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गांधी जी की 150वीं सालगिरह पर देश देखेगा उपेन्द्र महारथी का कला संसार, पीएम मोदी कर सकते हैं उद्घाटन

Tue, 18 Jun 2019 01:37 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Tue, 18 Jun 2019 01:37 PM IST
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upendra maharathi artist exhibition national gallery of modern art 150th anniversary of gandhi
उपेन्द्र महारथी ओडिशा में जन्में और बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाया। - फोटो : Social Media

जब भी हम भारतीय कला के तमाम आयामों और विकास यात्रा की चर्चा करते हैं, उपेन्द्र महारथी के योगदान को कभी भूल नहीं सकते। बेशक महारथी आज की पीढ़ी के नौजवान या कला से जुड़े तमाम लोगों के लिए एक अनजाना सा नाम हो, लेकिन जब आप उनकी कला यात्रा के हर पहलू से रू-ब-रू होते हैं तो लगता है मानो किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गए हों। उसमें यशोधरा की पीड़ा है, समुद्रगुप्त के किस्से हैं, शिव और पार्वती का सौंदर्य है, मौर्यकाल की कला चेतना है, गौतम बुद्ध का दर्शन भी है और महात्मा गांधी की दृष्टि भी।

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उपेंद्र महाराथी और गांधी जी 
गांधी जी पर काम करने वाले कलाकारों की देश में कमी नहीं है, लेकिन जिस कलाकार ने गांधी जी को करीब से देखा, उनके दर्शन को समझा और उन्हें गौतम बुद्ध से जोड़ा, वह उपेन्द्र महारथी ही हैं। 1940 में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन के दौरान जिस 32 साल के नौजवान कलाकार ने पूरे अधिवेशन स्थल पर अपनी शानदार पेंटिंग्स और कलाकृतियों के जरिये भारत के गौरवशाली इतिहास और परंपराओं को जीवंत कर दिया था, वह उपेन्द्र महारथी ही थे।
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दरअसल, पूरे परिसर को इस अकेले कलाकार ने डिजाइन किया और वहां अपने देश के बहुआयामी लोककला और संस्कृति की एक नई दुनिया बसा दी। इसी दौरान महारथी ने गांधी जी को बहुत करीब से देखा, उनकी भाव भंगिमाएं पकड़ीं और उनके तमाम जीवंत चित्र बना डाले।
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upendra maharathi artist exhibition national gallery of modern art 150th anniversary of gandhi
नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (जयपुर हाउस) गांधी जी के जन्म की 150वीं सालगिरह को बेहद कलात्मक तरीके से मना रहा है। - फोटो : Social Media

गांधी जी के जन्म की 150वीं सालगिरह और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट
नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (जयपुर हाउस) गांधी जी के जन्म की 150वीं सालगिरह को बेहद कलात्मक तरीके से मना रहा है। तमाम कला प्रदर्शनियों के ज़रिये गांधी जी को अलग-अलग अंदाज़ में पेश किया जा रहा है। लेकिन इन सबसे एकदम अलग इसी कड़ी में सबसे अहम आयोजन हो रहा है उपेन्द्र महारथी के वृहद कला संसार के रूप में।

महारथी की कला के विविध आयामों को पूरी गैलरी में कुछ इस कदर उतारा गया है मानों आप उसी कालखंड में पहुंच गए हों। इसके लिए एनजीएमए के महानिदेशक अद्वैत गणनायक ने खुद महीनों मेहनत की और महारथी के संसार को अपनी विशाल गैलरी में पुनर्जीवित कर दिया। अद्वैत खुद एक कलाकार हैं और हर कलाकार के काम को बारीकी से समझते भी हैं।

अद्वैत गणनायक और उपेंद्र महारथी 
उपेन्द्र महारथी को पहले अद्वैत भी ठीक से नहीं जानते थे, लेकिन जब उन्होंने पटना में उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान को देखा और उनके बारे में पहले की गई एनजीएमए की पहल के बारे में जाना तो तय कर लिया कि अब उपेन्द्र महारथी के कला संसार की पूरी परिकल्पना को साकार कर देंगे। खामोशी से अपना काम करने वाले अद्वैत गणनायक ने उपेन्द्र महारथी की विरासत को आगे बढ़ा रही उनकी बेटी महाश्वेता महारथी के साथ मिलकर उनके पूरे कला संसार को ज़मीन पर उतार दिया है।    

जब भी आप बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट्स की बात करेंगे तो पाएंगे कि उसकी आत्मा कहीं न कहीं भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन,उससे जुड़ी शख्सियतों और उनके दर्शन से बेहद प्रभावित है। कोलकाता स्कूल ऑफ आर्ट्स ने उपेन्द्र महारथी को इस दर्शन से जोड़ा और उस आंदोलन और चिंतन की कलात्मक अभिव्यक्ति की ओर प्रेरित किया।

उपेन्द्र महारथी 1908 में ओड़िसा के पुरी जिले में जन्में, कोलकाता स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़े और बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाई। इसलिए उनकी कला में कलिंग की संस्कृति है, बौद्ध काल की झलक है और भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन के नायकों से जुड़ा दर्शन है।

upendra maharathi artist exhibition national gallery of modern art 150th anniversary of gandhi
गांधी जी की 150वीं साहगिरह पर देश के सामने होगा उपेन्द्र महारथी का कला संसार - फोटो : Social Media

मधुबनी आर्ट से लेकर बावनबूटी साड़ी तक
उपेन्द्र महारथी के कला संसार में कला और शिल्प के वो तमाम रूप हैं जो हमारी समृद्ध परंपराओं के साथ-साथ लोकशैली के बारीक कामों की झलक देती है। यहां मधुबनी की पारंपरिक पेंटिंग कला के साथ साथ महारथी ने साड़ी बुनने की एक नई तकनीक और कला विकसित की – बावनबूटी। आप बावनबूटी साड़ी देखेंगे तो उसकी बूटियों के विविध रूपों को देखकर दंग रह जाएंगे। यह उपेन्द्र महारथी की ही देन है। फरवरी 1981 में 73 साल की उम्र में जब उपेन्द्र महारथी का निधन हुआ तो उनके पीछे उनकी कला और शिल्प का एक विशाल संसार था।

उपेन्द्र महारथी एक बेहतरीन शिल्पकार और वास्तु शिल्पी (आर्किटेक्ट) थे। बिहार के राजगृह (राजगीर) के मशहूर विश्व शांति स्तूप से लेकर जापान के गोटेम्बा पीस पगोडा की डिजाइन उपेन्द्र महारथी ने बनाई। बोधगया का मशहूर महाबोधि मंदिर हो,नालंदा का नव नालंदा महाविहार हो, वैशाली म्युजियम हो या बोध गया का गांधी मंडप- ये सभी उपेन्द्र महारथी की देन हैं।

एनजीएमए के खज़ाने में दर्ज है उपेन्द्र महारथी का संसार 
एनजीएमए के खज़ाने में 1996 से महारथी के करीब 900 बेहतरीन कलाकृतियां, वास्तुशिल्प और उनके तमाम काम मौजूद थे,लेकिन इस महान कलाकार को फिर भी कोई उतनी ख्याति नहीं मिल पाई। अद्वैत गणनायक ने इस खजाने से महारथी को बाहर निकाला और अब एनजीएमए का एक बड़ा हिस्सा उनके लिए समर्पित कर दिया।

अद्वैत बताते हैं कि जितना संभव है,उन्होंने खुद ही दिन रात लगकर इस काम को पूरा किया है और वो चाहते हैं कि उपेन्द्र महारथी की ही तरह ऐसे तमाम कलाकारों के काम को वो एक बड़ा आयाम दे सकें और उन्हें नई पीढ़ी के कलाकारों और कलाप्रेमियों के बीच ला सकें।

उपेन्द्र महारथी का परिवार 
उपेन्द्र महारथी की बेटी महाश्वेता महारथी के मुताबिक महारथी की हर पेंटिंग और हर कला के पीछे एक लंबी कहानी है और एक इतिहास है। महाश्वेता जी बताती हैं कि अब पहले वाली बात तो रही नहीं, कला में भी सियासत और खेमेबाज़ी का बोलबाला दिखता है। लेकिन हमलोग अब भी पूरी शिद्दत के साथ लगे हैं कि महारथी जी के काम को आगे बढ़ाएं और नई पीढ़ी को इससे जोड़कर रखें।

इसके लिए संस्थान में लगातार लोक कलाओं से लेकर तमाम हुनरमंदों के लिए नये-नये कार्यक्रम चलाए जाते हैं और उसका विस्तार हो रहा है। एनजीएमए ने उपेन्द्र महारथी को जो ये सम्मान दिया है, बेशक हम इसके लिए खासकर गणनायक जी जैसे संवेदनशील कलाकार के शुक्रगुजार हैं।

अभी इस प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन होना है और इसके लिए प्रधानमंत्री के वक्त का इंतजार किया जा रहा है। नये संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल इसे देखकर पहले ही अभिभूत हो चुके हैं और एनजीएमए की इस पहल को अद्भुत बता चुके हैं।

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