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बजट 2026: उम्मीदों के पहाड़ पर घोषणाओं की बर्फबारी
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सार
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश वर्षों से 'ग्रीन बोनस' की मांग कर रहे हैं। उत्तराखंड का 71% और हिमाचल का करीब 68% क्षेत्र वन भूमि या इसके प्रभाव क्षेत्र में आता है।
वित्त मंत्री ने बजट भाषण के बाद प्रेस वार्ता की
- फोटो : यूट्यूब वीडियो ग्रैब- @पीआईबी
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विस्तार
हिमालयी राज्यों के लिए बजट केवल एक वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि उनकी कठिन भौगोलिक चुनौतियों और राष्ट्रीय पारिस्थितिकी में उनके योगदान के बदले मिलने वाला 'हक' होता है। बजट 2026 के पन्नों को जब हम उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सरोकारों की कसौटी पर कसते हैं, तो निराशा की एक गहरी रेखा उभरती है।
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चुनावी साल होने के बावजूद, केंद्र की पोटली से वह 'संजीवनी' गायब है जिसकी उम्मीद मुख्यमंत्री से लेकर सीमांत गांव के आखिरी व्यक्ति तक को थी।
'ग्रीन बोनस' और पारिस्थितिकी तंत्र की अनदेखी
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश वर्षों से 'ग्रीन बोनस' की मांग कर रहे हैं। उत्तराखंड का 71% और हिमाचल का करीब 68% क्षेत्र वन भूमि या इसके प्रभाव क्षेत्र में आता है। ये राज्य देश के 'फेफड़े' हैं, जो न केवल ऑक्सीजन देते हैं बल्कि उत्तर भारत की नदियों के जल संवर्धन का मुख्य स्रोत भी हैं। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार 33% वन अनिवार्य हैं, लेकिन ये राज्य अपनी क्षमता से दोगुना बोझ ढो रहे हैं। इस संरक्षण की कीमत ये राज्य 'विकास की बलि' देकर चुकाते हैं।
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वन कानूनों की जटिलता के कारण न तो यहां बड़े उद्योग लग पाते हैं और न ही बुनियादी ढांचा खड़ा हो पाता है। इस बजट में वित्त मंत्री ने 'नेट जीरो' और 'ग्रीन ग्रोथ' जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग तो किया, लेकिन हिमालयी वनों द्वारा दी जा रही 'इकोसिस्टम सर्विसेज' (पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं) का कोई आर्थिक मूल्यांकन नजर नहीं आया।
जब देश के अन्य हिस्से विकास की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब हिमालयी राज्यों को उनके संरक्षण के बदले वित्तीय प्रोत्साहन न देना एक बड़ा 'वित्तीय अन्याय' है। हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्य कर्ज के बोझ तले दबे हैं, ऐसे में ग्रीन बोनस की अनदेखी उनके अस्तित्व के साथ खिलवाड़ जैसी है।
आपदा प्रबंधन: मानकों में बदलाव की मांग अधूरी
हिमालयी राज्यों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ आपदा राहत के मानक आज भी मैदानी राज्यों जैसे ही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल में एक सड़क के बहने या पुल के टूटने पर निर्माण लागत मैदानों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक आती है।
पहाड़ों में निर्माण सामग्री ले जाने की ढुलाई और मशीनरी का खर्च अत्यधिक होता है, लेकिन केंद्र से मिलने वाली सहायता पुराने 'मैदानी ढर्रे' पर आधारित है। इस साल की आपदाओं में उत्तराखंड और हिमाचल को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ। जोशीमठ की दरारें हों या कुल्लू-मनाली की तबाही, पहाड़ का भूगोल बदल रहा है।
बजट में 'क्लाइमेट रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर' के लिए सामान्य फंड का प्रावधान तो है, लेकिन संवेदनशील गांवों के विस्थापन और उनके सुरक्षित पुनर्वास के लिए किसी 'विशेष पैकेज' का उल्लेख न होना दुखद है। यह जानते हुए भी कि पहाड़ 'क्लाइमेट चेंज' की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं, उन्हें पुराने मानकों के भरोसे छोड़ देना उनकी सुरक्षा से समझौता है।
पुरानी योजनाओं का नया पैकेट
अक्सर चुनावी साल में 'मेगा प्रोजेक्ट्स' की झड़ी लग जाती है, लेकिन उत्तराखंड के मामले में ऐसा कुछ नजर नहीं आता। बजट में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना और चारधाम ऑल वेदर रोड के लिए जो भी आवंटन हुआ है, वह पहले से स्वीकृत बजट की अगली किश्त मात्र है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का सपना तो कांग्रेस के जमाने से ही चल रहा है, जिसे अब केवल 'डबल इंजन' की रफ्तार का नाम दिया गया है। इसी तरह हिमाचल में भी सामरिक महत्व की भानुपाली-बिलासपुर रेल लाइन या रोहतांग टनल के बाद के प्रोजेक्ट्स पुराने ही हैं।
'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' के नाम पर सीमावर्ती गांवों में चमक-धमक की बात तो है, लेकिन वहां पलायन रोकने के लिए 'पहाड़ केंद्रित औद्योगिक नीति' का सर्वथा अभाव है। जब तक पहाड़ में रोजगार का कोई ठोस क्लस्टर नहीं बनेगा, तब तक चमकती सड़कें केवल पलायन करने वालों का रास्ता आसान करेंगी, उन्हें रोकेंगी नहीं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष और पर्यावरण असंतुलन
पहाड़ों में खेती छोड़ने का सबसे बड़ा और कड़वा कारण वन्यजीवों का आतंक है। गुलदार, बंदर और सुअर खेती को उजाड़ रहे हैं और इंसानी बस्तियों के लिए खतरा बन गए हैं। बजट के गुलाबी नारों के बीच उत्तराखंड और हिमाचल के किसानों को इस वन्यजीव संघर्ष से होने वाले नुकसान के लिए किसी 'विशेष फसल बीमा' या 'घेराबंदी कोष' की सौगात नहीं मिली।
विडंबना देखिए, केंद्र सरकार से मिलने वाला 'प्रति किलोमीटर ग्रांट' पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अपर्याप्त साबित हो रहा है। निर्माण लागत बढ़ने के कारण ठेकेदार काम छोड़ रहे हैं और योजनाएं अधर में लटकी हैं।
पर्यावरण असंतुलन से बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन इसके वैज्ञानिक समाधान या 'हिमालयी टास्क फोर्स' के लिए बजट में कोई अलग वित्तीय विजन दिखाई नहीं देता।
चुनावी गणित और हिमालयी राज्यों की 'चुप्पी'
यह सबसे कड़वा राजनीतिक सच है। चुनावी साल में अक्सर दिल्ली की तिजोरी उन राज्यों के लिए खुलती है जहां लोकसभा सीटों की संख्या बड़ी है या जहां गठबंधन की सरकारें 'सौदेबाजी' (Leverage) करने की स्थिति में होती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार या महाराष्ट्र जैसे राज्यों के वोट बैंक के सामने उत्तराखंड की 5 और हिमाचल की 4 सीटें दिल्ली के सत्ता गलियारों में वह गूँज पैदा नहीं कर पातीं।
यही कारण है कि 'डबल इंजन' के दावों और केंद्र में मजबूत प्रतिनिधित्व के बावजूद उत्तराखंड को उसकी भौगोलिक चुनौतियों के बदले केवल 'नियमित आवंटन' से संतोष करना पड़ा है। जब चुनावी वर्ष में भी सरकार की तिजोरी उत्तराखंड के लिए बंद रहे, तो यह सोचने का विषय है कि क्या हिमालयी राज्यों की आवाज दिल्ली तक सही ढंग से पहुँच भी रही है या नहीं?
मैदानी पैमानों से पहाड़ की नाप-जोख
बजट 2026 के पन्नों में हिमालय की ऊंचाई के चर्चे तो बहुत हैं, लेकिन उसकी गहराई में छिपी आपदाओं, पलायन और संसाधनों के अभाव की टीस को समझने वाला 'वित्तीय विजन' गायब है। विकास के 'मैदानी पैमानों' से पहाड़ की 'कठिन डगर' को नापना इस बजट की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक है।
यदि केंद्र सरकार वास्तव में हिमालय को बचाना चाहती है, तो उसे पहाड़ की समस्याओं को 'क्षेत्रीय' नहीं बल्कि 'राष्ट्रीय' समस्या मानकर विशेष वित्तीय स्वायत्तता देनी होगी। अन्यथा, घोषणाओं की यह बर्फबारी पहाड़ के दर्द को केवल ढक सकती है, उसे मिटा नहीं सकती।
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