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प्रकृति और पर्यावरण: हरियाली के नाम पर उत्सव या विकास के नाम पर विनाश?

Fri, 17 Jul 2026 01:17 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Fri, 17 Jul 2026 01:17 PM IST
सार

Sustainable Development: उत्तराखंड में इस वर्ष लोगों ने 'ब्लैक हरेला' मनाया। हरेला, जिसे सदियों से प्रकृति और हरियाली का पर्व माना जाता है, इस बार विरोध का प्रतीक बन गया।

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हरियाली के नाम पर उत्सव या विकास के नाम पर विनाश? - फोटो : AI

विस्तार

जब एक ओर पूरे देश में करोड़ों पौधे लगाने के अभियान चल रहे हों और दूसरी ओर दशकों पुराने पेड़ों को बचाने के लिए लोग उनसे लिपटकर खड़े होने को मजबूर हों, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर हमारी पर्यावरण नीति की वास्तविक दिशा क्या है? क्या हम सचमुच हरियाली बढ़ा रहे हैं या केवल उसके आंकड़े गिन रहे हैं? क्या विकास और प्रकृति का संतुलन हमारी नीतियों का आधार है या फिर हर नई परियोजना की पहली कीमत पेड़ों को ही चुकानी पड़ती है?

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हर वर्ष मानसून के साथ देश में हरियाली का उत्सव शुरू हो जाता है। कहीं 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान चल रहा है, कहीं करोड़ों पौधे लगाने के लक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं तो कहीं मंत्री, सांसद, अधिकारी और जनप्रतिनिधि हाथों में फावड़ा लेकर पौधारोपण करते दिखाई देते हैं। सरकारी विज्ञापनों में हरियाली का संदेश है, सोशल मीडिया पर पौधे लगाते हुए तस्वीरें हैं और लगभग हर विभाग अपने-अपने लक्ष्य पूरे करने में जुटा हुआ है, लेकिन इसी समय देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी तस्वीरें भी सामने आती हैं, जो इन दावों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
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उत्तराखंड में इस वर्ष लोगों ने 'ब्लैक हरेला' मनाया। हरेला, जिसे सदियों से प्रकृति और हरियाली का पर्व माना जाता है, इस बार विरोध का प्रतीक बन गया। लोगों ने काली पट्टियां बांधीं, पेड़ों से लिपटकर उन्हें बचाने की कोशिश की और सरकार से पूछा कि यदि हरियाली वास्तव में हमारी प्राथमिकता है, तो फिर विकास परियोजनाओं के नाम पर इतने पुराने वृक्षों की कटाई क्यों की जा रही है? दूसरी ओर राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन चल रहा है। मरुस्थल की जीवनरेखा मानी जाने वाली खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि पूरे रेगिस्तानी ईको-सिस्टम का आधार है। उसे बचाने की लड़ाई अब केवल पर्यावरण की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि संस्कृति, आजीविका और भविष्य को बचाने का संघर्ष बन चुकी है।

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यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक ओर सरकारें करोड़ों पौधे लगाने के लक्ष्य निर्धारित कर रही हैं, दूसरी ओर उन्हीं की स्वीकृति से दशकों पुराने वृक्ष काटे जा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं। विकास हर समाज की आवश्यकता है। प्रश्न यह है कि क्या विकास का अर्थ हर बार पेड़ों की बलि देना ही होगा? क्या आधुनिक भारत की प्रगति का रास्ता हमेशा जंगलों, पहाड़ों और हरियाली के बीच से ही निकलेगा? और यदि ऐसा है तो इसकी अंतिम कीमत कौन चुकाएगा? यही वह प्रश्न है, जिससे आज देश की पर्यावरण नीति जूझ रही है।


आज लगभग हर बड़ी विकास परियोजना, चाहे वह एक्सप्रेस-वे हो, औद्योगिक कॉरिडोर, रेलवे लाइन, खनन परियोजना, बिजली संयंत्र, ट्रांसमिशन लाइन, बंदरगाह, एयरपोर्ट या शहरी विस्तार, किसी न किसी रूप में वृक्षों की कटाई से जुड़ी होती है। सरकारें इसके समर्थन में तर्क देती हैं कि देश को मजबूत आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है। बेहतर सड़कें होंगी तो निवेश आएगा, उद्योग बढ़ेंगे, रोजगार मिलेगा और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यह तर्क अपनी जगह सही है। कोई भी विकासशील देश सड़क, रेल, बिजली और उद्योग के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया जाता है। मानो विकास तभी संभव हो, जब प्रकृति पीछे हट जाए। मानो जंगल और वृक्ष विकास की राह में बाधा हों।
 

दुनिया ने अब इस सोच को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यूरोप के अनेक देशों में सड़कें बनती हैं, लेकिन जहां संभव हो, मार्ग बदलकर पुराने वृक्षों को बचाया जाता है। जापान में सुरंगों और एलिवेटेड संरचनाओं का उपयोग इस तरह किया जाता है कि जंगलों को न्यूनतम क्षति पहुंचे। सिंगापुर ने तो "सिटी इन ए फॉरेस्ट" की अवधारणा को वास्तविकता में बदल दिया, जहां शहरी विकास और हरियाली साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। भारत में भी कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं, लेकिन वे अपवाद हैं, हमारी नीति का हिस्सा नहीं।


हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम एक परिपक्व वृक्ष और एक छोटे पौधे को समान मान लेते हैं। सरकारी फाइलों में यदि एक वृक्ष काटकर उसकी जगह दस पौधे लगा दिए जाएं, तो इसे पर्यावरणीय क्षति की भरपाई मान लिया जाता है। जबकि प्रकृति का विज्ञान इस गणित को स्वीकार नहीं करता। एक वृक्ष को परिपक्व होने में बीस, तीस, कभी-कभी पचास वर्ष तक लग जाते हैं।

इन वर्षों में वह केवल लकड़ी का ढांचा नहीं बनता, बल्कि हजारों पक्षियों का आश्रय, अनगिनत जीवों का निवास, मिट्टी का संरक्षक, भूजल का संवाहक, कार्बन का अवशोषक और ऑक्सीजन का स्रोत बन जाता है। वह आसपास के तापमान को नियंत्रित करता है, वर्षा चक्र को प्रभावित करता है और अपने नीचे पूरे एक सूक्ष्म ईको-सिस्टम को जन्म देता है।

क्या यह सब एक मानसून में लगाए गए छोटे पौधे से तुरंत प्राप्त किया जा सकता है? उत्तर स्पष्ट है,नहीं। इसलिए पर्यावरण विशेषज्ञ बार-बार कहते हैं कि एक परिपक्व वृक्ष का कोई तात्कालिक विकल्प नहीं होता। दुर्भाग्य यह है कि भारत में सफलता का पैमाना वृक्षों को बचाना नहीं, बल्कि पौधे लगाने की संख्या बन गया है। हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, नए रिकॉर्ड बनाए जाते हैं, फोटो खिंचती हैं, अभियान पूरे घोषित कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद उन पौधों का क्या हुआ, इस पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती है।

विभिन्न सीएजी रिपोर्टों, सरकारी समीक्षाओं और स्वतंत्र अध्ययनों में यह सामने आता रहा है कि पौधारोपण के बाद उनकी देखभाल, सिंचाई और निगरानी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पौधे कुछ ही समय में नष्ट हो जाते हैं। कई स्थानों पर तो पौधारोपण के दावे और जमीन पर मौजूद वास्तविक पौधों की संख्या में बड़ा अंतर पाया गया। यानी सरकारी आंकड़ों में हरियाली बढ़ती रही, लेकिन धरातल पर जंगल सिकुड़ते गए।

भारतीय संविधान ने बहुत पहले यह स्वीकार कर लिया था कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए अनुच्छेद 48(क) राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा का दायित्व देता है, जबकि अनुच्छेद 51(क)(ग) प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना अपना मौलिक कर्तव्य मानने के लिए प्रेरित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाले गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालतों ने बार-बार कहा है कि सतत विकास ही वास्तविक विकास है, जहां आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलते हैं।

दुर्भाग्य से व्यवहार में यह संतुलन अक्सर दिखाई नहीं देता। पर्यावरणीय स्वीकृतियां कई बार केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाती हैं। प्रतिपूरक वनीकरण के लिए हजारों करोड़ रुपये के कैम्पा फंड उपलब्ध हैं, लेकिन आज भी यह प्रश्न बना हुआ है कि जिन जंगलों की कटाई हुई, क्या उनकी गुणवत्ता वाले नए जंगल वास्तव में विकसित हो पाए? जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते; वे मिट्टी, जल, वन्यजीव, पक्षियों और जैव विविधता का जीवंत संसार होते हैं। उनकी भरपाई केवल पौधों की संख्या से नहीं की जा सकती।

अब समय आ गया है कि हमारी सोच बदले। आवश्यकता केवल नए पौधे लगाने की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद वृक्षों को बचाने की है। विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय यह सिद्धांत अपनाना होगा कि जहां तक संभव हो, पहले वृक्ष बचाए जाएं और उसके बाद परियोजना का डिजाइन तय किया जाए। आधुनिक इंजीनियरिंग ऐसी अनेक तकनीकें उपलब्ध कराती है, जिनके माध्यम से मार्गों में परिवर्तन, एलिवेटेड कॉरिडोर, सुरंगों या वैकल्पिक डिजाइनों का उपयोग कर हजारों परिपक्व वृक्षों को बचाया जा सकता है। यही भविष्य का ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर है।

आखिरकार प्रकृति और विकास के बीच कोई वास्तविक संघर्ष नहीं है। संघर्ष हमारी नीतियों और प्राथमिकताओं में है। यदि विकास की कीमत हर बार प्रकृति को ही चुकानी पड़ेगी, तो अंततः विकास भी नहीं बचेगा। क्योंकि सड़कें, इमारतें और उद्योग मनुष्य को सुविधा दे सकते हैं, लेकिन जीवन नहीं। जीवन आज भी मिट्टी, पानी, हवा और पेड़ों से ही संचालित होता है। इसलिए अब समय केवल पौधारोपण के आंकड़े गिनने का नहीं, बल्कि वृक्ष संरक्षण को विकास नीति का केंद्रीय आधार बनाने का है। हरियाली का अर्थ केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उन वृक्षों को बचाना भी है, जिन्हें प्रकृति ने दशकों की साधना से तैयार किया है। यदि हम यह अंतर नहीं समझ पाए तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस बात के लिए कभी क्षमा नहीं करेंगी कि हमने विकास के नाम पर उनकी छांव, उनकी हवा और उनका भविष्य उनसे छीन लिया।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

 

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