'राष्ट्र विरोधी' अवधारणा की यात्रा: शब्दों या लेखन में असहमति से कमजोरी नहीं, अधिक न्यायपूर्ण, नैतिक बनेगा देश
सत्ता की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाना, शब्दों या लेखन में असहमति को व्यक्त करना देश को कमजोर बनाना नहीं है। इससे देश अधिक न्यायपूर्ण और नैतिक बनेगा।
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“किसी देश के महान नागरिक वे नहीं होते जो सत्ता के आगे घुटने टेक दें, बल्कि वे होते हैं जो आवश्यकता पडने पर सत्ता का विरोध करते हुए भी उस देश के सम्मान और स्वतंत्रता के प्रति अडिग रहें। ” - अल्बैर कामू
ब्रिटेन के इतिहासकार ए.जे.पी. टेलर ने आधुनिक जर्मनी, आधुनिक ब्रिटेन, दोनों विश्वयुद्धों और मीडिया उद्योगपति लार्ड बीवरब्रुक की जीवनी सहित अनेक महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। लेकिन टेलर का मानना था कि उनकी सबसे उत्कृष्ट पुस्तक ‘द ट्रबल मेकर्स’ है। यह उन ब्रिटिश असहमतिवादियों का अध्ययन है, जिन्होंने अपने देश की विस्तारवादी और साम्राज्यवादी विदेश नीति का विरोध किया था।
ऑक्सफोर्ड के तत्कालीन शैक्षणिक वातावरण में टेलर भी कुछ हद तक एक ‘ट्रबल मेकर’ या परिस्थितियों को चुनौती देने वाले व्यक्ति माने जाते थे। यही कारण था कि वे इस पुस्तक को अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति मानते थे। टेलर के इन ‘ट्रबल मेकर्स’ में उन्नीसवीं शताब्दी के उदारवादी राजनीतिज्ञ जॉन ब्राइट भी शामिल थे। इतिहासकार एसा ब्रिग्स ने उन्हें मध्य-विक्टोरियन युग के कट्टर उदारवाद का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व कहा है। ब्राइट एक शानदार वक्ता थे। ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में दिए गए उनके अनेक भाषणों ने सरकार की विदेश नीति, विशेषकर 1850 के दशक के क्रीमिया युद्ध की तीखी और तार्किक आलोचना की।
सरकारी नीतियों पर उनके हमलों से कंजरवेटिव नेता गुस्सा हो गए। उन्होंने ब्राइट पर राष्ट्र के हितों से विश्वासघात करने का आरोप लगाया। इन आरोपों का ब्राइट ने दृढ़ और निर्भीक शब्दों में उत्तर दिया- “क्या केवल सार्वजनिक नीति के किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर आपसे भिन्न मत रखने वाले को ‘गैर-अंग्रेज’ या ‘राष्ट्र-विरोधी’ कह देना उचित है?"
1971 में भारी जनादेश के साथ सत्ता में आईं इंदिरा गांधी समय के साथ निरंकुश होती चली गईं। उन्होंने असहमति के स्वरों को दबाया, सार्वजनिक संस्थाओं पर अपना प्रभाव स्थापित किया और कांग्रेस पार्टी को धीरे-धीरे एक पारिवारिक संगठन का रूप दे दिया। जब स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभरे जनांदोलन ने उनकी कार्यशैली पर प्रश्न उठाए, तब उन्होंने आंदोलन के नेताओं, जिनमें जेपी भी शामिल थे, पर विदेशी शक्तियों से मिले होने का आरोप लगाया और उन्हें जेल में डाल दिया।
हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी, जिनकी कार्यशैली में लेखक को इंदिरा गांधी की निरंकुश प्रवृत्तियों की झलक, बल्कि उससे भी अधिक दिखाई देती है, अपने आलोचकों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताने की प्रवृत्ति अपनाई है।
मोदी समर्थक अक्सर उनकी नीतियों के विरोधियों पर पाकिस्तान के इशारों पर काम करने का आरोप लगाते हैं या फिर उन्हें अमेरिकी उद्योगपति जॉर्ज सोरोस के प्रभाव में कार्य करने वाला बताते हैं। सत्तारूढ़ व्यवस्था के बहुसंख्यकवादी और केंद्रीकृत राजनीतिक दृष्टिकोण का विरोध करने वालों को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सदस्य कहा जाता है, मानो वे विदेशी शक्तियों के निर्देश पर देश को तोड़ने की साजिश में लगे हों। आलोचकों के लिए ‘अर्बन नक्सल’ और ‘मैकाले पुत्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इस मानसिकता का एक हालिया उदाहरण छात्रों के आंदोलन के प्रति राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रतिक्रिया में देखने को मिला। छात्र शांतिपूर्ण ढंग से और व्यक्तिगत जोखिम उठाकर राज्य के शिक्षा तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे थे। फिर भी, बिना किसी ठोस प्रमाण के यह आरोप लगाया गया कि आंदोलन में शामिल कई लोगों का आपराधिक अतीत है या उन्हें ऐसी अज्ञात विदेशी शक्तियों से धन मिल रहा है, जो भारत को अस्थिर और विभाजित करना चाहती हैं। आरएसएस के एक विचारक ने सरकार से मांग की कि वह जल्द से जल्द इस आंदोलन में कथित विदेशी वित्तपोषण के स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण सार्वजनिक करे।
इसी प्रकार संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया कि ‘अच्छा भोजन करने वाले और स्मार्टफोन चलाने वाले प्रदर्शनकारी किसी स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश की तरह नहीं, बल्कि एक पेशेवर ढंग से संचालित अभियान की तरह काम कर रहे हैं।’ लेख में आगे कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों द्वारा खाए जा रहे पिज्जा और बर्गर इस बात का संकेत हैं कि ‘विदेशी खातों से आंदोलन के रसोइयों को आर्थिक सहायता मिल रही है’ और यह आंदोलन दुनिया के अनेक देशों से समर्थित है। यहां तक कि इसमें जॉर्ज सोरोस और तथाकथित ‘डीप स्टेट नेटवर्क’ जैसे वैश्विक तत्वों से संभावित संबंध होने के भी संकेत दिए गए।
छात्र आंदोलनों में ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप की पोल खुल गई। 'हिमाल' पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में पत्रकार नेहा दीक्षित ने उत्तर प्रदेश की एक छात्रा का उल्लेख किया है। छात्रा कहती है कि उसने बचपन से यही सुना था कि “जो लोग भारत सरकार की आलोचना करते हैं, वे राष्ट्र-विरोधी होते हैं।” लेकिन परीक्षा-पत्र लीक होने और सरकार द्वारा उसे छिपाने के प्रयासों ने यह समझा दिया कि राष्ट्र-विरोधी कौन है?
हाल के छात्र आंदोलनों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि उन्होंने सरकार की आलोचना के लिए व्यंग्य और हास्य को प्रभावी माध्यम बनाया। जब इंदिरा गांधी ने पहली बार विपक्षी नेताओं पर विदेशी शक्तियों के एजेंट होने का आरोप लगाया था, तब पीलू मोदी, जो उस समय स्वतंत्र पार्टी के सांसद थे, एक दिन लोकसभा में अपने गले में तख्ती लटकाकर पहुंचे, जिस पर लिखा था- “मैं सीआईए का एजेंट हूं।” यह सत्ता के आरोपों का व्यंग्यपूर्ण उत्तर था। कई दशक बाद प्रसिद्ध नाटककार गिरीश कर्नाड भी बंगलूरु में आयोजित एक जनसभा में, जो मोदी सरकार की बढ़ती बहुसंख्यकवादी राजनीति के विरोध में आयोजित की गई थी, अपने गले में एक तख्ती पहनकर पहुंचे, जिस पर लिखा था-“मैं एक अर्बन नक्सल हूंं।”
आज के छात्र आंदोलनों ने इस लोकतांत्रिक व्यंग्य की परंपरा को और आगे बढ़ाया है। उन्होंने केवल अपने पोस्टरों, नारों और चित्रों के माध्यम से सरकार का उपहास ही नहीं किया, बल्कि स्वयं को कॉकरोच कहकर भी संबोधित किया। यह वही शब्द था, जिसका प्रयोग भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उनके लिए अपमानजनक अर्थ में किया था। छात्रों ने उसी शब्द को अपनाकर उसे प्रतिरोध और आत्मसम्मान का प्रतीक बना दिया।
स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत ने ऐसा संविधान अपनाया, जिसने जाति और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया। लेकिन व्यवहार में आज भी महिलाओं और दलित-बहुजन समुदायों के साथ भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। एक सच्चे राष्ट्रवादी को इस स्थिति पर शर्म महसूस होनी चाहिए। उसे राज्य की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा किए जाने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों पर भी शर्म आनी चाहिए। यदि कोई नागरिक इस शर्म को सार्वजनिक रूप से अपने शब्दों, लेखन या शांतिपूर्ण विरोध के माध्यम से व्यक्त करता है, तो वह अपने राष्ट्र को कमजोर नहीं कर रहा होता, बल्कि उसे उसके अधिक न्यायपूर्ण, अधिक नैतिक और अधिक श्रेष्ठ स्वरूप की ओर बढ़ने का आह्वान कर रहा होता है। यदि आज महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण और उससे भी पहले जॉन ब्राइट जीवित होते, तो उन्हें इन छात्रों पर गर्व होता।