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ब्रिटेन का संकट: क्यों कमजोर पड़ी कीर स्टार्मर की राजनीतिक पकड़

Wed, 24 Jun 2026 06:35 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 24 Jun 2026 06:35 AM IST
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सार
पिछले दस वर्षों में कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने वाले कीर स्टार्मर ब्रिटेन के छठे प्रधानमंत्री हैं। ब्रिटेन एक बार फिर राजनीतिक संक्रमण के दौर में प्रवेश कर चुका है, जिसके परिणामों पर केवल लंदन नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की नजर होगी।
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कीर स्टार्मर - फोटो : ANI

विस्तार

जब कीर स्टार्मर ने ब्रिटेन में 2024 के आम चुनाव में लेबर पार्टी को 14 वर्षों बाद रिकॉर्ड जीत दिलाते हुए सत्ता में वापसी दिलाई थी, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि दो वर्ष से भी कम समय में ऐसी नौबत आएगी कि उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा। यह इस बात का भी संकेत है कि लोकतंत्र में चुनावी जीत जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही अहम जनता और पार्टी का निरंतर विश्वास बनाए रखना भी होता है। गौरतलब है कि स्टार्मर ने ऐसे समय में सत्ता संभाली थी, जब ब्रिटेन लगातार राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा था। ब्रेक्जिट के बाद की चुनौतियां, आर्थिक सुस्ती, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और जनता का राजनीतिक वर्ग से घटता भरोसा इत्यादि समस्याएं उनके सामने थीं। भारी जनादेश के साथ सत्ता में आई लेबर पार्टी से राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक सुधारों की बड़ी उम्मीदें लगाई गई थीं, लेकिन वित्तीय सुधारों की धीमी गति, जीवन-यापन की लागत से जुड़े संकट कम न होने और कई नीतिगत फैसलों पर सरकार के पीछे हटने से अपेक्षित नतीजे नहीं मिल सके। इसके अतिरिक्त, हालिया स्थानीय चुनावों में विपक्षी दल रिफॉर्म यूके के बढ़ते प्रभाव से भी यह संदेश मिला कि मतदाता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। इससे पार्टी के भीतर भी नेतृत्व परिवर्तन की मांग को बल मिला। इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी है। पिछले दस वर्षों में कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने वाले स्टार्मर छठे प्रधानमंत्री हैं। जाहिर है कि इस तरह की अस्थिरता से सरकारों की नीति-निरंतरता तो प्रभावित होती ही है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि और निवेशकों के भरोसे पर भी असर पड़ सकता है। भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रिटेन उसके प्रमुख व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारों में शामिल है। कुछ ही दिन पहले फ्रांस में जी-7 की बैठक के दौरान स्टार्मर और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात में मुक्त व्यापार समझौते को लागू करने की अंतिम तारीख 15 जुलाई तय हुई थी। ऐसे में, लंदन में राजनीतिक अनिश्चितता का लंबा दौर द्विपक्षीय सहयोग की प्रक्रिया की गति को प्रभावित कर सकता है। बहरहाल, कीर स्टार्मर का इस्तीफा ब्रिटेन की राजनीति में एक नया मोड़ है, जो सत्ताधारी दल के लिए कई चिंताओं व सवालों के साथ आया है। आने वाले वक्त में तय होगा कि लेबर पार्टी का नया नेतृत्व जनता का भरोसा जीत पाता है या नहीं। फिलहाल, इतना तो तय है कि ब्रिटेन एक बार फिर राजनीतिक संक्रमण के दौर में प्रवेश कर चुका है, जिसके परिणामों पर केवल ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की नजर होगी।
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