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आम फिर बौरा गए: इस वसंत आम्रमंजरी का संदेश, विश्व अद्भुत है लेकिन मनुष्य उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक
हजारी प्रसाद द्विवेदी, आलोचक
Published by: पवन पांडेय
Updated Fri, 23 Jan 2026 06:54 AM IST
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सार
हर साल वसंत पंचमी पर आम्रमंजरी (आम के बौर) को मेरी आंखें खोजती हैं। बचपन में सुना था कि वसंत पंचमी के पहले अगर यह दिख जाए, तो उसे हथेली पर रगड़ लेना चाहिए, क्योंकि ऐसी हथेली साल भर तक बिच्छू के डंक को आसानी से उतार देती है। वसंत पंचमी से पहले अगर आम्रमंजरी दिख जाती है, तो बिच्छू की याद अवश्य आ जाती है। सोचता हूं आम्रमंजरी और बिच्छू में क्या संबंध है?
इस वसंत आम्रमंजरी का संदेश
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
विद्वान (पंडित) लोग कहते हैं कि आम्र शब्द अम्र या अम्ल का रूपांतर है। अम्र अर्थात खट्टा। वैदिक आर्यों में इस फल की कोई विशेष कदर नहीं थी। लेकिन अमृत शब्द कुछ इसी अम्र के अम्रित (खट्टा बना हुआ) से बना-बिगड़ा होगा। बाद में आम्र संसार का सबसे मीठा फल और अम्रित ‘अमृत’ बन गया। अपना-अपना भाग्य है। शब्दों के भी भाग्य होते हैं। परंतु यह सब अनुमान ही अनुमान है। पर बिच्छू के साथ आम का संबंध चक्कर में डाल देने वाला जरूर है। मैं जब आम की मनोहर मंजरियों को देखता हूं, तब बिच्छू की याद आ जाती है। बिच्छू संसार का सबसे पुराना, खूसट, सबसे क्रोधी और दकियानूस जीव है। प्राय: मोहक वस्तुओं को देखकर मनहूस लोगों की याद आ ही जाती है।
जरा तुक मिलाइए। आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है और बिच्छू मदन विध्वंसी महादेव का अचूक बाण। परसाल भी मैंने वसंत पंचमी के पहले आम्र मुकुल देखे थे। पर वे बड़ी जल्दी मुरझा गए। उन्हें दोबारा फूलना पड़ा। मुझे बड़ा अद्भुत लगा। आगे-आगे क्यों फूलते हो बाबा, जरा रुककर ही फूलते। मेरे एक मित्र ने कहा कि नववधू के समान बेचारी यह आम्रमंजरी जरा-सा बाहर झांकने निकली और हमारे जैसे मनहूसों को देखकर लजा गई। यह उसकी कल्पना थी। पर अगर यह बात सच होती, तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहता। कालिदास ने इसी प्रकार आम्रमंजरी को सकुचाते देखा था। शकुंतला नाटक में वह उसका कारण भी बता गए हैं। उन्होंने इन्हें वसंत काल का ‘जीवितसर्वस्व’ कहा है। कामशास्त्र में सुवसंतक नामक उत्सव की चर्चा है। सरस्वती कंठाभरण में लिखा है कि सुवसंतक वसंतावतार के दिन को कहते हैं। वसंतावतार, यानी जिस दिन वसंत पृथ्वी पर अवतरित होता है। मात्स्यसूक्त और हरिभक्तिविलास ग्रंथों में इसी दिन को वसंत का प्रादुर्भाव दिवस माना गया है। इस दिन मदन देवता की पहली पूजा विहित है। यह भी अच्छा तमाशा है। जन्म हो वसंत का और उत्सव मदन देवता का। पर आम्रमंजरी व बिच्छू का चक्कर मुझे अब भी चक्कर में डाले हुए है।
कालिदास ने एक जगह आम्र कोरकों को यह आशीर्वाद दिलाया कि तुम कामदेव के पांच बाणों से अभ्यधिक बाण बनो। पर पंडित जी लोग कहते हैं कि इसका अर्थ है पांच बाणों में सबसे तीक्ष्ण। पुराणों की गवाही पर मान लिया जा सकता है कि असुरों की आखिरी हार अनिरुद्ध और ऊषा के विवाह के अवसर पर हुई थी। असुरों की ओर से भोलेनाथ का समूचा दल उमड़ पड़ा था। उनके दल में भूत-प्रेत, बेताल, पिशाच आदि थे, तो सांप व बिच्छू भी रहे होंगे। शिवजी श्रीकृष्ण से गुंथे थे, प्रद्युम्न अर्थात कामदेव स्कंद (देवसेनापति) से। भागवत में यह कथा विस्तार से बताई गई है। इस लड़ाई में असुर बुरी तरह हारे। शिवजी भी हारे। कैसे और कब प्रद्युम्न ने आम्रकोरकों का बाणसंधान किया और बेचारा बिच्छू परास्त हुआ। यह कहानी इतिहास में दबी रह गई, पर लोग जान गए हैं।
आम की मंजरी विधाता का वरदान है, पर आम का फल मनुष्य की बुद्धि का परिणाम। यह विशाल विश्व अद्भुत है, पर इसको समझने के लिए प्रयत्न करने वाला और इसे करतलगत करने के लिए जूझने वाला यह मनुष्य और भी आश्चर्यजनक है। आम्रमंजरी इसी अचरज का संदेश लेकर आती है। आशा करता हूं इस बार आम्रमंजरी को मुरझाना नहीं पड़ेगा। -‘आम फिर बौरा गए’ निबंध का अंश
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जरा तुक मिलाइए। आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है और बिच्छू मदन विध्वंसी महादेव का अचूक बाण। परसाल भी मैंने वसंत पंचमी के पहले आम्र मुकुल देखे थे। पर वे बड़ी जल्दी मुरझा गए। उन्हें दोबारा फूलना पड़ा। मुझे बड़ा अद्भुत लगा। आगे-आगे क्यों फूलते हो बाबा, जरा रुककर ही फूलते। मेरे एक मित्र ने कहा कि नववधू के समान बेचारी यह आम्रमंजरी जरा-सा बाहर झांकने निकली और हमारे जैसे मनहूसों को देखकर लजा गई। यह उसकी कल्पना थी। पर अगर यह बात सच होती, तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहता। कालिदास ने इसी प्रकार आम्रमंजरी को सकुचाते देखा था। शकुंतला नाटक में वह उसका कारण भी बता गए हैं। उन्होंने इन्हें वसंत काल का ‘जीवितसर्वस्व’ कहा है। कामशास्त्र में सुवसंतक नामक उत्सव की चर्चा है। सरस्वती कंठाभरण में लिखा है कि सुवसंतक वसंतावतार के दिन को कहते हैं। वसंतावतार, यानी जिस दिन वसंत पृथ्वी पर अवतरित होता है। मात्स्यसूक्त और हरिभक्तिविलास ग्रंथों में इसी दिन को वसंत का प्रादुर्भाव दिवस माना गया है। इस दिन मदन देवता की पहली पूजा विहित है। यह भी अच्छा तमाशा है। जन्म हो वसंत का और उत्सव मदन देवता का। पर आम्रमंजरी व बिच्छू का चक्कर मुझे अब भी चक्कर में डाले हुए है।
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कालिदास ने एक जगह आम्र कोरकों को यह आशीर्वाद दिलाया कि तुम कामदेव के पांच बाणों से अभ्यधिक बाण बनो। पर पंडित जी लोग कहते हैं कि इसका अर्थ है पांच बाणों में सबसे तीक्ष्ण। पुराणों की गवाही पर मान लिया जा सकता है कि असुरों की आखिरी हार अनिरुद्ध और ऊषा के विवाह के अवसर पर हुई थी। असुरों की ओर से भोलेनाथ का समूचा दल उमड़ पड़ा था। उनके दल में भूत-प्रेत, बेताल, पिशाच आदि थे, तो सांप व बिच्छू भी रहे होंगे। शिवजी श्रीकृष्ण से गुंथे थे, प्रद्युम्न अर्थात कामदेव स्कंद (देवसेनापति) से। भागवत में यह कथा विस्तार से बताई गई है। इस लड़ाई में असुर बुरी तरह हारे। शिवजी भी हारे। कैसे और कब प्रद्युम्न ने आम्रकोरकों का बाणसंधान किया और बेचारा बिच्छू परास्त हुआ। यह कहानी इतिहास में दबी रह गई, पर लोग जान गए हैं।
आम की मंजरी विधाता का वरदान है, पर आम का फल मनुष्य की बुद्धि का परिणाम। यह विशाल विश्व अद्भुत है, पर इसको समझने के लिए प्रयत्न करने वाला और इसे करतलगत करने के लिए जूझने वाला यह मनुष्य और भी आश्चर्यजनक है। आम्रमंजरी इसी अचरज का संदेश लेकर आती है। आशा करता हूं इस बार आम्रमंजरी को मुरझाना नहीं पड़ेगा। -‘आम फिर बौरा गए’ निबंध का अंश