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रिश्ते भी बचे रहें, न्याय भी: किस तरह से संपत्ति में बेटी को हिस्सा देने का फैसला नहीं बढ़ाएगा नाराजगी?

Fri, 17 Jul 2026 06:30 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 17 Jul 2026 06:30 AM IST
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सार
मेरी उम्र 70 वर्ष है। मैं अपनी संपत्ति का एक हिस्सा बेटी को देना चाहता हूं। पर, डर है कि मेरे इस फैसले से बेटे-बहू नाराज हो जाएंगे और परिवार में विवाद हो सकता है। मैं क्या करूं? संपत्ति बंटवारे में बेटी की हिस्सेदारी को लेकर झांसी के रमेश जी को मनोवैज्ञानिक डॉ. निशा खन्ना ने कुछ यों दी सलाह...
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Preserving relationships while ensuring justice decision daughter share in property without causing resentment
संपत्ति में कैसे दें बेटी को हिस्सेदारी? - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

सत्तर वर्ष की उम्र में आकर ऐसा सोचना और परिवार की चिंता करना स्वाभाविक है। लेकिन, सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि आपका यह विचार कोई पक्षपात नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत कदम है। हां, यह बात सही है कि समाज में लंबे समय से रूढ़िवादी धारणा रही है कि पैतृक संपत्ति पर केवल बेटों का अधिकार होता है, पर आज कानूनन और नैतिक, दोनों रूपों में बेटियां, बेटों के बराबर की हकदार हैं। इसलिए, यदि आप बेटी को संपत्ति में हिस्सा देना चाहते हैं, तो ऐसा करके आप अपने बच्चों को न्याय और समानता का एक अमूल्य संस्कार दे रहे हैं, जो भावी पीढ़ियों के लिए भी मिसाल बनेगा।


दरअसल, पारिवारिक विवादों की सबसे बड़ी वजह फैसले नहीं, बल्कि उन्हें लेने का तरीका होता है। यदि आप बिना किसी चर्चा के वसीयत या संपत्ति का बंटवारा कर देंगे, तो परिवार के अन्य सदस्यों को यह लग सकता है कि उनसे कोई बात छिपाई गई है। ऐसे में, गलतफहमियां और नाराजगी बढ़ सकती है। इसलिए, सबसे जरूरी है पारदर्शिता व खुला संवाद। परिवार के सभी सदस्यों को साथ बिठाकर अपनी बात रखें। उन्हें समझाएं कि यह निर्णय किसी के प्रति भेदभाव नहीं, बल्कि बेटी के प्रति आपका स्नेह और उसका अधिकार भी है। एक और बात, संवाद के दौरान यदि बेटे या बहू की तरफ से कोई तीखी प्रतिक्रिया आए, तो गुस्सा होने के बजाय उन्हें एहसास दिलाएं कि आपका यह कदम पूरे परिवार की भलाई और भविष्य में किसी भी मनमुटाव को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए है। यदि आप शांत, संतुलित और निष्पक्ष रहेंगे, तो वे भी आपकी बात सुनने के लिए अधिक तैयार होंगे। बेशक, कानून आपको अपनी संपत्ति अपनी मर्जी से देने की पूरी आजादी देता है, पर एक पिता के तौर पर आपका खुला संवाद व स्पष्टता ही परिवार में असंतोष की दीवार खड़ी होने से रोकेगी।


संपत्ति से जुड़े मामलों में कानूनी पारदर्शिता भी बेहद जरूरी है। ऐसे में, यदि आवश्यक हो, तो किसी अनुभवी वकील की मदद लेकर स्पष्ट और कानूनी रूप से मजबूत वसीयत तैयार करें। इससे भविष्य में अनावश्यक विवादों की आशंका कम हो जाती है। यदि आपको लगता है कि परिवार में पहले से तनाव है और बातचीत विवाद में बदल सकती है, तो किसी पारिवारिक परामर्शदाता या अच्छे मनोवैज्ञानिक की सहायता लेना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

याद रखिए, संपत्ति से ज्यादा कीमती रिश्ते होते हैं। यदि आपके बच्चे यह देखेंगे कि आपने समानता, न्याय और सम्मान के आधार पर निर्णय लिया है, तो यह उनके लिए नजीर बनेगा। इसलिए, अपना निर्णय निडर होकर लें, पर उसे संवेदनशीलता, पारदर्शिता और खुले संवाद के साथ परिवार के सामने रखें। जब निर्णय के साथ विश्वास और स्पष्टता जुड़ जाती है, तो रिश्तों को बचाते हुए न्याय करना कहीं अधिक आसान हो जाता है।

कानूनी पक्ष
खुद से अर्जित की गई संपत्ति का कुछ हिस्सा बेटी को देना कानूनी अधिकार है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा बताती हैं :
  • भविष्य में किसी भी विवाद से बचने के लिए उचित कानूनी दस्तावेजीकरण करना सबसे सुरक्षित उपाय है। इसके लिए आप ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925’ के तहत एक स्पष्ट वसीयत लिख सकते हैं, जिसमें बेटी को दिए जाने वाले हिस्से और उसके पीछे के ठोस कारणों (जैसे स्नेह या बुढ़ापे में देखभाल) का साफ उल्लेख हो।
  • इस वसीयत का पंजीकरण कराने से इसकी कानूनी प्रमाणिकता बेहद मजबूत हो जाती है, जिससे इसे भविष्य में चुनौती देना बेहद मुश्किल होगा।
  • आप अपने जीवनकाल में ही संपत्ति बेटी के नाम करना चाहते हैं, तो ‘संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882’ के तहत एक पंजीकृत उपहार विलेख (गिफ्ट डीड) बनवा सकते हैं। इस डीड को दो गवाहों के सामने पंजीकृत कराया जाना अनिवार्य है।
  • आप इसमें 'वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007' के तहत यह शर्त भी जोड़ सकते हैं कि आपके जीवनकाल तक संपत्ति पर आपका ही नियंत्रण रहेगा, जिससे आप आर्थिक या शारीरिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे।
  • यदि आप सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं, तो सभी उत्तराधिकारियों की सहमति से एक 'पारिवारिक समझौता' भी कर सकते हैं, जिस पर सभी के हस्ताक्षर होने से बाद में किसी कानूनी मुकदमेबाजी की गुंजाइश नहीं बचती।
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