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अंतरिक्ष में भीड़: एआई हर सैटेलाइट की खराबी नहीं रोक सकता, भरोसेमंद तरीके से उपग्रह चालू रखना अगली बड़ी चुनौती
Sun, 09 Aug 2026 06:14 AM IST
ज्योति भास्कर
टोनी जॉन, प्रोफेसर, टॉरेन्स यूनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया)
टोनी जॉन, प्रोफेसर, टॉरेन्स यूनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया)
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sun, 09 Aug 2026 06:14 AM IST
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अंतरिक्ष में उपग्रह (सांकेतिक)
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अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
विस्तार
पृथ्वी की कक्षा में भीड़ बढ़ रही है। अभी हमारे ग्रह (पृथ्वी) के चारों ओर लगभग 16,000 सैटेलाइट (उपग्रह) घूम रहे हैं, जो जीपीएस नेविगेशन और मौसम की भविष्यवाणी से लेकर बैंकिंग, इमरजेंसी सेवाओं और इंटरनेट संचार तक, हर चीज में मदद करते हैं। हर कुछ हफ्तों में कई नए सैटेलाइट लॉन्च किए जाते हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, इस दशक के भीतर सैटेलाइट की कुल संख्या 1,00,000 से अधिक हो सकती है, जबकि कुछ के मुताबिक, 2030 तक इनकी संख्या 60,000 तक पहुंच सकती है। उपग्रहों की संख्या में इस तीव्र वृद्धि से एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हो रही है। हम कक्षीय वातावरण को सुरक्षित रूप से कैसे प्रबंधित करें, साथ ही यह कैसे सुनिश्चित करें कि जिन उपग्रहों पर हम निर्भर हैं, वे विश्वसनीय रूप से काम करते रहें?
आसमान में बड़ी संख्या में सैटेलाइट होने से प्रकाश प्रदूषण बढ़ रहा है, जिसकी वजह से खगोल विज्ञान व रात के आसमान से जुड़ी गतिविधियों में रुकावटें आती हैं। अधिक उपग्रह का मतलब है अंतरिक्ष में ज्यादा ट्रैफिक, उपग्रहों के आपस में टकराने की ज्यादा आशंका और मलबे का बढ़ता ढेर। सबसे खराब स्थिति में, अंतरिक्ष का कचरा आपस में टकराकर ऐसी चेन रिएक्शन शुरू कर सकता है, जिसे रोकना मुश्किल हो जाए। इसे ‘केसलर सिंड्रोम’ कहा जाता है। इससे पृथ्वी के चारों ओर कचरे का एक बादल बन जाएगा और इसकी कक्षा (ऑर्बिट) बेकार हो जाएगी, जिससे उपग्रह या कोई भी दूसरा अंतरिक्ष मिशन लॉन्च करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। इससे कम गंभीर स्थिति में, पुराने या खराब हो चुके उपग्रह खतरा बन सकते हैं, अगर वे काम करना बंद कर दें, दूसरी चीजों से टकरा जाएं, या आखिर में बिना किसी नियंत्रण के वायुमंडल में वापस आ जाएं। सवाल यह है कि जब उपग्रहों को मरम्मत के लिए आसानी से धरती पर नहीं लाया जा सकता, तो धरती से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर मौजूद हजारों उपग्रहों की देखभाल और मरम्मत कैसे की जाएगी?
इस साल मार्च में उपग्रहों के रखरखाव की चुनौती तब और साफ तौर पर सामने आई, जब नासा का एक बड़ा सैटेलाइट पृथ्वी के वायुमंडल में अनियंत्रित रूप से दाखिल हुआ। अमेरिकी स्पेस फोर्स ने पुष्टि की कि अंतरिक्ष यान पूर्वी प्रशांत महासागर के ऊपर दोबारा वायुमंडल में दाखिल हुआ। नासा को उम्मीद थी कि इसके कुछ हिस्से भले ही बच गए हों, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा। इस घटना ने दुनियाभर का ध्यान खींचा, क्योंकि विशेषज्ञों ने इसके नीचे आने की प्रक्रिया पर नजर रखी और अंदाजा लगाया कि इसका मलबा कहां गिर सकता है। साथ ही, इस संभावना पर भी चर्चा हुई कि बड़े मलबे के गिरने से भविष्य में आबादी वाले इलाकों को नुकसान पहुंच सकता है।
यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि उपग्रह हमेशा चलते नहीं रहते और किसी भी मशीन की तरह, वे भी पुराने होते हैं। उनमें लगी बैटरियां खराब होने लगती हैं, इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे घिस जाते हैं और अंतरिक्ष के कठोर हालात धीरे-धीरे उन पर असर डालते हैं। हालांकि, हवाई जहाज या कारों के विपरीत, हम उपग्रहों को मरम्मत के लिए वर्कशॉप में नहीं ले जा सकते। एक बार लॉन्च होने के बाद, उन्हें तेज रेडिएशन, तापमान में भारी बदलाव और लगातार मैकेनिकल दबाव वाले माहौल में काम करते रहना पड़ता है। सर्विसिंग मिशन तकनीकी रूप से संभव तो है, लेकिन ये महंगे और काफी कम होते हैं। फिलहाल, सैटेलाइट की सेहत की निगरानी मुख्य रूप से जमीन से ही की जाती है। इंजीनियरों को टेलीमेट्री डाटा की लगातार जानकारी मिलती रहती है, जिसमें बैटरी की परफॉर्मेंस, तापमान, बिजली की खपत और ऑनबोर्ड सिस्टम की स्थिति का पता चलता है। वे इस जानकारी का विश्लेषण करते हैं और ऐसे चेतावनी वाले संकेतों की तलाश करते हैं, जिनसे पता चल सके कि कुछ गड़बड़ हो सकती है। यह तरीका दशकों से बखूबी काम कर रहा है। लेकिन, जैसे-जैसे सैटेलाइट की संख्या दर्जनों से बढ़कर सैकड़ों और हजारों होगी, यह काम और मुश्किल होता जाएगा। इन्सानी ऑपरेटर एक बार में सीमित जानकारी की ही निगरानी कर सकते हैं।
हाल के दिनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में जो तरक्की हुई है, वह यहीं पर काम आ सकती है। शोधकर्ता यह पता लगा रहे हैं कि एआई सैटेलाइट में खराबी के शुरुआती संकेतों को कैसे पहचान सकता है, ताकि समय रहते समस्या को ठीक किया जा सके और मिशन को खतरे में पड़ने से बचाया जा सके। इसका एक अहम उदाहरण बैटरी से जुड़ा है। स्मार्टफोन या इलेक्ट्रिक गाड़ी की बैटरी की तरह ही, सैटेलाइट की बैटरी की परफॉर्मेंस भी समय के साथ धीरे-धीरे कम हो जाती है। अगर इस खराबी का पता जल्दी चल जाए, तो ऑपरेटर सैटेलाइट के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव कर सकते हैं, उसकी काम करने की उम्र बढ़ा सकते हैं या उन्हें खराब होने से बचा सकते हैं। वे सैटेलाइट को नए निर्देश भेजकर ऐसा कर सकते हैं, जैसे कि ज्यादा बिजली लेने वाली गतिविधियों को कम करना, डाटा प्रोसेस या ट्रांसमिट करने का समय बदलना, या गैर-जरूरी सिस्टम को स्टैंडबाय मोड में डालना।
हमारी हाल की रिसर्च में नासा के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सैटेलाइट बैटरी डाटा का इस्तेमाल करके यह पता लगाया गया कि मशीन लर्निंग कैसे बैटरी के पुराने होने से जुड़े पैटर्न को पहचान सकती है और भविष्य की परफॉर्मेंस का अनुमान लगा सकती है। उपकरण के खराब होने का इंतजार करने के बजाय, एआई ऐसे छोटे-मोटे बदलावों पर नजर रखता है, जिनसे पता चल सके कि कोई समस्या पैदा हो रही है।
हमने अपने तरीके में ‘फेडरेटेड लर्निंग’ पर भी विचार किया। आम तौर पर, विश्लेषण के लिए सैटेलाइट से बहुत सारा डाटा वापस धरती पर भेजना पड़ता है। इसमें समय, बैंडविड्थ और ऊर्जा लगती है। फेडरेटेड लर्निंग एक अलग तरीका अपनाती है। इसमें सैटेलाइट संभावित खराबी को पहचानने में एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। समय के साथ, इससे बड़े सैटेलाइट नेटवर्क में लगातार खुद की निगरानी (सेल्फ-मॉनिटरिंग) करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। एआई हर सैटेलाइट की खराबी को नहीं रोक सकता। यह अकेले अंतरिक्ष के कचरे को खत्म नहीं कर सकता। प्रेडिक्टिव मॉडल को कक्षा में इस्तेमाल करने से पहले उनकी बड़े पैमाने पर परीक्षण की जरूरत होती है, जैसे कि पुराने सैटेलाइट डाटा, खराबी और लैब में बैटरी के प्रयोग के जरिये उनकी जांच करना।
नए अंतरिक्ष युग की अगली बड़ी चुनौती शायद सिर्फ एक लाख और सैटेलाइट लॉन्च करना नहीं होगी, बल्कि चुनौती यह पक्का करना हो सकती है कि ये सैटेलाइट इतने स्मार्ट हों कि अपनी हालत पर नजर रख सकें, समस्याओं का जल्दी पता लगा सकें और उन अंतरिक्ष सेवाओं को सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से चालू रखने में मदद कर सकें, जिन पर हम निर्भर हैं।
-द कन्वर्सेशन