अयोध्या राम मंदिर घोटाला: शास्त्रार्थ रोक सकता है दान-चोरी और हेराफेरी की घटनाएं, उठाना होगा ये कदम
किसी भी संस्था में केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; उसे प्रक्रियागत् उत्तरदायित्व और स्वतंत्र परीक्षण की आवश्यकता होती है। शास्त्रार्थ का एक मूलभूत सिद्धांत है कि किसी भी दावे को प्रमाण, तर्क और परीक्षण के आधार पर परखा जाए। ऋग्वेद (10.71.2) में संकेत मिलता है कि जिस प्रकार अन्न को छानकर उसकी अशुद्धियां अलग की जाती हैं, उसी प्रकार विचारों और सूचनाओं का भी परीक्षण आवश्यक है। यदि मंदिर प्रबंधन में समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा, वित्तीय परीक्षण, प्रश्नोत्तर सत्र और निर्णयों की तर्कसंगत समीक्षा की संस्थागत परंपरा विकसित की जाए, तो अनियमितताओं की संभावना बहुत सीमा तक कम हो सकती है।
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अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के दानपात्रों से करोड़ों रुपये की कथित चोरी समाचार ने देश-विदेश में फैले करोड़ों रामभक्तों को स्तब्ध, आहत और चिंतित कर दिया है। इसी बीच केरल के सबरीमला मंदिर में स्वर्ण-मंडन कार्य के दौरान लगभग 4.5 किलोग्राम सोने के कथित दुरुपयोग की जांच कर रही विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में आपराधिक षड्यंत्र की आशंका व्यक्त की, जिसके आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने तत्कालीन त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (टीडीबी) के अध्यक्ष पी. एस. प्रशांत सहित अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध नए मामले दर्ज करने की अनुमति प्रदान कर दी है।
उल्लेखनीय है कि पी. एस. प्रशांत वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे हैं, जबकि अयोध्या प्रकरण दक्षिणपंथ से जुड़े व्यक्तियों के इर्द-गिर्द उभरा है। दोनों घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि मंदिरों में अनियमितताओं का प्रश्न किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि संस्थागत प्रशासन और सुशासन का विषय है। यद्यपि अयोध्या की घटना सदियों के संघर्ष, श्रीराम के भारतीय सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय जीवन में उनके केंद्रीय स्थान तथा वैश्विक श्रद्धा-केंद्र होने के कारण अधिक पीड़ादायक प्रतीत होती है, तथापि यह भी सत्य है कि स्वतंत्र भारत में मंदिरों में चोरी, भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं की घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। अयोध्या की घटना इसलिए भी विशेष रूप से व्यथित करती है कि यह उन परिस्थितियों में सामने आई, जब श्रीराम मंदिर आंदोलन और मंदिर निर्माण के लिए अपने जीवन के दशकों समर्पित करने वाले अनेक व्यक्ति ही इसके प्रबंधन और संचालन के शीर्ष पदों पर आसीन थे।
इन घटनाओं को केवल कुछ व्यक्तियों द्वारा की गई कथित चोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मंदिर प्रबंधन की गहरी संस्थागत कमियों के संकेत के रूप में भी समझा जाना चाहिए। भारतीय ज्ञानपरंपरा, जिसमें दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, सुरक्षा, कोषागार संरक्षण, न्याय और जीवन के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श और शास्त्रार्थ की सुदीर्घ परंपरा रही है, इन चुनौतियों के समाधान के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक और प्रशासनिक ढांचा प्रस्तुत करती है। भारत में ज्ञान को कभी स्थिर और प्रश्नातीत नहीं माना गया; उसे निरंतर संवाद, परीक्षण और बौद्धिक अनुशीलन के माध्यम से परिष्कृत करने का प्रयास किया गया। इसी विमर्शपरक परंपरा का सुव्यवस्थित स्वरूप है शास्त्रार्थ।
सामान्य धारणा में शास्त्रार्थ को केवल वाद-विवाद या आध्यात्मिक बहस माना जाता है, जबकि वास्तव में यह भारतीय ज्ञानमीमांसा और शोध की एक वैज्ञानिक पद्धति है। इसका उद्देश्य प्रतिपक्ष को पराजित करना मात्र नहीं, बल्कि संवाद, सहभागी विमर्श, अन्वेषण और विश्लेषण के माध्यम से विषय के प्रामाणिक स्वरूप तक पहुंचना है। ऋग्वैदिक काल से यह ज्ञान-सृजन, ज्ञान-परिष्कार, बौद्धिक स्पष्टता और निर्णय का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम रहा है। इसमें परिकल्पना, प्रमाण, तर्क, परीक्षण, खंडन, सत्यापन, वस्तुनिष्ठता, आगमन और निगमन जैसे वैज्ञानिक तत्त्व स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं।
हिन्दू मंदिरों में दान की चोरी, हेराफेरी और भ्रष्टाचार की रोकथाम में शास्त्रार्थ कई प्रकार से सहायक हो सकता है। मंदिर प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख समस्याओं और चुनौतियों तथा उनके शास्त्रार्थ-आधारित संभावित समाधानों को विषयगत रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:
शक्ति का केंद्रीकरण
अयोध्या और सबरीमला की घटनाओं से जो पहला बड़ा प्रश्न उभरता है, वह शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण का है। जब नीति-निर्माण, प्रशासनिक निर्णय, नियुक्तियां और दैनिक संचालन कुछ व्यक्तियों तक सीमित हो जाते हैं, तब संस्थागत संतुलन दुर्बल पड़ने लगता है। शास्त्रार्थ की मूल भावना इसके विपरीत है। ऋग्वेद का उद्घोष “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है (ऋग्वेद, 1. 89.1)। शास्त्रार्थ किसी एक व्यक्ति के अंतिम शब्द की अपेक्षा बहु-दृष्टिकोण, सामूहिक चिंतन और तर्कपूर्ण विमर्श को महत्त्व देता है। यदि मंदिरों के महत्त्वपूर्ण निर्णय संवादात्मक, सहभागितापूर्ण और बहु-हितधारक विचार-विमर्श के माध्यम से लिए जाएं, तो निर्णय अधिक संतुलित, पारदर्शी, उत्तरदायी, सुदृढ़ तथा दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बन सकते हैं।
उत्तरदायित्व तथा प्रभावी निगरानी तंत्र का अभाव
किसी भी संस्था में केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; उसे प्रक्रियागत् उत्तरदायित्व और स्वतंत्र परीक्षण की आवश्यकता होती है। शास्त्रार्थ का एक मूलभूत सिद्धांत है कि किसी भी दावे को प्रमाण, तर्क और परीक्षण के आधार पर परखा जाए। ऋग्वेद (10.71.2) में संकेत मिलता है कि जिस प्रकार अन्न को छानकर उसकी अशुद्धियां अलग की जाती हैं, उसी प्रकार विचारों और सूचनाओं का भी परीक्षण आवश्यक है। यदि मंदिर प्रबंधन में समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा, वित्तीय परीक्षण, प्रश्नोत्तर सत्र और निर्णयों की तर्कसंगत समीक्षा की संस्थागत परंपरा विकसित की जाए, तो अनियमितताओं की संभावना बहुत सीमा तक कम हो सकती है।
जब नियुक्तियां स्पष्ट मानदंडों, योग्यता और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के बजाय व्यक्तिगत अनुशंसाओं पर आधारित होती हैं, तब व्यक्तिनिष्ठ निष्ठाएं संस्थागत निष्ठा पर हावी होने लगती हैं। ऐसी परिस्थितियों में समान हितों वाले समूह उभरने लगते हैं, जो एक-दूसरे की अनियमितताओं, चोरी, हेराफेरी और भ्रष्ट आचरण पर पर्दा डालने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप, देवस्थान की प्रतिष्ठा और उसके मूल उद्देश्य गौण हो जाते हैं तथा समूह के सदस्यों की त्रुटियों और कदाचार को छिपाना सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाता है।
शास्त्रार्थ व्यक्ति-केन्द्रित नहीं, बल्कि सिद्धांत-केन्द्रित व्यवस्था का पक्षधर है। यह लोकतांत्रिक भावना, ज्ञान की सर्वोच्चता, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यनिष्ठा को प्रतिष्ठित करते हुए तर्क, प्रमाण और खुले विमर्श को प्राथमिकता देता है। ऐसी प्रक्रिया पक्षपात, भाई-भतीजावाद और संभावित दुरुपयोग की आशंकाओं को काफी कम कर सकती है।
प्रश्नों, असहमतियों और चेतावनियों की उपेक्षा
ऋग्वेद में उन लोगों को समाज के लिए घातक माना गया है, जो प्रश्न, विचार-विमर्श और संवाद के प्रस्ताव से प्रसन्न नहीं होते। इसका आशय यह है कि व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी प्रश्न पूछने, तर्क-विमर्श करने और संवाद के अवसरों का स्वागत करना चाहिए (ऋग्वेद, 8.101.4)। अनेक संस्थागत विफलताएं इसलिए नहीं होतीं कि समस्या का आभास नहीं था, बल्कि इसलिए कि उपलब्ध संकेतों और आशंकाओं की समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं की गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट के कुछ सदस्यों और मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने समय-समय पर चिंताएं और असहमति व्यक्त कीं, जिन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। शास्त्रार्थ की आत्मा प्रश्न,
प्रतिप्रश्न और असहमति के सम्मान में निहित है; ऐसी व्यवस्था प्रारंभिक स्तर पर ही संभावित संकटों की पहचान और निवारण में सहायक हो सकती है।
(सिद्धेश्वर शुक्ल हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘शास्त्रार्थ इन इंडिया: मेथडोलॉजी एंड एप्लीकेशन्स’ के लेखक हैं।)
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