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उम्र को मात देती है कला: सार्थक कर्म और नई रुचियां ही सुखद वृद्धावस्था का आधार

Fri, 17 Jul 2026 06:20 AM IST
Devesh Tripathi बर्ट्रेंड रसेल
बर्ट्रेंड रसेल Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 17 Jul 2026 06:20 AM IST
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सार
जैसे-जैसे उम्र बढ़े, इन्सान को किसी नए काम, नई कला या किसी सार्थक उद्देश्य से जुड़ जाना चाहिए। इससे मन वृद्धावस्था की चिंता में नहीं उलझता, बल्कि समाज और मानवता के साथ जुड़कर जीवन को एक नया अर्थ देने लगता है।
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वृद्धावस्था एक खूबसूरत आजादी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

यदि मनुष्य अपने जीवन में निरंतर नए विषयों, नए संबंधों और नई रुचियों को स्थान देता रहे, तो उसका जीवन धीरे-धीरे और अधिक सुंदर, व्यापक तथा अर्थपूर्ण होता जाता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़े, इन्सान को किसी नए काम, नई कला या किसी सार्थक उद्देश्य से जुड़ जाना चाहिए। इससे मन वृद्धावस्था की चिंता में नहीं उलझता, बल्कि समाज और मानवता के साथ जुड़कर जीवन को एक नया अर्थ देने लगता है।


अधिकांश लोग अपनी वृद्धावस्था को स्वयं ही जटिल और कठिन बना लेते हैं। वे वर्तमान में जीने के बजाय बीते हुए समय, छूटे हुए अवसरों और घटती हुई शारीरिक शक्ति के बारे में अधिक सोचने लगते हैं। इसलिए, अपने विचारों को बदलना आवश्यक है। जीवन से किसी परीकथा जैसे सुखद अंत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जीवन में सुख और दुख, सफलता व असफलता स्वाभाविक हैं। यदि हम यह मान लें कि हर कठिनाई के बाद हमें अवश्य ही कोई बड़ा पुरस्कार मिलेगा, तो निराशा हमारे जीवन का हिस्सा बन सकती है। इसलिए, सच्ची खुशी परिस्थितियों के बदलने में नहीं, बल्कि उन्हें सहजता से स्वीकारते हुए अपने कर्तव्यों और अपनी रुचियों को पूरी निष्ठा से निभाने में है। यही दृष्टिकोण मनुष्य को भीतर से मजबूत व संतुलित बनाता है।


दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को समय-समय पर अपनी मृत्यु का स्मरण भी करते रहना चाहिए। क्योंकि, जब व्यक्ति अपनी नश्वरता को स्वीकार कर लेता है, तब वह समय को व्यर्थ नहीं गंवाता, बल्कि समाज के लिए सार्थक योगदान देने का प्रयास करता है।
मैं चाहता हूं कि मेरा अंत उस समय हो, जब मैं अपने कार्य में पूरी निष्ठा से लगा रहूं और यह संतोष मेरे साथ हो कि जो कुछ मेरे लिए संभव था, वह मैंने पूरी ईमानदारी से किया। इसके लिए हमें अपने काम या अपनी कला से इस प्रकार जुड़ जाना चाहिए कि उम्र का एहसास ही न हो। मन में यह विचार ही न आए कि मैं अभी जवान हूं या वृद्ध हो चुका हूं। यदि हम जीवन भर सीखते रहें, अपनी रुचियों को जीवित रखें, दूसरों के लिए उपयोगी बनें और हर दिन को उद्देश्यपूर्ण ढंग से जिएं, तो वृद्धावस्था भय का नहीं, बल्कि आत्मिक शांति का समय बन सकती है।
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