दलाई लामा जन्मदिन विशेष : त्याग, करुणा और अहिंसा से भरपूर अद्भुत आंदोलनकारी
दलाई लामा दरअसल तिब्बतियों के सबसे बड़े और सर्वमान्य धर्मगुरु की पदवी है जिन्हें एक समय तिब्बत में राष्ट्राध्यक्ष जैसा गौरव प्राप्त था। वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो का जन्म 6 जुलाई, 1935 को पूर्वी तिब्बत में हुआ था।
तिब्बतियों के अत्याचार को देखते हुए करीब 15 दिनों का कठिन सफर पूरा कर वह 31 मार्च, 1959 को भारत आ गए थे, तभी से दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित खूबसूरत शहर धर्मशाला के पास मैक्लोडगंज में रहकर तिब्बत की संप्रभुता के लिए अहिंसात्मक संघर्ष कर रहे हैं।
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विस्तार
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से जब आप मिलते हैं तो वह आपके सिर पर हाथ जरूर रखते हैं। आप महसूस करेंगे कि उनका सिर पर हाथ फेरना एकदम मां के ममत्व भरे आशीर्वाद की तरह होता है। उनका ये आशीर्वाद सबके लिए समान है। इसके साथ में करुणा से भरे अद्भुत इंसान का प्यार और वो मुस्कराहट मिलती है जो आपको उनके पास से हटने नहीं देती।
86वां जन्मदिन और दलाई लामा
मंगलवार, 6 जुलाई 2021 को दुनिया के इन अद्भुत आंदोलनकारी का 86वां जन्मदिन है। अद्भुत इस लिहाज से कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने को तैयार हैं। तिब्बत की आजादी के लिए अपनी जन्मभूमि तक छोड़ने को तैयार हैं दलाई लामा।
चीन की तिब्बत पर कब्जे की गुस्ताखी के बाद भारत में दलाई लामा को आए हुए 62 साल से ज्यादा हो गए हैं। यानी तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष करते हुए आधी सदी से ज्यादा खर्च हो गई। संघर्ष का जो रास्ता उन्होंने 23-24 वर्ष की आयु में चुना, उससे वह आजीवन टस से मस नहीं हुए।
महज 23 वर्ष 9 माह की उम्र में जब उन्होंने भारत में प्रवेश किया तब देवभूमि हिमाचल के मैक्लोडगंज को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया।
महात्मा बुद्ध की छाया में दलाई लामा
महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को तो उन्होंने अपने जीवन में उतार ही लिया था, भारत में आकर महात्मा गांधी के जीवन आदर्श को भी आत्मसात कर लिया। तिब्बत पर चीन के कब्जे के खिलाफ उन्होंने पूरी दुनिया को गोलबंद किया। साथ ही दुनिया भर में फैले तिब्बतियों को एक मंच पर लाए।
आत्मीयता भरी संगठन शैली से निर्वासन के दौरान भी उन्होंने लोकतंत्र के मूल्यों को हर तिब्बती के दिल में उतार दिया। इसी का नतीजा है कि निर्वासित तिब्बत सरकार का बाकायदा चुनाव होता है। चुने गए प्रधानमंत्री को बड़ी सरलता से सत्ता का हस्तांतरण होता है। सबसे रोचक है कि हारे हुए प्रतिनिधि जीते नेता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं।
शिक्षाएं, आचरण और समाज
दलाई लामा की अहिंसा सिर्फ कर्म नहीं, आचरण में भी झलकती है। अपने संबोधन, भाषण और बातचीत में वह ऐसा कोई शब्द नहीं बोलते जिससे किसी को कष्ट पहुंचे। करुणा इतनी कि हर बातचीत में अपनी मां का जिक्र करने लगते हैं।
उन्होंने मां की कही हर बात अपने जीवन में उतार रखी है। आशावादी इतने हैं कि उनका अटूट विश्वास है कि चीन के नेता एक न एक दिन तिब्बतियों के दर्द को समझेंगे। उनका मानना है कि चीन से बातचीत कर तिब्बत की स्वायत्तता का रास्ता निकलेगा, इसीलिए उनका प्रयास रहता है कि चीन की सरकार से निर्वासित तिब्बती सरकार की बातचीत जारी रहे। इसी के चलते कई दौर की वार्ता हो भी चुकी है।
स्मृतियों में शेष है एक मुलाकात
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाईलामा के अंदर त्याग का तत्व किस सीमा तक भरा है, इसका उदाहरण इन पंक्तियों के लेखक को भी देखने को मिला। करीब 11 बरस पहले की बात है। दिल्ली से वरिष्ठ संपादकों का एक प्रतिनिमंडल मैक्लोडगंज में निर्वासित सरकार के वार्षिक उत्सव में शामिल होने के लिए गया था।
आयोजन के अगले दिन उनकी दलाईलामा के साथ एक मीटिंग तय हुई। प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात से कुछ देर पहले उनके ऑफिस से मुझे अंदर बुलाया गया और सीधे शांत बैठे दलाईलामा के सामने बैठा दिया गया।
तिब्बती धर्मगुरु ने सबसे पहले अपने सहयोगियों से पूछा कि इनको कुछ खिलाया है। उनकी हां के बाद उन्होंने कहा कि कोई सवाल हो तो पूछ लो क्योंकि बड़े संपादक लोग बड़े सवाल पूछेंगे।
मैने पूछा कि अगर चीन इस शर्त पर तिब्बत को स्वायत्तता दे कि दलाई लामा वापस नहीं आएंगे, तो क्या आप मान जाएंगे? दुनिया की वह महान शख्सियत इस सवाल पर एकदम से भावुक हो गई।
फिर उन्होंने अपने दिल पर हाथ रखकर कहा-'मेरे लिए तिब्बत की स्वायत्तता बहुत मायने रखती है। मेरा वहां जाना या न जाना बहुत छोटी बात है।'
यानी तिब्बत की स्वायत्तता के लिए आप अपनी जन्मभूमि छोड़ने को तैयार हैं। 'हां भाई हां।' दलाई लामा के इस जवाब पर उनके साथ खड़े ऑफिस के लोग सन्न रह गए।
मैं उन्हें प्रणाम कर मीटिंग रूम में आ गया। वहां आते ही दलाई लामा ने सभी का अभिवादन स्वीकार करने के बाद बहुत हंसी-मजाक के मूड में दिखते हुए कहा कि आपमें से बहुत लोग सोचते हैं कि तिब्बत को आजादी मिलने पर मैं भारत से वापस चला जाऊंगा। नहीं, तिब्बत के पैलेस में करीब 200 सीढ़ियां चढ़ने की मुझमें दम नहीं है। मैं तो यहीं भारत में ठीक हूं।
ऐसे अद्भुत त्याग की प्रतिमूर्ति हैं दलाई लामा। जिस तिब्बत की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसकी स्वयत्तता के आगे अपनी स्वदेश वापसी का अरमान तक दबाने को तैयार हैं। दुनिया को आज ऐसी ही करुणामयी और त्याग का भाव रखने वाली शख्सियत की जरूरत है। उनके जन्मदिन पर हम गौरवान्वित कि दलाई लामा ने अपनी कर्मभूमि के रूप में भारत को चुना।
दरअसल, वह खुद भी कह चुके हैं कि अगर उनका पुनर्जन्म हो तो भारत की पुण्यभूमि ही उन्हें फिर मिले। ऐसे दिव्य पुरुष की लंबी उम्र की कामना आज हर शांतिप्रेमी कर रहा है।
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