सोमनाथ के शिखर पर फहराती ध्वजा गवाह है, आतंक अस्थाई है और आस्था शाश्वत
महमूद गजनवी ने सोचा था कि उसने सोमनाथ का अंत कर दिया। वह बेवकूफ था। वह भूल गया था कि सोमनाथ का अर्थ है सोम (चंद्रमा) का नाथ। चंद्रमा घटता है, पर मरता नहीं है।
विस्तार
इतिहास सिर्फ धूल भरी तिथियों का ढेर नहीं होता, यह उन जख्मों का लेखा-जोखा है, जो सभ्यताओं के चरित्र को तय करते हैं। आज जब हम वर्ष 2026 में सोमनाथ की दहलीज पर खड़े हैं तो समुद्र की लहरों में सिर्फ भक्ति का स्वर नहीं है, बल्कि एक हजार साल पुराना वह चीत्कार भी कहीं दबा हुआ है। जनवरी 1026 में जब महमूद गजनवी के घोड़ों की टापों ने प्रभास पाटन की पवित्र मिट्टी को रौंदा था, तब वह सिर्फ एक मंदिर की लूट नहीं थी। वह हमारी सामर्थ्य, हमारी एकता और हमारे आत्म-गौरव पर किया गया एक ऐसा प्रहार था, जिसका दाग धोने में हमें दस सदियां लग गईं। आज गजनवी इतिहास के कूड़ेदान में एक क्रूर आक्रांता के रूप में दर्ज है और सोमनाथ का शिखर बादलों को चूम रहा है, लेकिन इस भव्यता के बीच खुद से एक कड़वा सवाल पूछना जरूरी है, क्या हम वाकई बदल गए हैं या हम आज भी सिर्फ इतिहास के दोहराव का इंतजार कर रहे हैं?
10वीं-11वीं शताब्दी का भारत सोने की चिड़िया तो था, लेकिन वह चिड़िया अलग-अलग पिंजरों में बंद थी। हम टुकड़ों में बंटे थे, हम सामरिक रूप से अपाहिज थे। गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया और हर बार वह हमारी आपसी फूट की दरारों से रास्ता बनाकर अंदर घुसा। सबसे बड़ा दर्द यह नहीं कि उसने मंदिर तोड़ा, बल्कि यह है कि जब 50 हजार निहत्थे श्रद्धालु अपनी देह की दीवार बनाकर मंदिर बचा रहे थे, तब भारत के शक्तिशाली राजा अपनी सीमाओं के भीतर दुबके बैठे थे। गजनवी शिवलिंग को खंडित करके और अकूत संपदा ऊंटों पर लादकर ले गया, लेकिन उससे बड़ा बोझ वो हमारे मानस पर पराजित मानसिकता का छोड़ गया था।
विगत 1000 वर्षों में हमने पत्थर तो जोड़ लिए, लेकिन क्या हमने अपनी उन कमियों को सुधारा? गजनवी के समय कोई केंद्रीय सुरक्षा नहीं थी। आज हम गर्व से कहते हैं कि हम परमाणु शक्ति हैं, हमारी सेनाएं विश्व में श्रेष्ठ हैं और खैबर दर्रे से अब किसी लुटेरे का आना नामुमकिन है, लेकिन आज का गजनवी दर्रों से नहीं, बल्कि डिजिटल नैरेटिव, वैचारिक कट्टरपंथ और आंतरिक फूट के रास्तों से घर के भीतर घुसने की कोशिश कर रहा है। आज भी जब बामियान में बुद्ध तोड़े जाते हैं या मध्य-पूर्व में प्राचीन विरासतें मलबे में तब्दील की जाती हैं तो यह अहसास होता है कि गजनवी मरा नहीं है, वह सिर्फ अपनी खाल बदलकर हमारे सामने खड़ा है।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया
इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए। स्वतंत्र भारत में जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, तब भी कुछ बुद्धिजीवियों के पेट में दर्द हुआ था। नवंबर 1947 में प्रभास पाटन के तट पर खड़े होकर सरदार पटेल ने कहा था कि यह अपमान को मिटाने का कार्य है। लेकिन, दुःखद यह है कि आजादी के बाद भी दशकों तक हमें अपनी ही विरासत के लिए अदालतों और दलीलों का सहारा लेना पड़ा। आज जब हम राम मंदिर या काशी विश्वनाथ का कायाकल्प देखते हैं तो यह केवल ईंट-पत्थर का जुड़ना नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक संप्रभुता की वापसी है, जिसे गजनवी जैसे लोग कुचलना चाहते थे।
एक और चुभता हुआ सवाल, हमने कभी प्रतिशोध नहीं लिया, यह हमारी महानता है या हमारी कमजोरी? हमने अपने मंदिर बनाए, लेकिन किसी की इबादतगाह नहीं उजाड़ी। हमने वसुधैव कुटुंबकम को जिया, लेकिन क्या दुनिया ने हमारी इस उदारता का सम्मान किया? सोमनाथ का इतिहास चीख-चीख कर कहता है कि शांति केवल शक्ति के साये में ही पल सकती है। अगर आप सशक्त नहीं हैं तो आपका सत्य भी मलबे में दबा दिया जाएगा।
भारत की कहानी भी सोमनाथ जैसी ही है
महमूद गजनवी ने सोचा था कि उसने सोमनाथ का अंत कर दिया। वह बेवकूफ था। वह भूल गया था कि सोमनाथ का अर्थ है सोम (चंद्रमा) का नाथ। चंद्रमा घटता है, पर मरता नहीं है। वह फिर से पूर्ण होता है। भारत की कहानी भी सोमनाथ जैसी ही है। हमने अपनी खोई हुई शक्ति वापस पा ली है, हमने अपनी राजनीतिक पहचान ढूंढ ली है और हमने अपने मंदिरों को फिर से गगनचुंबी बना लिया है।
वर्ष 2026 की यह सहस्राब्दी सिर्फ विजय का उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को यह याद दिलाने के लिए है कि असावधानी की कीमत क्या होती है? सोमनाथ के शिखर पर फहराती ध्वजा गवाह है कि आतंक अस्थाई है और आस्था शाश्वत, लेकिन यह ध्वजा हमसे पूछ रही है कि क्या अगली बार किसी गजनवी के आने पर हम फिर से 50 हजार बलिदानों का इंतजार करेंगे या आज का सशक्त भारत उसे सीमा पर ही मिट्टी में मिला देगा?
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