बजट में रेल कनेक्टिविटी और मुंबई: बड़े वादे, पुराना अनुभव और ज़मीनी हकीकत
रेल कनेक्टिविटी का अर्थ केवल तेज़ ट्रेनें चलाना नहीं होता। इसका अर्थ यह भी होता है कि आख़िरी व्यक्ति तक यात्रा कितनी सुरक्षित, सुलभ और भरोसेमंद है। भारत जैसे देश में, जहां रेलवे आम आदमी की यात्रा का सबसे बड़ा साधन है, वहां कनेक्टिविटी का सवाल केवल प्रीमियम सेवाओं तक सीमित नहीं रह सकता।
विस्तार
संचार और परिवहन ने दुनिया को एक तरह से गांव में तब्दील कर दिया है। आज किसी देश की सीमाएं उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रह गई हैं, जितनी उसकी कनेक्टिविटी। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के हर स्तर पर संचार और परिवहन की भूमिका बुनियादी होती है। बेहतर परिवहन न केवल नागरिकों को एक-दूसरे से जोड़ता है, बल्कि बाज़ारों, अवसरों और संसाधनों को भी आपस में जोड़ता है। यही कारण है कि किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में परिवहन ढांचे को विकास की रीढ़ माना जाता है।
इसी महत्व को रेखांकित करते हुए देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने नौवें बजट में परिवहन सेवाओं, विशेष रूप से रेलवे, पर विशेष ध्यान दिया है। बजट भाषण और दस्तावेज़ों में रेलवे को भविष्य की कनेक्टिविटी का आधार बताया गया है। काग़ज़ पर यह विज़न दूरदर्शी और दूरगामी दिखाई देता है। लेकिन जब इस विज़न को पिछले अनुभवों और ज़मीनी हकीकत के संदर्भ में परखा जाता है, तो कई सवाल उभरकर सामने आते हैं। शायद यही कारण है कि आम आदमी अब इस तरह की बड़ी घोषणाओं को लेकर बहुत उत्साहित नहीं होता।
बजट में रेलवे के लिए जिस सोच को प्रस्तुत किया गया है, उसका केंद्र तेज़ रफ़्तार और बड़े कॉरिडोर हैं। मुंबई–पुणे, पुणे–हैदराबाद, हैदराबाद–बेंगलुरु, हैदराबाद–चेन्नई, चेन्नई–बेंगलुरु, दिल्ली–वाराणसी और वाराणसी–सिलीगुड़ी जैसे सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा इसी सोच का हिस्सा है। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं से बड़े शहरों और आर्थिक केंद्रों के बीच यात्रा समय घटेगा और व्यापार तथा निवेश को नई गति मिलेगी। सिद्धांत रूप में यह सोच आकर्षक लगती है, क्योंकि बेहतर रेल कनेक्टिविटी औद्योगिक विकास का एक अहम कारक मानी जाती है।
लेकिन रेल कनेक्टिविटी का अर्थ केवल तेज़ ट्रेनें चलाना नहीं होता। इसका अर्थ यह भी होता है कि आख़िरी व्यक्ति तक यात्रा कितनी सुरक्षित, सुलभ और भरोसेमंद है। भारत जैसे देश में, जहां रेलवे आम आदमी की यात्रा का सबसे बड़ा साधन है, वहां कनेक्टिविटी का सवाल केवल प्रीमियम सेवाओं तक सीमित नहीं रह सकता। असली परीक्षा इस बात की होती है कि रोज़ाना यात्रा करने वाला व्यक्ति कितना सहज महसूस करता है और उसकी समस्याओं को कितनी प्राथमिकता दी जाती है।
जब इस बजट को रेल कनेक्टिविटी के व्यापक संदर्भ में देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी सरल और आश्वस्त करने वाली नहीं लगती। पिछले 11–12 वर्षों के अनुभव यह बताते हैं कि घोषणाओं और ज़मीनी कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा अंतर लगातार बना हुआ है। योजनाएं घोषित होती हैं, शिलान्यास होते हैं, लेकिन समयबद्ध और पूर्ण क्रियान्वयन अक्सर सवालों के घेरे में रहता है। यही अनुभव लोगों को नए वादों के प्रति सशंकित बनाता है।
मुंबई जैसे महानगर के संदर्भ में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है। मुंबई की लोकल ट्रेनें यहां के जीवन की धड़कन कही जाती हैं। हर दिन करोड़ों लोग इन्हीं ट्रेनों के सहारे अपने घरों और कार्यस्थलों के बीच सफ़र करते हैं। लेकिन भीड़, देरी, प्लेटफ़ॉर्म की सीमित क्षमता, सिग्नल सिस्टम की तकनीकी समस्याएं और सुरक्षा से जुड़े जोखिम, ये सब आज भी मुंबई की रेल कनेक्टिविटी की पहचान बने हुए हैं। ऐसे में हाई-स्पीड रेल जैसी परियोजनाएं तब तक अधूरी लगती हैं, जब तक मौजूदा नेटवर्क को मज़बूत करने पर उतना ही ज़ोर न दिया जाए।
बजट में प्रस्तावित मुंबई-पुणे हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुंबई और पुणे जैसे दो प्रमुख आर्थिक केंद्रों के बीच तेज़ रेल संपर्क उद्योग, शिक्षा और सेवा क्षेत्र में नई संभावनाएँ खोल सकता है। इससे दोनों शहरों के बीच आवागमन आसान होगा और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन मुंबई की वास्तविक समस्या केवल दूसरे शहरों से जुड़ाव की नहीं है, बल्कि शहर के भीतर की रेल व्यवस्था की है, जो वर्षों से दबाव में है।
यही वह बिंदु है जहाँ बजट की प्राथमिकताओं पर सवाल उठते हैं। क्या बड़े और महंगे प्रोजेक्ट नीति-निर्माण का केंद्र बनते जा रहे हैं, जबकि दैनिक यात्रियों की समस्याएं हाशिए पर चली जा रही हैं? आम यात्री के लिए यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि उसका सीधा सरोकार सुरक्षित और समय पर घर पहुंचने से है, न कि भविष्य की किसी हाई-स्पीड ट्रेन से, जिसका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुंच सकता है।
इस आलोचना को और मज़बूती सरकार के पिछले रिकॉर्ड से मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुलेट ट्रेन परियोजना की घोषणा करते समय कहा था कि भारत में 2022 तक बुलेट ट्रेन चलने लगेंगी। आज उस समय-सीमा के काफ़ी आगे निकल जाने के बाद भी, बुलेट ट्रेन परियोजना की प्रगति को देखकर यह नहीं लगता कि मौजूदा कार्यकाल में यह सपना साकार हो पाएगा। ऐसे में नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणाएँ स्वाभाविक रूप से संदेह के घेरे में आ जाती हैं।
रेल कनेक्टिविटी का सवाल केवल भविष्य की तेज़ ट्रेनों से नहीं जुड़ा है, बल्कि वर्तमान की विश्वसनीय व्यवस्था से भी जुड़ा है। बजट में फ्रेट कॉरिडोर और माल ढुलाई पर ज़ोर देना आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे लॉजिस्टिक्स सुधर सकता है और उद्योगों को लाभ मिल सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर मुंबई जैसे बंदरगाह और व्यापारिक शहरों पर पड़ेगा। लेकिन यात्री कनेक्टिविटी, खासकर शहरी और उपनगरीय रेल सेवाओं की गुणवत्ता, अब भी नीति-निर्माण में अपेक्षित स्थान पाती नहीं दिखती।
कुल मिलाकर, यह बजट रेलवे और रेल कनेक्टिविटी के लिए बड़े दावे और आकर्षक विज़न पेश करता है। लेकिन किसी भी विज़न की सफलता उसकी घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से तय होती है। मुंबई जैसे शहरों के लिए तेज़ रफ़्तार के सपनों से ज़्यादा ज़रूरी है एक ऐसी रेल कनेक्टिविटी, जो सुरक्षित, सुलभ, किफ़ायती और भरोसेमंद हो। जब तक नीति का केंद्र आम यात्री की रोज़मर्रा की यात्रा नहीं बनता, तब तक रेल बजट से जुड़े बड़े वादे ज़मीनी बदलाव का भरोसा नहीं जगा पाएँगे। यही कसौटी किसी भी बजट की असली सफलता तय करती है।
