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Union Budget 2026: मिडिल क्लास @2026, कम टैक्स, ज्यादा तरक्की? जानें क्या है बजट में

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 01 Feb 2026 02:20 PM IST
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सार

आयकर के मोर्चे पर सबसे बड़ी चर्चा 'स्टैंडर्ड डिडक्शन' और टैक्स स्लैब के पुनर्गठन की है। यदि हम पिछले वित्तीय वर्षों पर नजर डालें, तो पुरानी व्यवस्था में धारा 80सी के तहत ₹1.5 लाख की निवेश छूट और अन्य कटौती का लाभ मिलता था, लेकिन नई व्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने पिछले दो बजटों से निरंतर बदलाव किए हैं।

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संसद भवन पहुंची वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उनकी टीम - फोटो : ANI
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विस्तार
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भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में मध्यम वर्ग की भूमिका हमेशा से एक रीढ़ की हड्डी की तरह रही है। बजट 2026 के नए प्रावधानों को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सरकार अब कर व्यवस्था को जटिल रियायतों के जाल से बाहर निकालकर सीधे और सरल ढांचे की ओर ले जाना चाहती है।

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हालांकि, इसे पूरी तरह 'परोपकारी' कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह निश्चित रूप से 'सरलीकरण' की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस नीतिगत बदलाव का मूल उद्देश्य करदाता के हाथ में 'लिक्विड कैश' छोड़ना है, ताकि बाजार में मांग और खपत का चक्र बना रहे।
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पुरानी व्यवस्था की अनिवार्य बचत की तुलना में, यह नया ढांचा आधुनिक पीढ़ी को वित्तीय स्वतंत्रता के साथ खर्च करने और निवेश के नए रास्ते चुनने की स्वायत्तता प्रदान करता है। इस बजट में केवल आयकर दाताओं को ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों को भी करों के मोर्चे पर राहत देने की कोशिश की गई है, जो विकास की गति को संतुलित करने का प्रयास जान पड़ता है।

पिछली व्यवस्था और वर्तमान बदलाव का तुलनात्मक अध्ययन

आयकर के मोर्चे पर सबसे बड़ी चर्चा 'स्टैंडर्ड डिडक्शन' और टैक्स स्लैब के पुनर्गठन की है। यदि हम पिछले वित्तीय वर्षों पर नजर डालें, तो पुरानी व्यवस्था में धारा 80सी के तहत ₹1.5 लाख की निवेश छूट और अन्य कटौती का लाभ मिलता था, लेकिन नई व्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने पिछले दो बजटों से निरंतर बदलाव किए हैं।

पिछली बार मानक कटौती को ₹50,000 पर स्थिर रखा गया था, जिसे अब बढ़ाकर ₹75,000 करने का प्रस्ताव है। यह सीधे तौर पर वेतनभोगी वर्ग की कर योग्य आय को कम करता है। विशेषकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए यह ₹25,000 की अतिरिक्त कटौती महंगाई की मार के खिलाफ एक सुरक्षा कवच की तरह है।

टैक्स स्लैब की सीमाओं में विस्तार का उद्देश्य कर के दायरे को छोटा करना नहीं, बल्कि अनुपालन को इतना सरल बनाना है कि करदाता निवेश के कागजों के बजाय सीधे शुद्ध आय पर ध्यान केंद्रित कर सके। पिछले वर्षों में ₹7 लाख तक की आय पर छूट का जो प्रावधान था, उसे इस बार और अधिक व्यावहारिक बनाया गया है ताकि महंगाई के इस दौर में मध्यम वर्ग के पास खर्च करने योग्य राशि अधिक बचे।

टैक्स स्लैब का तर्कसंगत होना: किसे क्या मिला?

बजट 2026 में टैक्स स्लैब का निर्धारण इस तरह किया गया है कि मध्यम आय वर्ग के करदाताओं को तुलनात्मक रूप से अधिक लाभ मिले। पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि ₹9 लाख से ₹15 लाख के बीच की आय वाले लोग सबसे अधिक कर के बोझ तले दबे महसूस करते थे।

नए प्रावधानों के तहत दरों को इस तरह पुनर्गठित किया गया है कि इस आय वर्ग के लोगों के टैक्स लायबिलिटी में 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आने की संभावना है। तथ्यात्मक रूप से देखें तो, स्लैब की चौड़ाई बढ़ाने से ₹10 लाख की आय वाले व्यक्ति को अब पुरानी दरों के मुकाबले प्रभावी रूप से लगभग ₹15,000 से ₹20,000 तक की वार्षिक बचत हो सकती है।

यह राशि सीधे तौर पर मध्यम वर्ग की 'परचेजिंग पावर' को बढ़ाती है। सरकार का यह कदम आर्थिक सुस्ती के समय में 'डिमांड-साइड इकोनॉमिक्स' को मजबूती देता है, क्योंकि हाथ में अतिरिक्त पैसा होने पर मध्यम वर्ग ऑटोमोबाइल, होम अप्लायंसेज और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में निवेश करता है।

कॉर्पोरेट और एमएसएमई: उद्योगों को प्रोत्साहन

कर राहत का दायरा केवल व्यक्तिगत आयकर तक सीमित नहीं है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए भी इस बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं। पिछले बजटों में कॉर्पोरेट टैक्स की दरों में जो कटौती की गई थी, उसका विस्तार अब छोटे उद्यमियों तक पहुँचाने की कोशिश की गई है।

स्टार्टअप्स के लिए टैक्स हॉलिडे की अवधि को बढ़ाना और एंजेल टैक्स जैसे पेचीदा करों की समीक्षा करना इस वर्ग के लिए राहत भरी खबर है। यह न केवल व्यापार को आसान बनाता है, बल्कि रोजगार सृजन की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम है। विशेषकर उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए, जहां छोटे उद्योग अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं, ये रियायतें नई ऊर्जा का संचार कर सकती हैं।

पेंशनभोगियों और वरिष्ठ नागरिकों का पक्ष

वरिष्ठ नागरिकों के लिए पिछली व्यवस्थाओं में भी कुछ विशेष प्रावधान थे, लेकिन इस बजट में पारिवारिक पेंशन पर मिलने वाली कटौती की सीमा को बढ़ाना एक संवेदनात्मक सुधार है। तथ्यात्मक रूप से, पारिवारिक पेंशन पर मिलने वाली मानक कटौती को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 करने का प्रस्ताव है, जो उन विधवाओं और आश्रितों के लिए बड़ी राहत है जिनकी आय का एकमात्र स्रोत पेंशन है।

इसके अतिरिक्त, धारा 80 टीटी बी  के तहत ब्याज आय पर मिलने वाली ₹50,000 की मौजूदा छूट के दायरे को बढ़ाने की चर्चा भी इस वर्ग के लिए संजीवनी के समान है। चूँकि वरिष्ठ नागरिकों की एक बड़ी राशि सावधि जमा और डाकघर बचत योजनाओं में रहती है, इसलिए ब्याज पर कर-राहत उनके वास्तविक प्रतिफल को बढ़ाती है।

पेंशनभोगियों के लिए कर के बोझ को कम करना इस बात का संकेत है कि सरकार सामाजिक सुरक्षा के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझ रही है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज की कर-मुक्ति सीमा पर भी चर्चा तेज है, जो उन्हें गिरती ब्याज दरों के बीच एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है।

अप्रत्यक्ष करों का असर: आम आदमी की रसोई और बाजार

बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) और जीएसटी की विसंगतियों को दूर करना भी रहा है। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो, सरकार ने कैंसर की तीन प्रमुख दवाओं को सीमा शुल्क से पूरी तरह मुक्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिससे लाखों मरीजों के लिए इलाज की लागत में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

इसके साथ ही, मोबाइल फोन और चार्जर के निर्माण में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण पुर्जों (जैसे पीसीबीए और कैमरा मॉड्यूल) पर शुल्क को घटाकर 15 प्रतिशत किया गया है, जो भारत को 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। कैंसर की दवाओं, कुछ मोबाइल पुर्जों और बिजली के उपकरणों पर सीमा शुल्क में कटौती का सीधा असर बाजार की कीमतों पर पड़ता है।

यह उन वर्गों को राहत देता है जो सीधे आयकर के दायरे में नहीं आते, लेकिन महंगाई की मार सबसे ज्यादा झेलते हैं। इसी कड़ी में, सोने और चांदी पर आयात शुल्क को घटाकर 6 प्रतिशत के स्तर पर लाना एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। इससे न केवल घरेलू बाजार में इन कीमती धातुओं की तस्करी पर लगाम लगेगी, बल्कि शादियों के सीजन में मध्यम वर्ग के लिए निवेश और खरीदारी सुलभ होगी।

सोने और चांदी पर आयात शुल्क की समीक्षा करना भी एक ऐसा कदम है जिसने न केवल मध्यम वर्ग को निवेश का अवसर दिया है, बल्कि आभूषण उद्योग से जुड़े लाखों कारीगरों को भी राहत पहुंचाई है, जिससे जेम और ज्वेलरी एक्सपोर्ट सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

एक संतुलित दृष्टिकोण: चुनौतियां और संभावनाएं

यह देखना आवश्यक है कि क्या ये रियायतें पर्याप्त हैं? करों में छूट देना एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह जनता को राहत देती है, तो दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे को बढ़ाने का जोखिम भी पैदा करती है। सरकार ने इस बजट में विकास और राजकोषीय अनुशासन के बीच एक महीन संतुलन बनाने की कोशिश की है।

पुरानी व्यवस्था से नई व्यवस्था की ओर करदाताओं को मोड़ना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि भारतीय समाज में निवेश के जरिए कर बचाने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है। नई व्यवस्था में निवेश पर मिलने वाली छूटों का न होना भविष्य की बचत आदतों को प्रभावित कर सकता है, जिस पर नीति निर्माताओं को गहन विचार करने की आवश्यकता है।

समावेशी विकास की ओर बढ़ते कदम

कुल मिलाकर, बजट 2026 के टैक्स प्रावधान किसी एक वर्ग को खुश करने के बजाय पूरी अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किए गए लगते हैं। मध्यम वर्ग को मिली आयकर राहत, उद्योगों को मिले प्रोत्साहन और आम आदमी के लिए सस्ती दवाओं व वस्तुओं का प्रावधान, एक समावेशी सोच को दर्शाता है।

हालांकि, इन सुधारों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब इनका कार्यान्वयन प्रभावी ढंग से हो और मुद्रास्फीति करों में मिली राहत को निगल न जाए। यह बजट एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करने का प्रयास है जहां कर व्यवस्था बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में एक सहज भागीदारी बन सके।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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