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यह गतिरोध टूटे: लोकतंत्र में जीत केवल विधेयक पारित कराने में नहीं, असहमति के बावजूद, सहमति का रास्ता खोजने में

Sat, 08 Aug 2026 09:16 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 08 Aug 2026 09:16 AM IST
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Break deadlock in parliament Victory in democracy is not just about passing bills finding consensus  vital
लोकसभा में विपक्ष का हंगामा - फोटो : ANI

संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहां सरकार और विपक्ष के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और सांविधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए। लेकिन, मानसून सत्र में जिस तरह से लगातार गतिरोध बना हुआ है और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच बातचीत के किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंचने के चलते दोनों सदन सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिए गए हैं, तो यह न केवल सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ती दूरी का संकेत है, बल्कि संसदीय कार्यप्रणाली के लिए भी चिंताजनक है।


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उल्लेखनीय है कि विपक्ष चाहता है कि संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस की कार्रवाई पर सदन में चर्चा हो और गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर जवाब दें। इसके अतिरिक्त, कथित राम मंदिर चंदा चोरी के मामले पर भी चर्चा के लिए विपक्ष अड़ा है। इस बीच विपक्ष ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए), महिला आरक्षण और परिसीमन संबंधी विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक की भी मांग की है। लेकिन, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या किसी विषय पर चर्चा की मांग को संसद की पूरी कार्यवाही रोकने की शर्त से जोड़ना उचित संसदीय परंपरा है?

सरकार को घेरने के लिए कई अन्य लोकतांत्रिक माध्यम भी उपलब्ध हैं। संसद की कार्यवाही रोकना अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। सदन का सुचारु संचालन सरकार और विपक्ष, दोनों के कंधों पर होता है, ऐसे में, दोनों पक्षों की यह जिम्मेदारी भी है कि वे असहमति को सदन के कामकाज में बाधा का स्थायी कारण न बनने दें। संसद का समय केवल सांसदों का नहीं, बल्कि देश के करदाताओं और नागरिकों का भी है।

हर मिनट की कार्यवाही के पीछे सार्वजनिक धन खर्च होता है और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संसद की निष्क्रियता के कारण अनेक विधायी और जनहित के मुद्दे लंबित रह जाते हैं। लगातार व्यवधान की संस्कृति अंततः सरकार से ज्यादा लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाती है। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो रहा है। लिहाजा, अगला हफ्ता बेहद अहम होने वाला है। अगर यह सत्र इसी तरह शोर-शराबे और हंगामे के बीच समाप्त होता है, तो यह सरकार और विपक्ष, दोनों की विफलता होगी।

इसलिए, अब भी समय है कि दोनों पक्ष राजनीतिक जिद से ऊपर उठते हुए टकराव के बजाय संवाद को प्राथमिकता दें। संसद चलेगी, तभी सरकार से सवाल होंगे, विपक्ष अपनी बात रख सकेगा और जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक निर्णय हो सकेंगे। लोकतंत्र में जीत केवल विधेयक पारित कराने में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद, सहमति का रास्ता खोजने में होती है।

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