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Mark Tully: मार्क टुली ने जैसे भारत को देखा, हिंदी में रची-बसी संस्कृति को विश्व स्तर तक पहुंचाने का सफर

डॉ. राजेश कुमार व्यास Published by: शुभम कुमार Updated Sun, 01 Feb 2026 06:59 AM IST
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सार

भारतीय कलाओं और उनमें गूंथी गहन भारतीय दृष्टि को वैश्विक पहचान दिलाने का जो काम आजादी से पहले आनंद कुमार स्वामी ने जो किया, उसे आजादी के बाद मार्क टुली ने आगे बढ़ाया।

Mark Tully India through the eyes The journey of taking a culture deeply rooted in Hindi to a global level
मार्क टुली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मार्क टुली हिंदी हिमायती थे। भारतीय संस्कृति, परंपराओं और इसकी बहुलता में रचे-बसे लोगों में उनकी गहरी आस्था थी। इसीलिए भारतीयता को सही परिप्रेक्ष्य में अनुभूत कर वैसे ही विश्वस्तर पर पहुंचाने का काम उन्होंने किया। वह लिखते अंग्रेजी मे थे, पर उसमें सुगंध हिंदी और उसमें रचे-बसे बहुसंख्य जनमानस की सोच की घुली होती थी। अपने लिखे और कहे में बार-बार वह यह जताते भी रहे कि इस देश की कमजोरी हिंदी के प्रति हीन भाव है। पर, यह भाषा शक्तिशाली है।

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इसीलिए उन्होंने एक जगह लिखा है, आरंभ में ब्रिटिश राजनयिकों ने अंग्रेजी की सेवाओं को ही सदा महत्व दिया। पर, हिंदी सेवा को प्रभावशाली होते देख उसे बाद में फिर कोई अनदेखा भी नहीं कर सका। कोलकाता के टॉलीगंज में वह जन्मे। बचपन में उन्होंने हिंदी सीखने की कोशिश की, पर उन्हें इससे रोका गया। बाद में जब पत्रकारिता में वह आए तो उन्हें लगा, भारत के बारे में विश्वनीयता से विश्वभर को रेडियो के जरिए बताना है तो हिंदी को समझना जरूरी है। इसलिए अखबार पढ़ लिखकर उन्होंने हिंदी सीखी।
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बीबीसी में उनके लिखे की हिंदी प्रस्तुति निरंतर सुनी। इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि उनकी पत्रकारिता सूचना देने भर से या कि सूचना देने के उत्तेजित ढंग में निहित नहीं थी। वह बड़ी से बड़ी खबर के साथ बेहद सधे-संयमित रूप में सुनने वालों को अपरोक्ष उससे जुड़ी भारतीय विचार विरासत से जोड़ते थे। पत्रकारिता में अंग्रेजी माध्यम की समझ के बजाय उन्होंने भारत में रहने वालों के सोचने-विचारने को ध्यान में रखकर उसे स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।

मुझे यह भी लगता है, भारतीय कलाओं और उनमें गूंथी गहन भारतीय दृष्टि को वैश्विक पहचान दिलाने का जो काम आजादी से पहले आनंद कुमार स्वामी ने किया, उसे आजादी के बाद मार्क टुली ने आगे बढ़ाया। भारत को उसकी बहुलता में, उसकी उदात्त दृष्टि में, उससे जुड़ी आंतरिक समृद्धता में दुनिया तक उन्होंने ही विश्वसनीयता से पहुंचाया। उन्हें सुनना और बाद में उनकी भारत केन्द्रित अनुभवपरक लिखी पुस्तकों को पढ़ना इसलिए भाता रहा है कि वहां पत्रकारिता की अपनी स्थापना के आग्रह नहीं है।

मसलन उनकी लिखी पुस्तकों 'इण्डिया इन स्लो मोशन'; 'नो फुल स्टोप्स इन इण्डिया' में स्पष्ट इस बात को रेखांकित किया गया है कि पश्चिमी सोच, आधुनिकता, विकास और सुधार के नाम पर यहां का अभिजात वर्ग नहीं चाहता कि यह देश अपनी भाषा, परंपराओं और संस्कृति से जुड़ा रहे। परंतु यहां का जन-मानस जड़त्व लिए नहीं है। यह देश इतना उदार, खुलापन लिए है कि निरंतर नया होता रहता है। यह महज संयोग नहीं है कि आनंद कुमार स्वामी ने भी कभी यहां की कलाओं और भारतीय दृष्टि को लेकर यही कहा था कि भारत में नवीनता नवीन बनाने में नहीं है, नवीन होने में है।

मार्क टुली ने भारत को इसी दृष्टिकोण से समझा-परखा। इसलिए वह बार-बार अपने कहे में और लिखे में इस बात पर चिंता और पीड़ा जताते रहे हैं कि अंग्रेजी भाषा के प्रति अतिरिक्त मोह से भारत अपनी परंपराओं और संस्कृति से पूर्ण विकास की ओर आगे नहीं बढ़ रहा है।

केन्या के उपन्यासकार, नाटककार एवं निबंधकार न्गुगी वा थ्योंगो अंग्रेजी में लिखते थे। इस लिखे में उनका नाम कभी जेम्स न्गुगी रहा है, पर एक अरसे बाद उन्हें जब यह समझ आया कि अपनी भाषा से विलग होना कितनी बड़ी त्रासदी है, तो उन्होंने अपनी मातृभाषा गिकुयू में लिखना ही प्रारंभ नहीं किया, बल्कि अपना नाम भी बदल लिया। बाकायदा तब उन्होंने अपने अनुभवों में लिखा, 'किसी देश को हड़पना हो तो उसकी भाषा हड़प लेनी चाहिए। भाषा ही वह मुख्य माध्यम है, जिसके द्वारा औपनिवेशिक सत्ता आत्मा को बंदी बनाती है।'  मार्क टुली शायद यह समझते थे इसीलिए उन्होंने पत्रकारिता में हिंदी सीखी। इसीलिए उनकी खबरें पश्चिम की सोच से जुड़ी, औपनिवेशिक सत्ता की बंदी नहीं बनी।

भारतीय दृष्टि उनमें थी, इसीलिए वह इस बात को लेकर आश्वस्त भी थे कि विविधता में एकता लिए भारत विकास की ओर आगे बढ़ता रहेगा। पर, उनका स्पष्ट यह भी कहना था कि विकास के बड़े अवरोधों में अंग्रेज राज की वह बाबूगिरी प्रणाली है जो अब तक यहां चल रही है। एक दफा उनसे संवाद हुआ तो उन्हें गहरे से जाना, और जानने का कौतुक जगा। याद है, उनसे तब हिंदी में भी बहुत सारी बातें हुई। इन बातों में उनकी कही यह बात अभी भी जहन में कौंध रही है कि इस देश के लिए यह शर्म की बात है कि मैं जब कभी किसी से हिंदी में बात करने की कोशिश करता हूं तो वह जवाब अंग्रेजी में देता है।

भारत से मार्क टुली को गहरा लगाव था। इसलिए भी कि वह यह मानते थे कि उन्हें भारत में बहुत प्यार मिला और इसलिए भी कि उनकी यह सोच थी कि भारत ने उन्हें बनाया। बार-बार वह यह कहना नहीं भूलते थे कि मैं खुशकिस्मत था कि भारत ने मुझे अपनाया। हिंदी बोलने वालों को अपने आपको हीन समझने को लेकर उनको बहुत पीड़ा होती थी। इसीलिए उन्होंने निंरतर यह भी कहा, 'हिंदी बोलने वालों का आत्मविश्वास बढ़ना चाहिए। इस देश की कमजोरी का सबूत अभी भी हिंदी की दुर्दशा है। लोग अभी भी शासन में भारतीय संस्कृति को इज्जत नहीं देते हैं।

अभी तक यहां अंग्रेजी की बुनियाद बनी हुई है। इसीलिए भारत ने अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं किया।' उनका यह भी कहना था कि चीन ने बहुत विकास किया है, पर चीन और भारत की तुलना गलत है। चीन में बहुत जुल्म हुआ। भारत में एक आपातकाल को छोड़कर कभी मानवीय मूल्यों की हत्या नहीं हुई। भारत में लोकतंत्र है, इसीलिए भारत की तुलना न ब्रिटेन से न अमेरिका से न किसी दूसरे यूरोपीय देश से की जानी चाहिए। भारत का अपना मौलिक वजूद है।

भारत और भारतीयता की यह मौलिक दृष्टि ही मार्क टुली की विशेषता थी। वह भारत के नहीं थे, पर भारत को उसके मूल स्वरूप में उन्होंने जितना समझा, यहां की उदात्त परंपराओं और संस्कृति के आलोक में इस देश को जिस ढंग से उन्होंने विश्वभर में पहुंचाया, उसके हम सदा ऋणी रहेंगे।

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