदल जाते हैं।
अब तो लगता है, दल-बदल कानून नहीं, अपादान का अभ्यास है। हर चुनाव से पहले इसकी विशेष कक्षाएं लगती होंगी। मास्टर साहब होते तो शायद किताब का उदाहरण बदल देते। वे लिखते -"पेड़ से पत्ता नहीं गिरा। पार्टी से विधायक गिरा।" और पूरी कक्षा बिना रटे ही अपादान समझ जाती।
अधिकरण
अधिकरण भी बदल गया है। मास्टर साहब ने पढ़ाया था, जहां क्रिया होती है, वही अधिकरण। राजनीति ने कहा, जहां कुर्सी हो, वहीं अधिकरण। काम गांव में हो सकता है। फोटो राजधानी में ही खिंचेगी। फाइल दफ्तर में चलेगी। श्रेय मंच पर मिलेगा। कुर्सी राजनीति का सबसे पवित्र अधिकरण है। उस पर बैठते ही आदमी का व्याकरण बदल जाता है। जो कल तक 'हम' कहता था, आज 'मैं' कहने लगता है। जो कल तक जनता के बीच था, आज जनता के ऊपर हो जाता है।
वचन
फिर वचन आया था। हिंदी के व्याकरण में दो वचन हैं- एकवचन और बहुवचन। राजनीति में भी दो ही वचन हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद। चुनाव से पहले हर नेता कहता है, "हम करेंगे।" चुनाव के बाद वही नेता कहता है, "मैंने कर दिया।" जनता हर बार बहुवचन रहती है। श्रेय हमेशा एकवचन हो जाता है।
हिंदी व्याकरण का काल भी कम अद्भुत नहीं। भूतकाल हर सभा में रोता है। वर्तमान काल हर प्रेस वार्ता में मुस्कुराता है। भविष्य काल हर घोषणा में हाथ जोड़ कर खड़ा रहता है। हमारा लोकतंत्र भविष्य काल का सबसे बड़ा कवि है। उसकी हर कविता 'होगा' पर खत्म होती है।
संधि
संधि भी खूब है। व्याकरण की संधि में दो शब्द मिलते हैं। राजनीति की संधि में दो दल। कल तक जो एक-दूसरे को लोकतंत्र का खतरा बताते थे, आज साथ बैठकर लोकतंत्र बचा रहे होते हैं। इसे ही राजनीतिक संधि कहते हैं। समास की लीला भी अपरंपार है।
हिंदी व्याकरण में, दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) के मेल से एक नया और संक्षिप्त शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। राजनीति के समास में दो विरोधी मिलकर 'सरकार' हो जाते हैं। जिसे कल अवसरवाद कहा गया था, आज उसे राष्ट्रीय हित कहा जाता है।
भाषा भी बेचारी सिर खुजाती रहती होगी। विलोम शब्द भी बदल गए हैं। सच का विलोम झूठ नहीं, प्रेस नोट है। वादे का विलोम इनकार नहीं, स्पष्टीकरण है। त्याग का विलोम लोभ नहीं, समायोजन है। इन सबमें हिंदी व्याकरण का अव्यय सबसे सुखी निकला। अव्यय वह शब्द है जिसका रूप कभी नहीं बदलता। राजनीति में भी कुछ लोग अव्यय होते हैं। हर सरकार में मिल जाते हैं। हर दल में दिखाई देते हैं। हर कुर्सी के आसपास रहते हैं। सरकारें बदलती रहती हैं। वे नहीं बदलते।
विराम चिह्नों का भी अपना दुख है। जनता हर पांच साल बाद प्रश्नवाचक चिह्न बन जाती है। सरकार हर बार विस्मयादिबोधक चिह्न लगा देती है। जांच आयोग अल्पविराम लगा देता है। फाइल तीन बिंदु बनकर आगे बढ़ती रहती है... पूर्ण विराम किसी को पसंद नहीं। लोकतंत्र में हर बात अगली समिति तक टल सकती है।
इन दिनों मुझे अपने हिंदी के मास्टर साहब बहुत याद आते हैं। वे सचमुच दूर की सोचते थे। उन्होंने हमें संज्ञा पढ़ाई, नेताओं ने उसे पोस्टर बना दिया। उन्होंने सर्वनाम पढ़ाया, नेताओं ने उसे ढाल बना लिया। उन्होंने विशेषण पढ़ाया, नेताओं ने उसे माला बना लिया। उन्होंने क्रिया पढ़ाई, नेताओं ने उसे घोषणा बना दिया। उन्होंने कर्ता पढ़ाया, नेताओं ने उसे फोटो बना दिया। उन्होंने कारक पढ़ाया, नेताओं ने उसे संबंध बना दिया। उन्होंने अपादान पढ़ाया, नेताओं ने उसे दल-बदल बना दिया। और अधिकरण... उसे कुर्सी बना दिया।
राजनीति की असली सुंदरता भी शायद इसी अव्यवस्था में है। यहां शब्द केवल अर्थ नहीं देते, अवसर भी तलाशते हैं। संज्ञा हमेशा पद चाहती है, सर्वनाम पहचान छिपाना चाहता है, विशेषण पुरस्कार चाहता है और कर्ता चाहता है कि कम से कम एक वाक्य ऐसा मिले, जिसमें सचमुच उसी का नाम लिखा जाए। लेकिन सत्ता भी अनुभवी है। वह मुस्कुराकर कहती है, "तुम लोग जितना चाहो लड़ लो, आखिर में पूर्णविराम मैं ही लगाऊंगी।"
मास्टर साहब ने व्याकरण सिखाया था। नेताओं ने साबित कर दिया कि व्याकरण भी सत्ता के अधीन है।
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