जानना जरूरी है: लवणासुर और शिव का त्रिशूल, श्रीराम की आज्ञा पाकर शत्रुघ्न ने कैसे किया वध?
मधु दैत्य के पुत्र लवणासुर के पास शिवजी का अजेय त्रिशूल था। ऋषियों के आग्रह पर श्रीराम की आज्ञा पाकर शत्रुघ्न ने उसका वध किया।
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प्राचीन समय में मधु दैत्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और उनसे एक दिव्य त्रिशूल प्राप्त कर लिया। मधु चाहता था कि वह त्रिशूल सदैव उसके वंश में रहे, परंतु महादेव ने मधु से कहा, ‘तुम्हारे एक पुत्र के पास यह शूल रहेगा और जब तक उसके पास शूल होगा, वह अवध्य रहेगा।’ बाद में मधु ने वह शूल अपने पुत्र लवणासुर को सौंप दिया और स्वयं समुद्र के भीतर रहने लगा। लवणासुर बहुत क्रूर था। शिवजी के त्रिशूल के चलते कोई उसे मार नहीं पाता था। इस कारण वह निरंकुश और अत्याचारी हो गया।
लवणासुर के आतंक से दुखी होकर ऋषि-मुनि, श्रीराम के पास सहायता मांगने पहुंचे, तो उनकी व्यथा सुनकर श्रीराम के छोटे भाई भरत ने लवणासुर को मारने का संकल्प किया। तभी शत्रुघ्न बोले, ‘श्रीराम के वनवास के दौरान भैया भरत ने नंदीग्राम में अनेक कष्ट उठाए हैं। इसलिए यह कार्य मुझे करने दीजिए।’
श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक सहमति प्रदान करते हुए कहा, ‘शत्रुघ्न! तुम अत्यंत वीर हो। लवणासुर का वध करके मधुपुर में धर्म की स्थापना करो। मैं तुम्हें भगवान विष्णु का एक अमोघ बाण देता हूं; उसी से विष्णु जी ने मधु और कैटभ नामक दैत्यों का संहार किया था। तुम इसी बाण से लवणासुर का वध करना। परंतु, ध्यान रहे कि जब तक शिव का त्रिशूल लवणासुर के पास है, उसे मारना असंभव है। अत: उसे युद्ध के लिए तब ललकारना, जब उसके हाथ में त्रिशूल न हो।’
श्रीराम ने शत्रुघ्न को सेना-संचालन की नीति भी समझाई। उन्होंने कहा कि सेना पहले प्रस्थान करे और शत्रुघ्न धनुष लेकर पीछे से पहुंचें, ताकि लवणासुर को उनकी योजना का आभास न हो। वर्षा ऋतु को आक्रमण हेतु उपयुक्त समय बताते हुए उन्होंने विजय का आशीर्वाद दिया। आज्ञा का पालन करते हुए शत्रुघ्न ने पहले सेना को भेज दिया और एक मास बाद अकेले प्रस्थान किया। मार्ग में वह अनेक आश्रमों में ठहरे। एक रात्रि उन्होंने महर्षि च्यवन के आश्रम में बिताई। वहीं उन्होंने लवणासुर के विषय में विस्तार से पूछा।
महर्षि च्यवन बोले, ‘एक बार राजा मांधाता ने देवलोक पर अधिकार करने का निश्चय किया, तो इंद्र ने उनसे कहा कि लवणासुर के अजेय रहने तक वह पृथ्वी के स्वामी नहीं बन सकते।’
महर्षि ने आगे कहा, ‘यह सुनकर मांधाता ने पहले दूत भेजा, किंतु लवणासुर उसे मारकर खा गया। तब स्वयं राजा मांधाता, विशाल सेना लेकर पहुंचे। परंतु, लवणासुर ने शिवजी का दिव्य त्रिशूल उठा लिया और उसके एक ही प्रहार से मांधाता तथा उनकी समस्त सेना को भस्म कर डाला।’
लवणासुर का यह वृत्तांत सुनकर शत्रुघ्न सावधान हो गए। वह मधुपुर के द्वार पर पहुंचकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। संयोग से उसी समय लवणासुर शिकार करके लौट रहा था। उसके हाथ में शिवजी का त्रिशूल नहीं था। उसने द्वार पर खड़े शत्रुघ्न को देखकर उपहास करते हुए कहा, ‘मैं तेरे जैसे असंख्य योद्धाओं को मारकर खा चुका हूं। तू मेरा क्या बिगाड़ सकेगा?’ शत्रुघ्न ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया, ‘मैं आज तेरे अत्याचारों का अंत करने आया हूं।” लवणासुर हंस पड़ा और बोला, ‘रुक! मैं अपना दिव्य त्रिशूल लेकर आता हूं, फिर युद्ध होगा।’ इतना कहकर वह महल की ओर दौड़ा।
शत्रुघ्न को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। उन्होंने श्रीराम द्वारा प्रदत्त अमोघ बाण धनुष पर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह दिव्य बाण वज्र के समान वेग से उड़ता हुआ लवणासुर के वक्षस्थल में जा धंसा। बाण लगते ही लवणासुर धराशायी होकर गिर पड़ा। उसके वध के बाद वह दिव्य त्रिशूल भगवान शिव के पास लौट गया और तीनों लोक लवणासुर के आतंक से मुक्त हो गए।
देवताओं ने प्रसन्न होकर शत्रुघ्न से कोई वर मांगने को कहा। शत्रुघ्न ने केवल यही इच्छा व्यक्त की कि मधुपुर एक समृद्ध और सुंदर राजधानी के रूप में विकसित हो। देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसके बाद शत्रुघ्न ने अपनी सेना को बुलाकर मधुपुर का पुनर्निर्माण कराया।